हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अपनी मंगेतर के साथ कथित यौन उत्पीड़न और मारपीट के आरोपी व्यक्ति को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला के साथ प्रेम संबंध में होने या सगाई हो जाने से पुरुष को उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाने का अधिकार नहीं मिल जाता।
जस्टिस चिराग भानु सिंह ने 12 अक्टूबर के आदेश में कहा कि महिला के शरीर पर जलने के निशान और अन्य चोटों की पुष्टि मेडिकल साक्ष्यों से हुई है। कोर्ट ने आरोपी के कथित व्यवहार को अमानवीय बताते हुए कहा कि चोटों की प्रकृति क्रूर और विकृत मानसिकता को दर्शाती है।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी रिश्ते में महिला की असहमति का सम्मान करना जरूरी है। साथ ही अंतरिम संरक्षण मिलने के बाद आरोपी के व्यवहार पर भी चिंता जताई।
मेडिकल साक्ष्यों से महिला के आरोपों को समर्थन
मामला एक महिला की पुलिस शिकायत से जुड़ा है। महिला ने आरोप लगाया कि अगस्त में साथ रहने के दौरान उसके मंगेतर ने उसका यौन उत्पीड़न किया और उसके साथ शारीरिक हिंसा की।
शिकायत के अनुसार, आरोपी के कारण गर्दन में आई चोट के चलते उसे पहले भी 15 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी नशीले पदार्थों का सेवन करता था, जिसका वह विरोध करती थी।
महिला ने कथित घटना के दो दिन बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।
अग्रिम जमानत पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि महिला के शरीर पर जलने के निशान सहित अन्य चोटों से संबंधित आरोपों को मेडिकल साक्ष्यों का समर्थन प्राप्त है।
आरोपी ने 10 साल पुराने रिश्ते और झूठे फंसाए जाने का दिया तर्क
आरोपी की ओर से सीनियर एडवोकेट एन.एस. चंदेल ने दलील दी कि दोनों करीब 10 वर्षों से रिश्ते में थे और उनकी सगाई भी हो चुकी थी।
बचाव पक्ष ने शिकायत दर्ज कराने में दो दिन की देरी पर सवाल उठाया। साथ ही दावा किया कि आरोपी को कथित अपराध से जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद नहीं है।
आरोपी ने अग्रिम जमानत की मांग करते हुए कहा कि उसके फरार होने की कोई आशंका नहीं है। जांच भी पूरी बताई जा रही है और ऐसी स्थिति में उसकी गिरफ्तारी से न्याय के उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी।
उसने यह भी बताया कि वह अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य है।
दूसरी ओर, महिला की ओर से एडवोकेट शीतल व्यास ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का अर्थ यह नहीं है कि महिला ने हर तरह की यौन गतिविधि के लिए सहमति दे दी है।
उन्होंने आरोप लगाया कि जमानत याचिका दाखिल होने के बाद भी आरोपी महिला और अन्य गवाहों से संपर्क कर उन्हें प्रभावित करने, दबाव बनाने और धमकाने का प्रयास कर रहा था।
शिकायत में दो दिन की देरी को कोर्ट ने नहीं माना निर्णायक
हाईकोर्ट ने कहा कि कथित घटना के दो दिन बाद शिकायत दर्ज कराए जाने को अग्रिम जमानत के स्तर पर अभियोजन के मामले के लिए घातक नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने इस संबंध में दोनों पक्षों के लंबे समय से चले आ रहे रिश्ते की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा।
जस्टिस सिंह ने कहा कि किसी महिला के साथ संबंध होने से पुरुष को उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन उत्पीड़न करने का अधिकार नहीं मिल जाता। महिला की ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ ही होता है।
कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों में दर्ज चोटों की गंभीरता के साथ-साथ अंतरिम संरक्षण मिलने के बाद आरोपी के कथित व्यवहार पर भी गौर किया।
अग्रिम जमानत में अपराध की गंभीरता और सार्वजनिक हित भी महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत का प्रावधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों की सुरक्षा के लिए है, लेकिन ऐसे मामलों में न्याय, निष्पक्षता और सार्वजनिक हित को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
कोर्ट के अनुसार, अग्रिम जमानत पर फैसला करते समय कथित अपराध की गंभीरता और समाज पर उसके प्रभाव का आकलन किया जाना चाहिए। हालांकि, प्रत्येक मामले का निर्णय उसके अपने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।
महिला के आरोपों, मेडिकल साक्ष्यों और मामले की अन्य परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
