इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) का रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर रिकवरी सर्टिफिकेट में सुधार के लिए दाखिल आवेदन पर अंतिम फैसला नहीं कर सकता। उसका अधिकार केवल पक्षकारों को सुनकर रिपोर्ट या प्रस्ताव RERA सचिव को भेजने तक सीमित है। अंतिम निर्णय लेने का अधिकार सचिव के पास है।
जस्टिस जसप्रीत सिंह ने इस कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए रियल एस्टेट डेवलपर की सुधार संबंधी अर्जियां खारिज करने वाले रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर के आदेश रद्द कर दिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किए थे।
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत तुलसियानी कंस्ट्रक्शंस एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड और मेसर्स सनशाइन इंफ्राहाइट्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिकाएं स्वीकार करते हुए मामलों को दोबारा कार्यवाही के लिए भेज दिया।
रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर को अंतिम निर्णय देने का अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने RERA के 22 सितंबर 2025 के कार्यालय आदेश की जांच की।
कोर्ट ने पाया कि इस आदेश के तहत रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर को पक्षकारों की सुनवाई करने और अपनी रिपोर्ट या प्रस्ताव सचिव के समक्ष प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
बेंच ने कहा:
“इस कार्यालय आदेश की किसी भी प्रकार से ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती कि इसके जरिए रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर को आवेदन पर फैसला सुनाने या उसका निस्तारण करने का अधिकार दिया गया है।”
कोर्ट ने पाया कि संबंधित अधिकारी ने केवल रिपोर्ट या प्रस्ताव भेजने के बजाय आवेदन के गुण-दोष पर स्वयं निर्णय दे दिया।
हाईकोर्ट ने कहा:
“यह न तो कोई रिपोर्ट है और न ही प्रस्ताव, बल्कि गुण-दोष के आधार पर व्यक्त की गई ऐसी राय है, जो आदेश का स्वरूप रखती है और जिसे वास्तव में RERA सचिव द्वारा पारित किया जाना चाहिए था।”
बेंच ने माना कि अधिकारी के आदेश निर्धारित अधिकार क्षेत्र से बाहर थे।
अपील का विकल्प होने के बावजूद हाईकोर्ट ने किया हस्तक्षेप
घर खरीदारों की ओर से तर्क दिया गया कि संबंधित आदेशों के खिलाफ रियल एस्टेट अपीलीय अधिकरण में अपील की जा सकती थी। इसलिए हाईकोर्ट को याचिकाओं पर विचार नहीं करना चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि जब आदेश ही अधिकार क्षेत्र के अभाव में पारित किया गया हो, तो याचिकाकर्ताओं को वैकल्पिक अपील के लिए भेजना उचित नहीं होगा।
कोर्ट ने उस दलील को भी खारिज कर दिया कि रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर को सचिव के पास प्रस्ताव केवल तभी भेजना था, जब उसे सुधार की आवश्यकता दिखाई दे।
बेंच ने इस तर्क को “पूरी तरह आधारहीन और अस्वीकार्य” बताया।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि M/s K.D.P. Buildwell Private Limited vs. State of U.P. and others मामले में डिवीजन बेंच का फैसला वर्तमान विवाद पर लागू नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि वह फैसला वर्ष 2020 का था, जबकि वर्तमान मामले में वर्ष 2024 और 2025 के कार्यालय आदेशों की व्याख्या का प्रश्न था।
रिकवरी सर्टिफिकेट में ब्याज की अवधि को लेकर विवाद
याचिकाकर्ता कंपनी ने लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी में गोल्फ व्यू अपार्टमेंट्स परियोजना विकसित की थी।
घर खरीदारों की शिकायतों पर RERA ने 23 मई 2022 को कंपनी को 45 दिनों के भीतर कब्जा देने और देरी की अवधि के लिए भारतीय स्टेट बैंक द्वारा निर्धारित MCLR से एक प्रतिशत अधिक दर पर ब्याज देने का निर्देश दिया था।
इसके बाद 8 जुलाई 2025 को रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किया गया।
कंपनी ने सर्टिफिकेट में सुधार की अर्जी दाखिल करते हुए दावा किया कि ब्याज की गणना गलत अवधि के लिए की गई थी।
इस मामले में पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था। 12 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने RERA को लंबित आवेदन का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर ने सुधार संबंधी अर्जियां खारिज कर दीं, जिन्हें वर्तमान याचिकाओं में चुनौती दी गई।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप नारायण माथुर ने अधिवक्ता विधु भूषण कालिया और सौरभ मिश्रा के सहयोग से दलील दी कि RERA ने 8 अगस्त 2024 के कार्यालय आदेश के जरिए रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 की धारा 39 के तहत सुधार करने का अधिकार सचिव को सौंपा था।
उन्होंने कहा कि 22 सितंबर 2025 के बाद के कार्यालय आदेश में रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर को केवल सुनवाई करके अंतिम निर्णय के लिए प्रस्ताव भेजने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसलिए अधिकारी द्वारा स्वयं अर्जियां खारिज करना शुरू से ही अधिकारहीन था।
घर खरीदारों की ओर से अधिवक्ता प्रेरणा जालान ने कहा कि अधिकारी ने केवल यह पाया था कि सर्टिफिकेट में किसी सुधार की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि डेवलपर तकनीकी आपत्तियां उठाकर RERA के आदेश के पालन में देरी कर रहा है।
RERA की ओर से अधिवक्ता शोभित मोहन शुक्ला ने अधिकारी के आदेशों का समर्थन किया। उनका तर्क था कि अधिकारी ने विधिवत सौंपे गए अधिकार का इस्तेमाल किया और अथॉरिटी के दृष्टिकोण को दोहराया।
18 नवंबर को दोबारा होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर के विवादित आदेश रद्द करते हुए मामले पुनः उसके पास भेज दिए।
कोर्ट ने सभी पक्षकारों को 18 नवंबर 2026 को अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया।
रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर पक्षकारों की सुनवाई के बाद अपनी रिपोर्ट या प्रस्ताव RERA सचिव को भेजेगा। इसके बाद सचिव अंतिम निर्णय लेंगे।
आवश्यकता पड़ने पर सचिव किसी भी पक्षकार से स्पष्टीकरण मांग सकते हैं। पक्षकारों को सचिव के समक्ष लिखित दलीलें प्रस्तुत करने की भी स्वतंत्रता दी गई है।
हाईकोर्ट ने मुकदमे के खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Tulsiani Constructions and Developers Pvt. Ltd. vs. State of U.P. and others
केस नंबर: Matters Under Article 227 No. 5621 of 2026 एवं संबंधित याचिकाएं
पीठ: जस्टिस जसप्रीत सिंह
फैसले की तारीख: 30 अक्टूबर 2026
