सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक समयसीमा उस क्षण से शुरू होगी, जब जांच एजेंसी उसे हिरासत में लेकर उसकी स्वतंत्रता सीमित कर देती है। यह समयसीमा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से नहीं गिनी जाएगी।
जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि जांच एजेंसियां हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी को अलग-अलग बताकर किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक न्यायिक निगरानी के बिना नहीं रख सकतीं। निर्धारित समयसीमा के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं करने पर हिरासत अवैध होगी और संबंधित व्यक्ति को तत्काल रिहा करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुजीत दास बनाम भारत संघ मामले में सुनाया। यह मामला 11.03 किलोग्राम मेथामफेटामाइन टैबलेट, जिन्हें याबा के नाम से जाना जाता है, की कथित बरामदगी से जुड़ा है। कोर्ट ने आरोपियों को जमानत देने से इनकार करने वाले त्रिपुरा हाईकोर्ट के 29 अप्रैल के आदेश को रद्द करते हुए उनकी तत्काल रिहाई का निर्देश दिया।
औपचारिक गिरफ्तारी से पहले की हिरासत भी 24 घंटे की समयसीमा में शामिल
संविधान के अनुच्छेद 22(2) की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसी की उस दलील को खारिज कर दिया कि 24 घंटे की समयसीमा केवल औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के बाद शुरू होती है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि जैसे ही किसी संदिग्ध व्यक्ति को अधिकारियों के नियंत्रण में लेकर उसकी स्वतंत्रता सीमित कर दी जाती है, उसी समय से संवैधानिक सुरक्षा लागू हो जाती है।
कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को पूछताछ के नाम पर हिरासत में रखने के बाद गिरफ्तारी दर्ज करके 24 घंटे की नई समयसीमा शुरू नहीं कर सकती।
पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 22(2) जांच के लिए ऐसी अतिरिक्त अवधि की अनुमति नहीं देता, जिसमें किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता तो सीमित कर दी जाए, लेकिन उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार न दिखाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(2) के उद्देश्य से गिरफ्तारी और हिरासत का अर्थ समान है। निर्धारित 24 घंटे की अवधि से केवल मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय ही बाहर रखा जा सकता है।
गिरफ्तारी दर्ज करने में 18 घंटे की देरी को अनुचित माना
यह मामला 29 सितंबर 2025 को हुई कार्रवाई से जुड़ा है। जांच एजेंसी की तलाशी टीम ने आरोपियों को उस दिन दोपहर 2 बजे अपने नियंत्रण और हिरासत में ले लिया था। हालांकि, उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर को दर्ज की गई।
आरोपियों ने गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए कहा कि जांच एजेंसी ने संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत निर्धारित समयसीमा से बचने के लिए गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी की।
दूसरी ओर, जांच एजेंसी ने तर्क दिया कि 24 घंटे की अवधि की गणना 30 सितंबर को औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के समय से होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि संवैधानिक दृष्टि से आरोपियों की गिरफ्तारी 29 सितंबर को दोपहर 2 बजे ही मानी जाएगी, क्योंकि उसी समय वे तलाशी टीम के नियंत्रण में आ गए थे।
इस आधार पर आरोपियों को 30 सितंबर को दोपहर 2 बजे तक न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक था। लेकिन उन्हें उसी दिन शाम 4:45 बजे पेश किया गया।
पीठ ने पाया कि इस देरी से अनुच्छेद 22(2) का स्पष्ट उल्लंघन हुआ। इसके कारण आरोपियों की गिरफ्तारी और निर्धारित समयसीमा के बाद उनकी हिरासत अवैध तथा असंवैधानिक हो गई।
कोर्ट ने तलाशी और जब्ती की कार्रवाई पूरी होने तथा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के बीच 18 घंटे के अंतराल पर भी सवाल उठाया। जांच एजेंसी इस देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सकी।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 58 का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 24 घंटे की अधिकतम सीमा के भीतर भी किसी व्यक्ति को अनुचित अवधि तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
पीठ ने पाया कि न्यायिक निगरानी के बिना 18 घंटे तक हिरासत में रखना उचित नहीं माना जा सकता।
मजिस्ट्रेट को हिरासत में लिए जाने का वास्तविक समय दर्ज करना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने रिमांड पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारियां भी स्पष्ट कीं।
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को केवल गिरफ्तारी के दस्तावेजों में दर्ज समय पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्हें यह पता लगाना होगा कि संबंधित व्यक्ति को वास्तव में किस तारीख और समय पर हिरासत में लिया गया था।
मजिस्ट्रेट को उस समय का रिकॉर्ड तैयार करना होगा और यह जांचना होगा कि अनुच्छेद 22(2) की संवैधानिक समयसीमा का पालन हुआ है या नहीं।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले अनुचित अवधि तक हिरासत में रखा गया है, तो मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इनकार कर सकते हैं, भले ही कुल अवधि 24 घंटे से कम हो।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीसा हाईकोर्ट के अरियमन पटनायक, मद्रास हाईकोर्ट के कन्नन और केरल हाईकोर्ट के अरुण के. थॉमस मामलों में अपनाए गए कानूनी दृष्टिकोण को गलत ठहराया।
NDPS एक्ट की जमानत संबंधी शर्तें मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेज एक्ट (NDPS एक्ट) की धारा 37 के तहत जमानत पर लागू कठोर शर्तों और संवैधानिक अधिकारों के बीच संबंध पर भी विचार किया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार मौलिक अधिकार है। किसी विशेष कानून के प्रावधान इन अधिकारों को कमजोर नहीं कर सकते।
कोर्ट के अनुसार, अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होने पर NDPS एक्ट की धारा 37 या अन्य विशेष कानूनों में जमानत संबंधी कठोर प्रतिबंधों को संवैधानिक अधिकारों के आगे झुकना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सुखविंदर सिंह उर्फ गोरा मामले में अनुच्छेद 21 और NDPS एक्ट की धारा 37 के संबंध में की गई टिप्पणियों पर भी आपत्ति व्यक्त की। हालांकि, पीठ ने समान शक्ति वाली दूसरी पीठ के उस फैसले की वैधता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया।
हिरासत में हिंसा और गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत में हिंसा भारत की एक दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता है, जिसे न्यायपालिका भी स्वीकार कर चुकी है।
पीठ ने कहा कि जांच के दौरान जानकारी या स्वीकारोक्ति प्राप्त करने के लिए कभी-कभी पुलिस थर्ड डिग्री तरीकों का इस्तेमाल करती है। इसके लिए गिरफ्तारी दर्ज नहीं करना या किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित किए जाने को लंबी पूछताछ बताना जैसे तरीके अपनाए जाते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिरासत में हिंसा रोकने के लिए संवैधानिक सुरक्षा उसी क्षण से लागू होनी चाहिए, जब जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को रोककर अपने नियंत्रण में लेती है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58, दोनों का उल्लंघन हुआ है। इसी आधार पर पीठ ने आरोपियों को तत्काल हिरासत से रिहा करने का आदेश दिया।
