अमेरिका और भारत के राष्ट्रपतियों को अभद्र ईमेल? शिकायतकर्ता के मुकरते ही बेंगलुरु कोर्ट ने आरोपी को किया बरी

बेंगलुरु की एक अदालत ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में उस आरोपी को बरी कर दिया, जिस पर इंफोसिस लिमिटेड, भारत के राष्ट्रपति और संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति को बेहद आपत्तिजनक और अश्लील ईमेल भेजने का आरोप था। यह फैसला तब आया जब अभियोजन पक्ष का एकमात्र और मुख्य गवाह अपने बयान से पूरी तरह पलट गया (Hostile) और उसने मामले का समर्थन करने से इनकार कर दिया।

यह मामला सीआईडी (CID) साइबर क्राइम पुलिस द्वारा दर्ज किया गया था। जांच एजेंसी का आरोप था कि pxxxxx@yahoo.com ईमेल आईडी से ऐसे ईमेल भेजे गए थे, जिनमें असंसदीय और अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया गया था। इन आरोपों के आधार पर आरोपी के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 67 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 504 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

गंभीर आरोप, लेकिन कोर्ट में सबूत नदारद

अभियोजन पक्ष के अनुसार, भेजे गए ईमेल में कथित तौर पर बेहद अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया था। इसमें कॉरपोरेट संस्थाओं पर “आतंकवाद फैलाने” का आरोप लगाया गया था और धमकी दी गई थी कि इन ईमेल को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सार्वजनिक कर दिया जाएगा। पुलिस ने जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल की और ट्रायल शुरू हुआ।

हालाँकि, जब साक्ष्य प्रस्तुत करने का समय आया, तो मामले ने एक नाटकीय मोड़ ले लिया।

स्टार गवाह का यू-टर्न: “मुझे इस मामले की जानकारी नहीं”

मामले के शिकायतकर्ता, जिसे गवाह नंबर-1 (PW-1) के रूप में पेश किया गया, ने अदालत में यह कहकर सभी को चौंका दिया कि:

  • उसे इस मामले के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
  • उसने पुलिस को कोई शिकायत नहीं दी थी।
  • वह शिकायत के तथ्यों या ईमेल दस्तावेजों का समर्थन नहीं करता है।
READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने दो IAS अधिकारियों को हिरासत में लेने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

हालाँकि PW-1 ने शिकायत और संलग्न ईमेल प्रिंटआउट पर अपने हस्ताक्षर होने की बात स्वीकार की, लेकिन उसने दस्तावेजों की सामग्री (Contents) के बारे में पूरी अनभिज्ञता जताई। महत्वपूर्ण रूप से, गवाह ने स्वीकार किया कि आरोपी के साथ उनका विवाद अब सुलझ गया है और समझौता हो चुका है।

सरकारी वकील (Senior APP) ने गवाह को पक्षद्रोही (Hostile) घोषित किया और उससे जिरह भी की, लेकिन इसके बावजूद आरोपी के खिलाफ कोई भी ठोस सबूत सामने नहीं आ सका।

कोर्ट ने अन्य गवाहों को हटाया

अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला शिकायतकर्ता की गवाही पर टिका था। जब मुख्य गवाह ही अपने बयान से मुकर गया, तो कोर्ट ने माना कि जांच अधिकारी या अन्य औपचारिक गवाहों का परीक्षण करने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा और यह केवल न्यायिक समय की बर्बादी होगी।

अदालत ने त्वरित कार्रवाई करते हुए:

  • शेष अभियोजन गवाहों को ड्रॉप कर दिया।
  • सीआरपीसी (CrPC) की धारा 313 के तहत आरोपी का बयान दर्ज करने की प्रक्रिया को रद्द कर दिया, क्योंकि उसके खिलाफ कोई आपत्तिजनक साक्ष्य नहीं था।
  • मामले को सीधे अंतिम बहस के लिए आगे बढ़ाया।
READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को DRT में ई-सेवा केंद्र स्थापित करने का निर्देश दिया

स्पष्ट निष्कर्ष: अभियोजन पक्ष विफल

अदालत ने अपने निष्कर्ष में कहा कि:

  • PW-1 का साक्ष्य विरोधाभासी है।
  • शिकायत की सत्यता साबित नहीं हो सकी।
  • अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे आरोप साबित करने में विफल रहा है।

परिणामस्वरूप, अदालत ने आरोपी को आईटी एक्ट की धारा 67 और आईपीसी की धारा 504 के तहत सभी आरोपों से सीआरपीसी की धारा 248(1) के तहत बरी कर दिया।

अंतिम आदेश

  • आरोपी को सभी आरोपों से बरी किया गया।
  • जमानत मुचलका (Bail bond) रद्द कर दिया गया।
  • अपील अवधि समाप्त होने के बाद नकद सुरक्षा राशि वापस करने का आदेश दिया गया।
READ ALSO  यूपी कोर्ट ने सीएम योगी आदित्यनाथ कि सराहना की, सांप्रदायिक दंगों को राजनीतिक तुष्टिकरण का परिणाम बताया

यह फैसला प्रथम अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (I ACJM), बेंगलुरु द्वारा 2 फरवरी 2026 को सुनाया गया।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles