RTI के तहत उपलब्ध नहीं होने वाली जानकारी तैयार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत किसी सार्वजनिक प्राधिकरण को ऐसी जानकारी तैयार करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता, जिसका रिकॉर्ड उसके पास मौजूद नहीं है। कोर्ट ने इसी आधार पर केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ए.के. सीकरी द्वारा सुने गए मामलों में फैसले सुनाने में हुई देरी का विवरण उपलब्ध कराने को कहा गया था।

जस्टिस अमित महाजन ने 29 अक्टूबर के अपने आदेश में कहा कि केवल इस अनुमान के आधार पर सूचना देने का निर्देश नहीं दिया जा सकता कि संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत सूची तैयार किए जाने का मतलब यह नहीं है कि उसे वर्षों तक सुरक्षित भी रखा गया हो।

हाईकोर्ट के अनुसार, मांगी गई जानकारी देने के लिए संबंधित न्यायाधीश द्वारा सुने गए सभी मामलों के रिकॉर्ड की जांच करनी पड़ती, प्रत्येक मामले में फैसला सुनाने में लगे समय की गणना करनी होती और फिर एक नई सूची तैयार करनी पड़ती। RTI अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण को ऐसी नई जानकारी संकलित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

READ ALSO  मानहानि के मामले में राहुल की सजा: अपराध गंभीर नहीं है और न ही इसमें नैतिक अधमता शामिल है लेकिन परिणाम अपरिवर्तनीय हैं, सिंघवी ने हाईकोर्ट में कहा

सिर्फ अनुमान के आधार पर CIC ने दिया था आदेश

यह मामला पूर्व न्यायिक अधिकारी पी.डी. गुप्ता द्वारा अप्रैल 2009 में दाखिल RTI आवेदन से जुड़ा है। उन्होंने उन मामलों की जानकारी मांगी थी, जिनकी सुनवाई जस्टिस ए.के. सीकरी ने एकल न्यायाधीश या डिवीजन बेंच के सदस्य के रूप में की थी और जिनमें बहस पूरी होने के दो महीने से अधिक समय बाद फैसला सुनाया गया था।

CIC ने यह कहते हुए सूचना उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था कि कोर्ट मास्टर हर महीने ऐसी सूचियां तैयार करते हैं, इसलिए संबंधित जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। आयोग ने यह भी माना था कि जानकारी का खुलासा व्यापक जनहित में है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी सूचियां तैयार करने की प्रक्रिया होने मात्र से यह साबित नहीं होता कि उन्हें हर साल सुरक्षित रखा जाता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि RTI अधिनियम के तहत किसी रिकॉर्ड के मौजूद होने का अनुमान लगाकर उसके खुलासे का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

जनहित के आधार पर नई जानकारी तैयार करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता

जस्टिस महाजन ने माना कि समय पर फैसले सुनाया जाना जनहित से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि जनहित का सवाल तभी उठता है, जब मांगी गई जानकारी वास्तव में मौजूद हो।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सूचना देने के लिए संबंधित न्यायाधीश द्वारा सुने गए प्रत्येक मामले के रिकॉर्ड की जांच करनी पड़ती। इसके बाद बहस समाप्त होने और फैसला सुनाए जाने के बीच की अवधि की गणना करके नई सूची बनानी होती।

READ ALSO  मंदिरों में राजस्व नुकसान रोकने के लिए त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड लागू करे ऑडिट सिफारिशें: केरल हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने माना कि सार्वजनिक प्राधिकरण पर इस तरह जानकारी एकत्र और संकलित करने का कानूनी दायित्व नहीं डाला जा सकता।

कोर्ट ने PIO के उस हलफनामे पर भी ध्यान दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि मांगा गया डेटा न तो निर्धारित रूप में रखा जाता है और न ही संकलित किया जाता है। गुप्ता ने किसी जवाबी हलफनामे के जरिए इस दावे का खंडन नहीं किया था।

क्या था पूरा विवाद?

पी.डी. गुप्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट के खिलाफ एक मामला दाखिल किया था, जिसमें 31 जुलाई 2007 को बहस पूरी हो गई थी, लेकिन फैसला 2 मई 2008 को सुनाया गया।

इसके बाद उन्होंने अप्रैल 2009 में RTI आवेदन दाखिल कर जस्टिस सीकरी द्वारा सुने गए अन्य मामलों में फैसले सुनाने में हुई देरी का विवरण मांगा।

निर्धारित 30 दिनों के भीतर जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने पहली अपील दाखिल की। इसके बाद लोक सूचना अधिकारी (PIO) ने बताया कि इस प्रकार का डेटा विशेष रूप से तैयार या संकलित नहीं किया जाता है।

READ ALSO  न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से कोई इनकार नहीं कर सकता, जजों को 'होली काउ' मानने की जरूरत नहीं: मद्रास हाईकोर्ट

पहली अपील खारिज होने के बाद गुप्ता ने केंद्रीय सूचना आयोग का रुख किया।

CIC के समक्ष PIO ने दो आधारों पर सूचना देने का विरोध किया। पहला, मांगी गई जानकारी निर्धारित रूप में उपलब्ध नहीं थी। दूसरा, मुख्य न्यायाधीश को सीलबंद लिफाफे में भेजी जाने वाली जानकारी विश्वासगत संबंध (fiduciary capacity) के तहत रखी जाती थी और RTI अधिनियम में उसे खुलासे से छूट प्राप्त थी।

CIC ने दोनों दलीलें खारिज करते हुए जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ PIO ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए CIC का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक प्राधिकरण के पास उपलब्ध नहीं होने वाले रिकॉर्ड के बारे में केवल अनुमान के आधार पर सूचना उपलब्ध कराने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles