एआई से परहेज नहीं बल्कि इसे विनियमित करने की जरूरत: सीजेआई सूर्यकांत ने मध्यस्थता में तकनीक के उपयोग पर दिया जोर

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शुक्रवार को मध्यस्थता (Arbitration) की प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के समावेश का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि गोपनीयता या नैतिक चिंताओं के कारण इस तकनीक से दूरी बनाने के बजाय, एक मजबूत प्रक्रियात्मक ढांचे के माध्यम से इसके उपयोग को विनियमित किया जाना चाहिए।

इंडियन काउंसिल ऑफ आर्बिट्रेशन (ICA) के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए सीजेआई ने स्पष्ट किया कि हालांकि एआई स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता और गोपनीयता के लिए चुनौतियां पेश कर सकता है, लेकिन आज की तेज रफ्तार दुनिया में यह मध्यस्थता के लिए एक “शक्तिशाली सहयोगी” साबित हो सकता है।

सम्मेलन का विषय ‘ग्लोबलाइजेशन के दौर में मध्यस्थता: कानूनी तकनीक, आर्थिक विकास और सीमा पार विवाद’ रखा गया था। इस अवसर पर सीजेआई ने कानूनी विवादों के समाधान में डिजिटल बदलाव पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि तकनीकी विकास ने भौगोलिक बाधाओं को दूर कर मध्यस्थता की पहुंच को सुगम बनाया है और लॉजिस्टिक देरी को कम किया है।

हालांकि, उन्होंने इन उपकरणों के साथ आने वाली “नई जिम्मेदारियों” के प्रति भी आगाह किया।

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “निर्णय लेने वाले उपकरणों में एआई के बढ़ते उपयोग से गोपनीयता और स्वतंत्र निर्णय की सुरक्षा को लेकर जायज चिंताएं पैदा होती हैं। मध्यस्थता की वैधता न केवल इसकी दक्षता से, बल्कि इस भरोसे से आती है कि निर्णय निष्पक्ष मानवीय विशेषज्ञता का परिणाम हैं। इसलिए, समाधान तकनीक को पूरी तरह से त्यागने में नहीं, बल्कि एक प्रक्रियात्मक ढांचे के माध्यम से इसके उपयोग को नियंत्रित करने में है।”

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उन्होंने जोर देकर कहा कि ट्रिब्यूनल को इस बात पर स्वायत्तता रखनी चाहिए कि इन उपकरणों का उपयोग कैसे किया जाए, ताकि साइबर सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़े प्रोटोकॉल तकनीक की रफ्तार के साथ कदम मिला सकें।

तकनीक के अलावा, सीजेआई ने न्यायपालिका और मध्यस्थता प्रक्रिया के बीच संतुलन पर भी बात की। उन्होंने मध्यस्थता के मामलों में “अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप” के प्रति सावधान करते हुए कहा कि बार-बार अदालती हस्तक्षेप से इस प्रणाली में विश्वास कम होता है। उन्होंने तर्क दिया कि इससे वह भरोसा डगमगा जाता है जिसके तहत पक्षकार अपने समझौते का सम्मान करने और ट्रिब्यूनल को अपनी प्रक्रिया निर्धारित करने की अनुमति देने के लिए सहमत होते हैं।

सीजेआई ने कहा कि अदालतों को मध्यस्थता की कार्यवाही में “निष्क्रिय” रहना चाहिए और केवल स्पष्ट दुरुपयोग के मामलों में ही हस्तक्षेप करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि एंटी-आर्बिट्रेशन इंजंक्शन (मध्यस्थता विरोधी आदेश) अपवाद स्वरूप ही होने चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने भारत की विवाद समाधान प्रणाली की दक्षता को निवेश के नजरिए से भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के युग में, पूंजी के प्रवाह के साथ-साथ उम्मीदों की स्थिरता भी उतनी ही जरूरी है।

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उन्होंने कहा, “मध्यस्थता वह स्थिरता प्रदान करती है। यह निवेशकों को आश्वस्त करती है, व्यावसायिक साझेदारी का समर्थन करती है और यह सुनिश्चित करती है कि असहमति किसी बड़े व्यवधान का कारण न बने।” उन्होंने आगे कहा कि भारत ने अपनी मध्यस्थता व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए हैं ताकि व्यापारिक जगत की उभरती जरूरतों को पूरा किया जा सके।

दो दिवसीय इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन सत्र दिल्ली हाईकोर्ट के सभागार में आयोजित किया गया।

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