सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गाली-गलौज और धमकियों वाले पत्रों को केवल इसी आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का सबूत नहीं माना जा सकता, खासकर जब उनमें वैवाहिक संबंध सुधारने और साथ रहने की अपील भी की गई हो। कोर्ट ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दोषी ठहराए गए पति को बरी करते हुए उसकी दस साल की सजा रद्द कर दी।
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने पाया कि अभियोजन यह भी साबित नहीं कर सका कि विवादित चार पत्र आरोपी ने ही लिखे थे। लिखावट की जांच करने वाले विशेषज्ञ को अदालत में गवाही के लिए पेश नहीं किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 306 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखने वाला राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
पत्रों में धमकी के साथ दोबारा साथ रहने की अपील भी थी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में मुख्य रूप से चार पत्रों पर भरोसा किया था।
इन पत्रों में अपमानजनक भाषा और जान से मारने की धमकियां थीं, लेकिन साथ ही पत्नी से लंबित मुकदमे वापस लेने और दोबारा साथ रहने का आग्रह भी किया गया था।
बेंच ने कहा कि पत्रों को अलग-अलग वाक्यों के आधार पर नहीं, बल्कि संपूर्ण रूप में पढ़ना आवश्यक है।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“इस प्रकार इन पत्रों में शत्रुतापूर्ण व्यवहार, दबाव डालने वाली धमकियों और सुलह की स्पष्ट इच्छा का मिश्रण दिखाई देता है।”
बेंच ने पाया कि मृतका दो वर्ष से अधिक समय से अपने पिता के घर रह रही थी और पति के खिलाफ कानूनी कार्यवाही भी कर रही थी।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने कहा:
“केवल इन पत्रों को ऐसी उकसाने वाली सामग्री नहीं माना जा सकता, जो पीड़िता के आत्महत्या करने का तत्काल कारण बनी हो।”
लिखावट विशेषज्ञ की गवाही के बिना रिपोर्ट पर भरोसा नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन ने आरोपी की लिखावट के नमूने नहीं लिए थे। साथ ही पत्रों की जांच करने वाले लिखावट विशेषज्ञ को भी अदालत में पेश नहीं किया गया।
बेंच ने Magan Bihari Lal vs State of Punjab और Patel Babubhai Manohardas vs State of Gujarat के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा:
“लिखावट विशेषज्ञ की अदालत में गवाही कराना आवश्यक है, क्योंकि लिखावट की तुलना कोई पूर्णतः सटीक विज्ञान नहीं है और इसकी अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“ऐसी रिपोर्टें CrPC की धारा 293 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 329 के समकक्ष) के तहत स्वीकार्य नहीं हैं। इसलिए अन्य रिपोर्टों की तरह इन्हें भी विशेषज्ञ की गवाही के माध्यम से साबित करना आवश्यक है।”
सुप्रीम कोर्ट ने उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि आरोपी ने CrPC की धारा 313 के तहत अपने बयान में पत्र लिखने से विशेष रूप से इनकार नहीं किया था।
बेंच ने कहा:
“अभियोजन को अपने साक्ष्यों के आधार पर ही मामला साबित करना होगा और आरोपी का अपराध उचित संदेह से परे स्थापित करना होगा।”
पत्नी की मौत के 15 दिन बाद दर्ज कराई गई शिकायत
गोवर्धन का विवाह वर्ष 1996 में अंजू से हुआ था।
अभियोजन के अनुसार, पति और उसके पिता ने दहेज को लेकर अंजू को प्रताड़ित किया और फरवरी 2009 में उसे ससुराल से निकाल दिया।
इसके बाद अंजू ने IPC की धारा 498-A, 406 और 323 के तहत एफआईआर दर्ज कराई। उसने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत भी कार्यवाही शुरू की।
अभियोजन का आरोप था कि पति ने उसे चार पत्र भेजे, जिनमें अपमानजनक भाषा और जान से मारने की धमकियां थीं।
18 जनवरी 2011 को अंजू अपने मायके में आग लगने से झुलस गई और उसी दिन उसकी मृत्यु हो गई।
उसकी मां ने 2 फरवरी 2011 को शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर IPC की धारा 306 के तहत एफआईआर दर्ज हुई।
ट्रायल कोर्ट ने गोवर्धन को दस साल के कठोर कारावास और 50,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
11 मई 2017 को राजस्थान हाईकोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी थी।
आत्महत्या के आरोप से जुड़े अन्य साक्ष्यों में भी कमियां
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अस्पताल के रिकॉर्ड में अचानक आग लगने का उल्लेख था।
मृतका के पिता और भाई ने मृत्यु जांच की कार्यवाही के दौरान इसे आत्महत्या नहीं बताया था।
फॉरेंसिक रिपोर्ट में मिट्टी के तेल की गंध नहीं मिलने का उल्लेख था, जबकि पुलिस रिकॉर्ड में शॉर्ट सर्किट और गैस सिलेंडर का संदर्भ मौजूद था।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 498-A के तहत आरोप तय नहीं किया गया था।
शिकायत दर्ज करने में 15 दिन की देरी पर बेंच ने कहा:
“यदि उक्त आरोप में तनिक भी सच्चाई होती, तो शिकायतकर्ता रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए 15 दिन तक प्रतीक्षा नहीं करती।”
बचाव पक्ष ने आकस्मिक आग लगने की दलील दी
आरोपी ने CrPC की धारा 313 के तहत अपने बयान में कहा था कि उसकी पत्नी की मृत्यु संभवतः अचानक आग लगने की दुर्घटना में हुई थी।
उसका दावा था कि ससुराल वालों ने उसे झूठा फंसाने के लिए घटना को आत्महत्या का रूप दिया।
सुप्रीम कोर्ट में आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील कुमार जैन और राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता संस्कृति पाठक उपस्थित हुए।
सुप्रीम कोर्ट ने दस साल की सजा रद्द की
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन न तो विवादित पत्रों को आरोपी द्वारा लिखा जाना साबित कर सका और न ही यह स्थापित कर पाया कि वे पत्र मृतका को आत्महत्या के लिए उकसाने का तत्काल कारण थे।
बेंच ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले रद्द कर दिए।
कोर्ट ने गोवर्धन को आरोप से बरी कर दिया। चूंकि वह जमानत पर था, इसलिए उसके जमानत बांड भी समाप्त कर दिए गए।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Goverdhan vs State of Rajasthan
केस नंबर: Criminal Appeal No. 1394 of 2017
पीठ: जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय
फैसले की तारीख: 3 नवंबर 2026
