इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किए गए आरोपी को चार्जशीट दाखिल होने के बाद केवल बॉन्ड भरकर रिहा होने का स्वतः अधिकार नहीं मिलता। आरोपी को बॉन्ड पर रिहा करना ट्रायल कोर्ट के विवेकाधिकार का विषय है, जिसे किसी सामान्य न्यायिक निर्देश के जरिए सीमित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने Bacchi Devi v. State of U.P. मामले में हाईकोर्ट की समान स्तर की बेंच द्वारा जारी तीन निर्देशों से असहमति जताते हुए उनकी वैधता का प्रश्न बड़ी बेंच को भेज दिया।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी की रिहाई, अंतरिम संरक्षण की अवधि और जमानतदारों की संख्या से संबंधित निर्देश देते समय संबंधित वैधानिक प्रावधानों तथा सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसलों का पालन आवश्यक है।
दहेज मृत्यु के मामले से उठा विवाद
यह मामला औरैया जिले में दर्ज दहेज मृत्यु के एक मुकदमे से जुड़ा है। प्रथम सूचनाकर्ता ने आरोपियों की जमानत रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में आवेदन दाखिल किया था।
एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85, 80(2), 115(2) और 351(2) तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दर्ज हुई थी।
मामले में प्रतिवादी संख्या 2 से 4 मृतका के देवर, सास और ससुर हैं।
इससे पहले हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका में पुलिस रिपोर्ट दाखिल होने तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी।
पुलिस ने 3 दिसंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल की और 22 दिसंबर 2025 को अदालत ने संज्ञान लिया।
इसके बाद चार अलग-अलग तारीखों पर आरोपियों के खिलाफ जमानती वारंट जारी हुए। अंततः वे 2 मई 2026 को ट्रायल कोर्ट के सामने उपस्थित हुए।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), औरैया ने Bacchi Devi फैसले के निर्देशों का पालन करते हुए तीनों आरोपियों को बिना किसी जमानतदार के एक-एक लाख रुपये के व्यक्तिगत बॉन्ड पर रिहा कर दिया।
इसी आदेश को चुनौती देते हुए प्रथम सूचनाकर्ता ने जमानत रद्द करने का आवेदन दाखिल किया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से टकराव की दलील
प्रथम सूचनाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अंसार अहमद और संध्या चतुर्वेदी ने तर्क दिया कि Bacchi Devi के निर्देश सुप्रीम कोर्ट के Satender Kumar Antil और Musheer Alam फैसलों के अनुरूप नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि Satender Kumar Antil में बिना गिरफ्तार आरोपियों को बॉन्ड पर रिहा करने संबंधी दिशानिर्देश केवल सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों पर लागू होते हैं।
राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता डी.पी.एस. चौहान ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 441 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 485 के तहत जमानतदारों के संबंध में ट्रायल कोर्ट को विवेकाधिकार प्राप्त है।
न्यायमित्र जितेंद्र कुमार शिशोदिया ने Pankaj Jain v. Union of India फैसले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि CrPC की धारा 88 में प्रयुक्त ‘may’ शब्द स्पष्ट करता है कि बॉन्ड पर रिहाई अदालत के विवेक पर निर्भर है।
दूसरे न्यायमित्र रौनक चतुर्वेदी ने Sumit v. State of U.P. फैसले का हवाला देते हुए कहा कि चार्जशीट में गंभीर अपराध जोड़े जाने पर आरोपी को जमानत के लिए आवेदन करना आवश्यक है।
हाईकोर्ट के पैनल अधिवक्ता चंदन शर्मा ने बताया कि Bacchi Devi में जमानतदारों से संबंधित निर्देशों में संशोधन के लिए हाईकोर्ट की ओर से आवेदन दाखिल किया गया है, जो अभी लंबित है।
वहीं, प्रतिवादी संख्या 2 से 4 की ओर से अधिवक्ता जितेंद्र कुमार शर्मा और निमिष दुबे ने कहा कि Bacchi Devi के निर्देश किसी बड़ी बेंच ने रद्द नहीं किए हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट के लिए उनका पालन करना अनिवार्य था और उसके आदेश में कोई अवैधता नहीं थी।
सात वर्ष से अधिक सजा वाले अपराधों में अलग प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने Pankaj Jain फैसले के आधार पर कहा:
“जहां किसी व्यक्ति को जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया है, वहां चार्जशीट दाखिल होने पर उसे बॉन्ड के आधार पर रिहा किए जाने का कोई अपरिहार्य अधिकार प्राप्त नहीं होता।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Satender Kumar Antil के अनुसार, बिना जमानत आवेदन के बॉन्ड पर रिहाई की व्यवस्था सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में लागू हो सकती है। इसमें भी कुछ अपवाद हैं।
सात वर्ष से अधिक सजा वाले अपराधों में जमानत आवेदन का गुण-दोष के आधार पर निर्णय करना आवश्यक है।
लेकिन Bacchi Devi के निर्देश संख्या 38(i) में अपराधों की सजा के आधार पर ऐसा कोई अंतर नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि Pankaj Jain और Satender Kumar Antil के संबंधित हिस्से Bacchi Devi का फैसला देने वाली समान स्तर की बेंच के सामने प्रस्तुत नहीं किए गए थे।
अंतरिम संरक्षण को मुकदमे के अंत तक जारी रखने का निर्देश भी सवालों के घेरे में
हाईकोर्ट ने Bacchi Devi के निर्देश संख्या 38(iv) पर भी असहमति जताई।
इस निर्देश के तहत सीमित अवधि के लिए दिए गए संरक्षण को मुकदमे के अंत तक जारी माना गया था।
जस्टिस देशवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के Gurbaksh Singh Sibbia और Sushila Aggarwal फैसले विशेष परिस्थितियों में अदालतों को संरक्षण की अवधि सीमित करने की अनुमति देते हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“किसी अदालत या मजिस्ट्रेट को कानून के तहत प्राप्त विवेकाधिकार को उच्च अदालत किसी न्यायिक आदेश में सामान्य निर्देश जारी करके सीमित नहीं कर सकती।”
एक ही जमानतदार अनिवार्य करने पर भी आपत्ति
हाईकोर्ट ने Bacchi Devi के निर्देश संख्या 46 की भी जांच की, जिसमें एक जमानतदार के आधार पर रिहाई का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 441 के तहत एक या अधिक जमानतदारों की व्यवस्था है। ऐसे में न्यायिक निर्देश के जरिए इस वैधानिक प्रावधान को सीमित नहीं किया जा सकता।
बेंच ने कहा कि ऐसा करना “न्यायिक आदेश के माध्यम से कानून को दोबारा लिखने के समान है, जिसकी कानून में अनुमति नहीं है।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Bacchi Devi के निर्देश संख्या 38(i) का लाभ उसी आरोपी को मिल सकता है, जो समन पर अदालत में उपस्थित हुआ हो।
यह लाभ ऐसे आरोपी को नहीं मिलता, जो वारंट जारी होने के बाद अदालत में उपस्थित हुआ हो।
वर्तमान मामले में आरोपियों के खिलाफ कई बार जमानती वारंट जारी हुए थे।
तीन निर्देशों पर बड़ी बेंच करेगी विचार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Bacchi Devi फैसले के निर्देश संख्या 38(i), 38(iv) और 46 की वैधता का प्रश्न बड़ी बेंच को भेज दिया।
जस्टिस देशवाल ने निर्देश दिया कि मामला तीन दिनों के भीतर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए, ताकि बड़ी बेंच के गठन पर निर्णय लिया जा सके।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करने के आवेदन पर आगे की सुनवाई बड़ी बेंच द्वारा संदर्भित प्रश्नों का उत्तर दिए जाने के बाद होगी।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Arun Kumar v. State of U.P. and 3 Others
केस नंबर: Criminal Misc. Bail Cancellation Application No. 362 of 2026
पीठ: जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल
आदेश की तारीख: 26 अक्टूबर 2026
