आधार कार्ड: वयस्कों के लिए नए पंजीकरण पर रोक लगाने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर

सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर भारत में आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया में आमूल-चूल बदलाव की मांग की गई है। इस याचिका में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि नए आधार कार्ड केवल छह वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए ही जारी किए जाएं। साथ ही, किशोरों और वयस्कों के लिए आधार जारी करने हेतु “कड़े दिशा-निर्देश” लागू करने की मांग की गई है।

अधिवक्ता अश्विनी दुबे के माध्यम से वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान सत्यापन प्रक्रिया “कमजोर है और इसमें आसानी से हेरफेर” किया जा सकता है। याचिका के अनुसार, इसका फायदा उठाकर घुसपैठिए भारतीय नागरिक बनकर आधार हासिल कर रहे हैं और फिर सरकारी दस्तावेजों व कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच बना रहे हैं।

याचिकाकर्ता का कहना है कि आधार को मूल रूप से केवल “पहचान के प्रमाण” के रूप में पेश किया गया था, लेकिन अब यह एक “आधारभूत दस्तावेज” बन गया है। याचिका में दावा किया गया है कि इस दस्तावेज के आधार पर लोग बिना किसी कठोर जांच के राशन कार्ड, अधिवास प्रमाणपत्र (domicile) और मतदाता पहचान पत्र जैसे अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज प्राप्त कर लेते हैं।

PIL में एक विशेष खामी की ओर इशारा किया गया है: जहां विदेशी नागरिक ‘विदेशी’ श्रेणी के तहत आधार के लिए आवेदन करते हैं, वहीं घुसपैठिए ‘भारतीय नागरिक’ श्रेणी का उपयोग कर इसे आसानी से बनवा लेते हैं। एक बार आधार मिलने के बाद, ये व्यक्ति वास्तविक नागरिकों से “अभेद्य” हो जाते हैं, जिससे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो सकता है।

भारत की लगभग 99 प्रतिशत जनसंख्या के पास पहले से ही आधार कार्ड (लगभग 144 करोड़) होने का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अब वयस्कों के लिए उदार नामांकन नीति की आवश्यकता नहीं है। याचिका में निम्नलिखित मुख्य निर्देश मांगे गए हैं:

  • आयु सीमा: नए आधार कार्ड केवल 0-6 वर्ष के बच्चों तक सीमित किए जाएं।
  • कठोर सत्यापन: उन किशोरों या वयस्कों के लिए सख्त नियम बनाए जाएं जिन्होंने अब तक पंजीकरण नहीं कराया है।
  • सार्वजनिक जागरूकता: सभी कॉमन सर्विस सेंटर्स (CSCs) पर डिस्प्ले बोर्ड लगाए जाएं, जिनमें स्पष्ट लिखा हो कि आधार केवल “पहचान का प्रमाण” है, न कि नागरिकता, पते या जन्म तिथि का प्रमाण।
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याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का हवाला देते हुए कहा गया है कि आधार का दुरुपयोग सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के वितरण में बाधा उत्पन्न करता है।

एक प्रमुख कानूनी सवाल यह उठाया गया है कि क्या आधार अधिनियम 2016 “सामयिक रूप से अनुचित” (temporally unreasonable) हो गया है। याचिकाकर्ता का सुझाव है कि यह कानून विदेशियों और भारतीय नागरिकों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखने के अपने मूल विधायी उद्देश्य को पूरा करने में विफल रहा है।

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इस मामले में UIDAI के साथ-साथ केंद्रीय गृह मंत्रालय, कानून और न्याय मंत्रालय, तथा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को पक्षकार बनाया गया है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी प्रतिवादी के रूप में शामिल किया गया है।

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