गवाहों के बयानों में भौतिक विरोधाभास: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 के डकैती मामले में 3 अभियुक्तों को बरी किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1982 की कथित डकैती के मामले में 1983 में दोषी ठहराए गए तीन अभियुक्तों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन साक्ष्यों में मौजूद भौतिक विरोधाभासों के कारण उन्हें संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी पाया कि विचारण न्यायालय ने साक्ष्यों का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन किया था।

न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने 29 अगस्त 1983 को विशेष सत्र न्यायाधीश, बदायूं द्वारा पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश के विरुद्ध दायर आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए यह निर्णय दिया।

27 जुलाई 1982 को बदायूं के उजहानी थाना में भारतीय दंड संहिता की धारा 395 (डकैती) और 397 (डकैती के दौरान मृत्यु या गंभीर चोट पहुँचाने का प्रयास) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

विचारण न्यायालय ने—

  • अली हसन, नरैन और नंदेय को धारा 395 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए 5 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी, तथा
  • ओमकार, हरपाल, लटूरी और मेहंदी को धारा 395 सहपठित धारा 397 IPC के तहत दोषी ठहराकर 7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
READ ALSO  पुलिस ने एक ऐसे चोर को पकड़ा जो सोना चान्दी नहीं केवल जजों के कपड़े चुराता है- जानिए क्या है पूरा मामला

सभी सातों दोषियों ने वर्ष 1983 में हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की।

अपील लंबित रहने के दौरान नरैन, नंदेय, ओमकार और मेहंदी की मृत्यु हो गई, जिसके बाद 21 फरवरी 2019 के आदेश द्वारा उनके विरुद्ध अपील अबेट कर दी गई। अपील केवल अली हसन, हरपाल और लटूरी के संबंध में शेष रही।

हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों का परीक्षण करते हुए पाया कि उनमें महत्वपूर्ण और भौतिक विरोधाभास हैं, जो अभियोजन के मामले को संदेहास्पद बनाते हैं। न्यायालय के अनुसार इन असंगतियों के कारण अभियुक्तों की संलिप्तता संदेह से परे सिद्ध नहीं होती।

न्यायालय ने कहा कि विचारण न्यायालय ने साक्ष्यों का सही ढंग से मूल्यांकन नहीं किया और उपलब्ध साक्ष्य दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा—

READ ALSO  पति और पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में अलग-अलग पैमाने हैं:केरल हाई कोर्ट

शेष अपीलकर्ताओं को डकैती या किसी अन्य लघु अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता और वे डकैती तथा डकैती के दौरान मृत्यु या गंभीर चोट पहुँचाने के प्रयास के अपराध से बरी किए जाने के अधिकारी हैं। विचारण न्यायालय ने साक्ष्यों का गलत मूल्यांकन किया है, अतः संदेह का लाभ देते हुए उन्हें बरी किया जाता है।

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए तीनों शेष अभियुक्तों की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया तथा उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 395 और 397 के आरोपों से बरी कर दिया।

READ ALSO  कौन है जस्टिस दीपांकर दत्ता, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में आज शपथ ली?

इस प्रकार चार दशक से अधिक समय से लंबित आपराधिक अपील का समापन हो गया।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles