इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नाबालिग लड़की की सहमति रेप के आरोप में कानूनी बचाव का आधार नहीं हो सकती। कोर्ट ने 16 वर्षीय लड़की को फरीदाबाद ले जाकर लगभग 12 से 13 दिनों तक अपने साथ रखने और उसके साथ रेप करने के मामले में एक विवाहित व्यक्ति की दोषसिद्धि बरकरार रखी है।
जस्टिस अब्दुल शाहिद ने दोषी की आपराधिक अपील खारिज करते हुए IPC की धारा 363, 366 और 376 के तहत ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई अधिकतम 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी। जमानत पर चल रहे दोषी को 15 दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
गाजियाबाद की फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या दो/अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 20 फरवरी 2016 को आरोपी को IPC की धारा 363 के तहत पांच वर्ष, धारा 366 के तहत सात वर्ष और धारा 376 के तहत 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
इन धाराओं के तहत क्रमशः 5,000 रुपये, 10,000 रुपये और 20,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। सभी सजाएं एक साथ चलाने का आदेश दिया गया था।
अभियोजन के अनुसार, पीड़िता पढ़ाई के लिए अपने मामा के घर रह रही थी। 30 और 31 मार्च 2014 की रात परिवार के सदस्य पड़ोस में जागरण में गए थे, उसी दौरान लड़की लापता हो गई।
8 अप्रैल 2014 को मुरादनगर थाने में FIR दर्ज कराई गई। पुलिस ने 13 अप्रैल को दुहाई बस स्टैंड से लड़की को आरोपी के साथ बरामद किया।
CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयान में पीड़िता ने बताया कि आरोपी ने अपनी पत्नी से विवाद होने की बात कहकर उससे शादी का वादा किया था।
पीड़िता के अनुसार, आरोपी उसे फरीदाबाद ले गया, जहां उसने किराये पर कमरा लिया और उसे अपनी पत्नी बताकर उसके साथ प्रतिदिन रेप किया।
ट्रायल कोर्ट में गवाही देते हुए पीड़िता ने कहा कि विरोध करने पर आरोपी ने उसका मुंह दबाया, मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले गया और कमरे में बंद रखा।
अपील में मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल
दोषी की ओर से दलील दी गई कि उसे झूठा फंसाया गया है। अभियोजन का मामला पीड़िता और उसके रिश्तेदारों की गवाही पर आधारित है तथा इसकी पुष्टि करने वाला कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं है।
बचाव पक्ष ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि डॉक्टर को पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली थी। जांच में शुक्राणु भी नहीं पाए गए और डॉक्टर ने जबरन यौन संबंध के संबंध में कोई निश्चित राय नहीं दी थी।
राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता प्रथम झम्मन राम ने कहा कि पीड़िता की गवाही स्पष्ट और सुसंगत है तथा CrPC की धारा 164 के तहत दिए गए उसके बयान से मेल खाती है।
उन्होंने बताया कि हाईस्कूल प्रमाणपत्र के अनुसार पीड़िता की जन्मतिथि 3 मार्च 1998 थी। साथ ही चोटों या शुक्राणुओं का नहीं मिलना अपने आप में रेप के आरोप को खारिज नहीं करता।
नाबालिग होने पर सहमति का सवाल नहीं उठता
हाईकोर्ट ने पाया कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा जारी रेडियोलॉजिकल प्रमाणपत्र में पीड़िता की उम्र 18 वर्ष दर्ज थी, लेकिन उसे ट्रायल के दौरान साक्ष्य के रूप में प्रदर्शित नहीं किया गया था।
इसके विपरीत, पीड़िता और विवेचना अधिकारी द्वारा सत्यापित हाईस्कूल प्रमाणपत्र से उसके नाबालिग होने की पुष्टि होती थी।
कोर्ट ने कहा:
“पीड़िता के नाबालिग होने के कारण सहमति का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि यदि उसकी सहमति होने का दावा भी किया जाए, तो वह कानून के तहत वैध बचाव नहीं होगी।”
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी विवाहित था और उसके तीन बच्चे थे। वह पीड़िता का दूर का ममेरा रिश्तेदार था तथा उस पर प्रभाव रखने की स्थिति में था।
चोटों का नहीं मिलना पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को खारिज नहीं करता
हाईकोर्ट ने State of Punjab v. Gurmit Singh और State of U.P. v. Pappu @ Yunus सहित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।
कोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है, तो स्वतंत्र पुष्टि के बिना भी उसके आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है।
बेंच ने कहा:
“पीड़िता के शरीर पर बाहरी चोटों का नहीं मिलना और जबरन यौन संबंध के संबंध में मेडिकल राय का कोई निश्चित निष्कर्ष न देना, अपने आप में उसकी अन्यथा विश्वसनीय गवाही को अविश्वसनीय नहीं बनाता।”
हाईकोर्ट ने FIR दर्ज करने में देरी और जांच में कथित कमियों से संबंधित दलीलों पर भी विचार किया।
कोर्ट ने पाया कि FIR में देरी के संबंध में अभियोजन का स्पष्टीकरण उसके पूरे मामले को खारिज करने का आधार नहीं था।
कोर्ट ने कहा:
“जांच में कोई कमी या चूक होने से आरोपी स्वतः बरी होने का हकदार नहीं हो जाता, यदि अन्य ठोस साक्ष्य अभियोजन के मामले को स्थापित करते हैं।”
हाईकोर्ट ने अपील खारिज की
हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद थी और ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किया था।
जस्टिस अब्दुल शाहिद ने दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखते हुए आपराधिक अपील खारिज कर दी।
कोर्ट ने जमानत पर चल रहे दोषी को 15 दिनों के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण कर शेष सजा भुगतने का निर्देश दिया। पहले जेल में बिताई गई अवधि का समायोजन किया जाएगा।
यदि दोषी निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो ट्रायल कोर्ट उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कार्रवाई कर सकती है।
केस डिटेल्स
केस का नाम: Padam Singh @ Padmi v. State of U.P.
केस नंबर: Criminal Appeal No. 4246 of 2017
पीठ: जस्टिस अब्दुल शाहिद
फैसले की तारीख: 26 अक्टूबर 2026
