सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में 2011 बैच के गजेटेड प्रोबेशनर्स की भर्ती को वैध बनाने के लिए लागू किए गए 2022 के कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी भर्ती को रद्द करने का निर्णय हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों बरकरार रख चुके हों, तो विधायिका नया कानून बनाकर उस निर्णय को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने Karnataka Civil Services (Validation of Selection and Appointment of 2011 Batch Gazetted Probationers) Act, 2022 को रद्द करते हुए इसके तहत हुई नियुक्तियां समाप्त करने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को ग्रुप ‘A’ और ‘B’ के रिक्त पदों पर नए सिरे से भर्ती करने तथा कुछ अभ्यर्थियों को आयु सीमा में एक बार छूट देने का निर्देश भी दिया।
फैसले की शुरुआत में कोर्ट ने टिप्पणी की:
“जब राजनीति की हवाएं अपना रुख बदलती हैं, तो उस तूफान में आम आदमी ही फंसता है।”
क्या था 2011 की भर्ती का विवाद?
कर्नाटक सरकार ने 3 नवंबर 2011 को ग्रुप ‘A’ और ‘B’ के 362 पदों पर भर्ती की अधिसूचना जारी की थी।
कुल 1,38,307 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया, जिनमें से 1,090 को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।
2013 में एक शिकायत मिलने के बाद राज्य सरकार ने अंतिम चयन सूची रोक दी और जांच राज्य सीआईडी को सौंप दी।
जांच में कर्नाटक लोक सेवा आयोग के अधिकारियों द्वारा बड़े पैमाने पर हेरफेर, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद सामने आया। इसके बाद पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द कर दी गई।
कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण ने भर्ती रद्द करने का निर्णय निरस्त कर दिया था। हालांकि, प्रभावित अभ्यर्थियों की जनहित याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने भर्ती रद्द करने का निर्णय बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी Avinash C. v. State of Karnataka मामले में इस निर्णय को सही ठहराया।
बाद में लिखित परीक्षा के चरण से भर्ती प्रक्रिया दोबारा शुरू करने का प्रयास भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौतियां भी सफल नहीं हुईं।
2022 में कानून बनाकर नियुक्तियों को दी गई वैधता
इन न्यायिक निर्णयों के बावजूद कर्नाटक सरकार ने 2022 में चयन और नियुक्तियों को वैध बनाने के लिए विशेष कानून बनाया।
362 चयनित अभ्यर्थियों में से 46 की भूमिका दूषित पाई गई थी। नए कानून के तहत 191 अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई, जिनमें 14 ऐसे अभ्यर्थी भी शामिल थे।
21 अप्रैल 2022 को हाईकोर्ट ने इस कानून को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
इसके अलावा 23 अगस्त 2022 को हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं की अलग चुनौती में अंतरिम राहत देने से इनकार करने वाले अधिकरण के आदेश को भी बरकरार रखा।
इन दोनों आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट में पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि 2022 का कानून वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए बनाया गया था।
उन्होंने तर्क दिया कि विधायिका हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अपीलीय अदालत की तरह बैठकर उसे पलट नहीं सकती।
कर्नाटक सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि संबंधित कानून का बचाव नहीं किया जा सकता।
वहीं, चयनित अभ्यर्थियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी.ए. सुंदरम और आनंद संजय एम. नूली ने कानून को वैध ठहराने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि किसी भी अभ्यर्थी का नाम एफआईआर या आरोपपत्र में नहीं था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राज्य सरकार ने बाद में अपना रुख बदल लिया था और नियुक्त अभ्यर्थियों के पक्ष में न्यायसंगत आधारों पर राहत दी जानी चाहिए।
भ्रष्टाचार से प्रभावित भर्ती में न्यायसंगत राहत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2011 की भर्ती किसी मामूली प्रक्रियागत कमी के कारण रद्द नहीं हुई थी। पूरी चयन प्रक्रिया भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से प्रभावित थी।
बेंच ने कहा:
“चयनित अभ्यर्थियों के पक्ष में न्यायसंगत राहत का कोई आधार नहीं हो सकता, विशेष रूप से तब, जब चयन ऐसी भर्ती पर आधारित हो जिसे संवैधानिक अदालतों ने दूषित घोषित किया है और नियुक्तियां ऐसे कानून के आधार पर की गई हों जो शुरू से ही निष्प्रभावी था, अर्थात 2022 का अधिनियम।”
कोर्ट ने Medical Council of India v. State of Kerala, Janapada Sabha, Chhindwara, In re: Cauvery Water Disputes Tribunal और S.T. Sadiq v. State of Kerala के फैसलों का उल्लेख किया।
बेंच ने स्पष्ट किया कि विधायिका किसी न्यायिक निर्णय के आधार को बदलने के लिए कानून बना सकती है, लेकिन अंतिम न्यायिक फैसले को सीधे रद्द नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“विधायिका के पास यह शक्ति नहीं है कि वह कानून बनाकर भी भर्ती रद्द करने के निर्णय को समाप्त कर दे और इस प्रकार संवैधानिक अदालतों के फैसलों को निष्प्रभावी बना दे।”
दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों को अलग करने की मांग खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने चयनित अभ्यर्थियों को दूषित और गैर-दूषित श्रेणियों में अलग करके नियुक्तियां बचाने का अनुरोध भी स्वीकार नहीं किया।
बेंच ने कहा कि पूरी भर्ती प्रक्रिया पहले ही रद्द हो चुकी थी और बाद की नियुक्तियों का एकमात्र आधार 2022 का असंवैधानिक कानून था।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के विवादित आदेशों पर भी असंतोष व्यक्त किया और कहा कि उनमें मुद्दों का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया था।
बेंच ने टिप्पणी की:
“विवादित फैसलों के संबंध में हम थोड़े आश्चर्य और उससे कहीं अधिक चिंता को दर्ज किए बिना नहीं रह सकते।”
नई भर्ती का आदेश, कुछ अभ्यर्थियों को आयु सीमा में छूट
सुप्रीम कोर्ट ने 2022 का कानून और हाईकोर्ट के दोनों विवादित आदेश रद्द कर दिए। कोर्ट ने जनहित याचिका स्वीकार करते हुए अपीलकर्ताओं को याचिकाकर्ताओं के रूप में शामिल करने का आदेश दिया।
लगभग डेढ़ दशक बीत जाने के कारण बेंच ने पुरानी भर्ती प्रक्रिया दोबारा शुरू करने से इनकार कर दिया।
इसके बजाय राज्य सरकार को मौजूदा नियमों के अनुसार ग्रुप ‘A’ और ‘B’ के रिक्त पदों पर नई भर्ती की अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया गया।
इस भर्ती में आयु सीमा में एक बार छूट उन नियुक्त अभ्यर्थियों को मिलेगी जिनकी भूमिका दूषित नहीं पाई गई, साथ ही छह अपीलकर्ताओं और प्रशासनिक अधिकरण के समक्ष याचिका दाखिल करने वालों को भी यह लाभ मिलेगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नए चयन के बाद वरिष्ठता की गणना केवल नई नियुक्ति की तारीख से होगी। किसी को पिछला वेतन या पूर्व तारीख से काल्पनिक नियुक्ति का लाभ नहीं मिलेगा।
हालांकि, वर्तमान में सेवा कर रहे अभ्यर्थियों का दोबारा चयन होने पर उनकी पिछली सेवा पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों की गणना में शामिल की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलें स्वीकार करते हुए पक्षकार बनाए जाने और हस्तक्षेप की अनुमति मांगने वाले आवेदन खारिज कर दिए।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Srinivasa T. & Ors. v. The State of Karnataka and Ors.
केस नंबर: Civil Appeals arising out of SLP (C) Nos. 21195-21196 of 2023
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
फैसले की तारीख: 29 अक्टूबर 2026
