बच्चे का हित सर्वोपरि: बॉम्बे हाईकोर्ट ने मां के स्वस्थ होने पर दंपति को दोबारा सौंपी गोद लेने से पहले की देखभाल की जिम्मेदारी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक दंपति को बच्चे की गोद लेने से पहले की देखभाल (प्री-अडॉप्शन फोस्टर केयर) की जिम्मेदारी दोबारा सौंपने की अनुमति दी है। दंपति ने महिला के मानसिक और भावनात्मक रूप से कठिन दौर से गुजरने के कारण पहले बच्चे की कस्टडी छोड़ दी थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे का कल्याण और उसका सर्वोत्तम हित सबसे महत्वपूर्ण है।

जस्टिस अश्विन डी. भोबे ने 13 अक्टूबर के आदेश में महिला की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट और बच्चे के साथ दंपति के भावनात्मक लगाव को ध्यान में रखते हुए आवेदन स्वीकार किया। हालांकि, कोर्ट ने बच्चे की सुरक्षा और देखभाल सुनिश्चित करने के लिए कुछ शर्तें भी लगाई हैं।

हाईकोर्ट ने पाया कि दंपति के साथ रहने के दौरान बच्चे का उनसे भावनात्मक जुड़ाव हो गया था। पत्नी की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए पति ने बच्चे के हित में उसकी कस्टडी छोड़ने का फैसला किया था। कोर्ट के अनुसार, यह निर्णय जल्दबाजी में लिया गया प्रतीत होता है, लेकिन इसके पीछे नीयत सही थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि दंपति के पास रहने के दौरान बच्चे को किसी प्रकार की हानि या परेशानी होने का कोई आरोप सामने नहीं आया।

बच्चे की सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट ने लगाईं शर्तें

हाईकोर्ट ने दंपति को अपने दो करीबी रिश्तेदारों या परिवार के सदस्यों के हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया है। इनमें यह भरोसा देना होगा कि किसी अप्रत्याशित परिस्थिति में वे बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी संभालेंगे और उसे किसी प्रकार की परेशानी नहीं होने देंगे।

इसके अलावा, गोवा की विशेष दत्तक ग्रहण एजेंसी मातृछाया को दंपति की होम स्टडी रिपोर्ट और बच्चे से संबंधित छह-छह महीने की फॉलोअप रिपोर्ट निर्धारित नियमों के अनुसार प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।

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कोल्हापुर के सीपीआर अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग ने महिला की जांच कर उसे अपनी और बच्चे की देखभाल करने के लिए सक्षम पाया था। रिपोर्ट में दंपति से बच्चे को किसी प्रकार का खतरा होने की बात सामने नहीं आई।

इन परिस्थितियों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत बच्चे की प्री-अडॉप्शन फोस्टर केयर दंपति को वापस सौंपना उचित माना।

कैसे शुरू हुई थी बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया?

दंपति ने चाइल्ड अडॉप्शन रिसोर्स इन्फॉर्मेशन एंड गाइडेंस सिस्टम में पंजीकृत एजेंसी के माध्यम से बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया शुरू की थी।

2 जून 2024 को मातृछाया एजेंसी के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने उनके घर का निरीक्षण किया और अनुकूल रिपोर्ट दी।

2 फरवरी 2024 को जन्मे बच्चे को बाल कल्याण समिति (CWC) ने 20 जनवरी 2025 को कानूनी रूप से गोद लेने के लिए उपलब्ध घोषित किया। समिति ने दंपति को भी गोद लेने के लिए योग्य और उपयुक्त पाया।

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16 अप्रैल 2025 को ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से बच्चे को दंपति के लिए रेफर किया गया। इसके बाद 28 अप्रैल को उसे प्री-अडॉप्शन फोस्टर केयर में रखा गया और आवश्यक समझौता पूरा होने पर 30 अप्रैल को दंपति ने उसकी कस्टडी प्राप्त की।

19 सितंबर 2025 को एजेंसी के सामाजिक कार्यकर्ता ने बच्चे की स्थिति का आकलन किया। रिपोर्ट में बच्चा स्वस्थ पाया गया। उसे उचित पोषण, टीकाकरण और बाल रोग विशेषज्ञ से उपचार मिल रहा था।

रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि बच्चे का दोनों अभिभावकों से भावनात्मक लगाव हो गया था और परिवार के सदस्य भी उसके साथ अच्छी तरह घुलमिल गए थे।

परिवार में मृत्यु के बाद बिगड़ी महिला की मानसिक स्थिति

महिला की सास के निधन के बाद वह भावनात्मक कठिनाइयों से गुजरने लगी। उसे लगातार उदासी, दैनिक गतिविधियों में रुचि की कमी, नींद और भूख संबंधी समस्याएं तथा काम पर ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होने लगी।

इस दौरान बच्चे की देखभाल को लेकर चिंतित पति ने जिला अदालत में हलफनामे के साथ आवेदन देकर उसकी कस्टडी जिला प्रोबेशन एंड आफ्टर केयर एसोसिएशन को सौंपने की मांग की।

जिला अदालत ने बच्चे को बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया। इसके बाद बच्चे को एसोसिएशन के हवाले कर दिया गया।

बाद में दंपति ने हाईकोर्ट का रुख कर बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी वापस मांगी।

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उनकी ओर से अधिवक्ता राजेश कचारे ने दलील दी कि असाधारण पारिवारिक परिस्थितियों के कारण बच्चे को अस्थायी रूप से सौंपा गया था। अब महिला अपने प्रियजन को खोने के सदमे से उबर चुकी है और बच्चे की देखभाल करने में सक्षम है।

एसोसिएशन ने मांगी मानसिक स्वास्थ्य की नियमित रिपोर्ट

जिला प्रोबेशन एंड आफ्टर केयर एसोसिएशन की ओर से अधिवक्ता पल्लवी थोराट ने कहा कि यदि कोर्ट बच्चे को वापस सौंपता है, तो दंपति से दो करीबी रिश्तेदारों के हलफनामे लिए जाने चाहिए।

उन्होंने दंपति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की रिपोर्ट के साथ महिला की मानसिक स्थिति से संबंधित हर छह महीने की रिपोर्ट एसोसिएशन को देने की मांग भी की।

हाईकोर्ट ने चिकित्सा रिपोर्ट और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद बच्चे की प्री-अडॉप्शन फोस्टर केयर दंपति को बहाल कर दी।

दंपति ने जिला प्रोबेशन एंड आफ्टर केयर एसोसिएशन को एक लाख रुपये दान देने की इच्छा भी जताई थी। कोर्ट ने इसकी अनुमति देते हुए निर्देश दिया कि इस राशि का उपयोग एसोसिएशन की देखरेख में रह रहे किसी अन्य जरूरतमंद बच्चे के कल्याण के लिए किया जाए।

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