हत्या के समय नाबालिग था दोषी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, सजा तय करने का मामला किशोर न्याय बोर्ड को भेजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वर्ष 1999 के हत्या मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा निर्धारित करने का मामला किशोर न्याय बोर्ड को भेज दिया है। कोर्ट ने पाया कि घटना के समय दोषी की उम्र 17 वर्ष थी और उसे किशोर न्याय कानून के अनुसार ही सजा दी जा सकती है।

जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने आपराधिक अपील को सजा के प्रश्न पर आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा कि अपराध का दोषी पाया गया किशोर बिना दंड के नहीं रह सकता, लेकिन उसके लिए उचित दंड का निर्धारण किशोर न्याय बोर्ड करेगा।

क्या था मामला?

सुल्तानपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या चार ने 4 फरवरी 2002 को अपीलकर्ता को IPC की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। जुर्माना नहीं भरने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कठोर कारावास भी निर्धारित किया गया था।

अभियोजन के अनुसार, 22 वर्षीय अजय कुमार सिंह बीए तृतीय वर्ष का छात्र था। वह 2 फरवरी 1999 को कॉलेज जाने के लिए घर से निकला था। उसकी मां ने बताया कि उसी दोपहर उसने अजय को अपीलकर्ता और एक सह-आरोपी के साथ जाते देखा था।

अगली सुबह अजय का शव बल्दीराय थाना क्षेत्र के नरसिंहपुर गांव में एक नहर के पास मिला।

पोस्टमार्टम में शरीर पर मृत्यु से पहले धारदार हथियार से लगी 44 चोटें पाई गईं। दोनों हाथों पर बचाव के दौरान लगी चोटें भी मौजूद थीं।

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अपीलकर्ता की निशानदेही पर लोहे का गंडासा और खून से सना स्वेटर बरामद हुआ। फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट में कपड़ों पर मानव रक्त और गंडासे पर विघटित रक्त की पुष्टि हुई।

ट्रायल कोर्ट ने सह-आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था, जबकि अपीलकर्ता को दोषी ठहराया था।

स्कूल प्रमाणपत्रों से साबित हुई घटना के समय उम्र

अपील लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ता को किशोर घोषित करने के लिए आवेदन दाखिल किया गया।

उसकी ओर से अधिवक्ता एस.सी. श्रीवास्तव ने हाईस्कूल प्रमाणपत्र और कक्षा आठ के स्थानांतरण प्रमाणपत्र का हवाला दिया। दोनों दस्तावेजों में जन्मतिथि 15 नवंबर 1981 दर्ज थी।

उन्होंने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 7A के तहत किशोर होने का दावा किसी भी चरण में, यहां तक कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी उठाया जा सकता है।

राज्य सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में स्वीकार किया कि दस्तावेजों का सत्यापन किया गया और जन्मतिथि 15 नवंबर 1981 सही पाई गई।

हाईकोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 94 का उल्लेख किया, जिसके तहत मैट्रिक या स्कूल के जन्मतिथि प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जाती है।

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बेंच ने पाया कि घटना के समय अपीलकर्ता की उम्र 17 वर्ष, 2 महीने और 17 दिन थी। इसलिए वह किशोर था।

हत्या की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप से इनकार

अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि वह दोषसिद्धि को चुनौती नहीं देना चाहता। उसकी मांग केवल यह थी कि Mumtaz v. State of U.P., (2016) 11 SCC 786 के फैसले के अनुसार सजा का प्रश्न किशोर न्याय बोर्ड को भेजा जाए।

अपर शासकीय अधिवक्ता ने सत्यापित जन्मतिथि या Mumtaz फैसले में निर्धारित कानूनी सिद्धांत पर कोई विवाद नहीं किया।

हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की जांच करते हुए मृतक को आखिरी बार आरोपियों के साथ देखने वाले गवाहों की गवाही विश्वसनीय पाई।

बेंच ने कहा:

“उनकी गवाही पूरी तरह कायम रही और वे अत्यंत उच्च विश्वसनीयता वाले गवाह हैं।”

कोर्ट ने स्वतंत्र गवाह द्वारा समर्थित हथियार की बरामदगी और FSL रिपोर्ट को भी महत्वपूर्ण माना।

बेंच ने कहा:

“हमें अपीलकर्ता-दोषी के संबंध में दिए गए विवादित फैसले और दोषसिद्धि में कोई विकृति या गैरकानूनी बात नहीं मिली।”

किशोर को दंडित करने का निर्णय बोर्ड करेगा

सुप्रीम कोर्ट के Mumtaz फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“जहां किसी किशोर को उसके द्वारा कथित रूप से किए गए अपराध का दोषी पाया जाता है, वहां उसे बिना दंड के नहीं छोड़ा जा सकता, लेकिन उसे क्या दंड दिया जाना चाहिए, इसका निर्णय अधिनियम के तहत गठित किशोर न्याय बोर्ड पर छोड़ा जाना चाहिए।”

बेंच ने कहा कि घटना के समय किशोर न्याय अधिनियम, 1986 लागू था। इसलिए किशोर के संबंध में केवल वही दंड या आदेश पारित किए जा सकते हैं, जिनकी संबंधित किशोर न्याय कानून अनुमति देता है।

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हाईकोर्ट का फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने हत्या की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा निर्धारित करने का मामला संबंधित किशोर न्याय बोर्ड को भेज दिया।

पहले से जमानत पर चल रहे अपीलकर्ता को निर्देश दिया गया कि वह फैसले की प्रमाणित प्रति के साथ 27 अक्टूबर 2026 को बोर्ड के सामने उपस्थित हो।

हाईकोर्ट ने बोर्ड को फैसले की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर सजा के संबंध में आदेश पारित करने का निर्देश दिया।

केस डिटेल्स

केस का नाम: अपीलकर्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (अपीलकर्ता का नाम गोपनीय)

केस नंबर: Criminal Appeal No. 253 of 2002

पीठ: जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव

फैसले की तारीख: 13 अक्टूबर 2026

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