कंपनी के प्रबंधन और नीतियों पर व्यापक नियंत्रण रखने वाला कर्जदाता ‘रिलेटेड पार्टी’, CoC में शामिल नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी कंपनी के प्रबंधन, व्यावसायिक नीतियों और परियोजनाओं पर व्यापक नियंत्रण रखने वाले डिबेंचर धारक या कर्जदाता को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) के तहत ‘रिलेटेड पार्टी’ माना जाएगा। ऐसा कर्जदाता कॉरपोरेट देनदार की कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) में शामिल होने का पात्र नहीं है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने ECL Finance Limited और IDBI Trusteeship Services Limited की अपीलें खारिज करते हुए Palm Developers Private Limited की CoC से उन्हें बाहर रखने के फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि IBC की धारा 5(24)(m)(i) के तहत किसी संस्था को रिलेटेड पार्टी मानने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह कंपनी का पूरा संचालन अपने हाथ में रखती हो। कंपनी की नीतियां निर्धारित करने और व्यावसायिक निर्णयों को प्रभावित करने में उसकी भागीदारी भी पर्याप्त हो सकती है।

डिबेंचर और लोन समझौतों से शुरू हुआ विवाद

मामला Palm Developers Private Limited की कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) से संबंधित है।

Palm Developers ने Saha Infratech Private Limited (SIPL) द्वारा जारी डिबेंचर और प्राप्त ऋण सुविधाओं के लिए गारंटर की भूमिका निभाई थी।

13 मई 2016 को एक डिबेंचर ट्रस्ट डीड और 22 सितंबर 2017 को एक फैसिलिटी एग्रीमेंट किया गया था।

SIPL ने दो चरणों में 160 करोड़ रुपये के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर जारी करने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, केवल पहले चरण के 110 करोड़ रुपये के डिबेंचर सब्सक्राइब किए गए। ये सभी डिबेंचर अब ECL Finance के पास हैं।

IDBI Trusteeship Services Limited (ITSL) को डिबेंचर ट्रस्टी नियुक्त किया गया था।

इसके अलावा SIPL ने ECL से 90 करोड़ रुपये की रिवॉल्विंग क्रेडिट सुविधा भी प्राप्त की थी। इस समझौते में Palm Developers को ऑब्लिगर नंबर 5 बनाया गया था।

CoC में शामिल किए जाने पर होमबायर ने उठाई आपत्ति

Palm Developers के खिलाफ 27 जनवरी 2020 को CIRP शुरू हुई।

इसके बाद ITSL ने डिबेंचर ट्रस्टी के रूप में लगभग 131.17 करोड़ रुपये का दावा प्रस्तुत किया, जबकि ECL ने टर्म लोन के तहत लगभग 139.02 करोड़ रुपये का दावा किया।

दोनों संस्थाओं को वित्तीय कर्जदाता मानते हुए CoC में शामिल कर लिया गया।

हालांकि, एक व्यक्तिगत होमबायर ने उनकी सदस्यता पर आपत्ति जताई। उसका कहना था कि दोनों संस्थाएं कॉरपोरेट देनदार से संबंधित पक्ष हैं और इसलिए उन्हें CoC में मतदान का अधिकार नहीं मिल सकता।

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने दोनों को IBC की धारा 5(24)(m)(i) के तहत रिलेटेड पार्टी माना।

नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने भी इस निष्कर्ष को बरकरार रखा।

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इसके बाद ECL Finance और ITSL ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की।

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मित्रा पेश हुए, जबकि प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत मेहता और अरिजीत प्रसाद ने पक्ष रखा।

गारंटर की देनदारी भी वित्तीय ऋण हो सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले इस प्रश्न पर विचार किया कि कॉरपोरेट गारंटी के आधार पर किए गए दावों को वित्तीय ऋण माना जा सकता है या नहीं।

कोर्ट ने पाया कि NCLT ने Anuj Jain v. Axis Bank Limited फैसले की गलत व्याख्या करते हुए यह निष्कर्ष निकाला था कि गारंटर की देनदारी वित्तीय ऋण नहीं है।

बेंच ने इस निष्कर्ष को सही नहीं माना।

सुप्रीम कोर्ट ने China Development Bank v. Doha Bank Q.P.S.C. फैसले का हवाला देते हुए NCLAT के उस दृष्टिकोण को भी गलत बताया, जिसके अनुसार CIRP शुरू होने से पहले कॉरपोरेट गारंटी लागू नहीं किए जाने के कारण संबंधित दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता था।

हालांकि, इन कानूनी त्रुटियों के बावजूद कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ताओं को CoC से बाहर रखने का अंतिम निष्कर्ष सही था, क्योंकि वे रिलेटेड पार्टी की श्रेणी में आते थे।

व्यक्तिगत होमबायर भी CoC में रिलेटेड पार्टी की सदस्यता को चुनौती दे सकता है

अपील में यह सवाल भी उठा कि क्या एक व्यक्तिगत होमबायर को CoC में किसी वित्तीय कर्जदाता की सदस्यता पर आपत्ति उठाने का अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर NCLAT के निष्कर्ष से सहमति जताई।

बेंच ने Phoenix ARC Private Limited v. Spade Financial Services Limited फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि एक व्यक्तिगत वित्तीय कर्जदाता भी CoC में रिलेटेड पार्टी को शामिल किए जाने पर आपत्ति उठा सकता है।

इस प्रकार कोर्ट ने होमबायर की ओर से उठाई गई चुनौती को विचार योग्य माना।

रिलेटेड पार्टी तय करने के लिए कंपनी पर पूर्ण नियंत्रण जरूरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने IBC की धारा 5(24) और धारा 29A के तहत नियंत्रण की अवधारणा में महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया।

कोर्ट ने ArcelorMittal India Private Limited v. Satish Kumar Gupta फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 29A(c) और 29A(g) के संदर्भ में नियंत्रण का अर्थ सक्रिय और सकारात्मक नियंत्रण है।

लेकिन धारा 5(24)(m)(i) के तहत किसी व्यक्ति या संस्था को रिलेटेड पार्टी मानने के लिए इतना व्यापक नियंत्रण साबित करना आवश्यक नहीं है।

इस प्रावधान के तहत यह देखना पर्याप्त है कि संबंधित पक्ष कंपनी की नीतियां बनाने की प्रक्रिया में किस हद तक भाग लेता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“इसके लिए कंपनी के संचालन की कमान पूरी तरह अपने हाथ में होना आवश्यक नहीं है। नीतियां निर्धारित करने और व्यावसायिक हितों को दिशा देने में मार्गदर्शक की भूमिका निभाना भी पर्याप्त होगा।”

बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी कर्जदाता का प्रभाव केवल ऋण की सुरक्षा तक सीमित है या वह कंपनी के वास्तविक व्यावसायिक निर्णयों को भी नियंत्रित करता है, यह निर्धारित करना महत्वपूर्ण है।

डिबेंचर धारकों को कंपनी के फैसलों में अंतिम अधिकार मिला था

सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की धारा 7.1 की जांच की।

इस प्रावधान के अनुसार, बोर्ड या शेयरधारकों की बैठक में किसी मुद्दे पर गतिरोध उत्पन्न होने की स्थिति में डिबेंचर धारकों और कर्जदाताओं को अंतिम निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त था।

कोर्ट ने डिबेंचर ट्रस्ट डीड में किए गए संशोधन पर भी ध्यान दिया।

इस संशोधन के तहत डिबेंचर ट्रस्टी को निर्माण परियोजना के तिमाही बजट को मंजूरी देने या उसमें बदलाव करने का अधिकार दिया गया था।

बेंच ने कहा कि यह प्रावधान डिबेंचर धारक और ट्रस्टी को कंपनी के संचालन में सक्रिय भूमिका प्रदान करता था।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह स्पष्ट रूप से डिबेंचर धारक और ट्रस्टी को कठिन परिस्थितियों में SIPL कंपनी को दिशा देने में सक्रिय भूमिका प्रदान करता है। इसका प्रभाव उस कॉरपोरेट देनदार पर भी पड़ता है, जिसने सुरक्षा प्रदान की है।”

ECL को निदेशक नियुक्त करने से लेकर प्रॉपर्टी बेचने तक के अधिकार थे

सुप्रीम कोर्ट ने फैसिलिटी एग्रीमेंट और मंजूरी पत्र की शर्तों का भी परीक्षण किया।

इन दस्तावेजों के अनुसार ECL को कंपनी में अपना नामित निदेशक और एक पर्यवेक्षक नियुक्त करने का अधिकार था।

प्रमुख प्रबंधकीय कर्मचारियों को हटाने के लिए भी ECL की सहमति आवश्यक थी।

इसके अतिरिक्त ECL को रियल एस्टेट एजेंट नियुक्त करके परियोजना की यूनिट बेचने का अधिकार दिया गया था।

एक पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए ECL को निर्माण कार्य, आवश्यक मंजूरियों और बिक्री से जुड़े व्यापक अधिकार भी प्राप्त थे।

बेंच की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने पाया कि ECL का कर्ज लेने वाली कंपनी की परियोजनाओं पर व्यापक नियंत्रण था।

कोर्ट ने कहा कि इन अधिकारों को केवल प्रतिबंधात्मक या नकारात्मक नियंत्रण नहीं कहा जा सकता।

ये अधिकार कंपनी की परियोजनाओं के संचालन और महत्वपूर्ण व्यावसायिक निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता प्रदान करते थे।

डिबेंचर धारक और कर्जदाता, दोनों भूमिकाओं में CoC सदस्यता पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि SIPL के सभी 110 करोड़ रुपये के डिबेंचर ECL के पास थे।

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ITSL डिबेंचर ट्रस्टी के रूप में ECL के हितों की सुरक्षा के लिए कार्य कर रही थी।

ऐसी स्थिति में ECL को रिलेटेड पार्टी मानने के कारण ITSL भी CoC में शामिल होने की पात्र नहीं थी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ECL की डिबेंचर धारक के रूप में स्थिति उसे ऋणदाता की अलग भूमिका में भी CoC की सदस्यता प्राप्त करने से रोकती है।

बेंच ने माना कि किसी संस्था की अलग-अलग वित्तीय भूमिकाओं के आधार पर उसके वास्तविक नियंत्रण और रिलेटेड पार्टी की स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

CIRP शुरू होने के बाद अधिकारों का ट्रांसफर वास्तविक नहीं माना गया

मामले में ECL द्वारा फैसिलिटी एग्रीमेंट के तहत अपने अधिकार दूसरे अपीलकर्ता को ट्रांसफर किए जाने का प्रश्न भी उठा।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह ट्रांसफर CIRP शुरू होने के काफी समय बाद किया गया था।

बेंच ने Phoenix ARC फैसले के आधार पर कहा कि इस हालिया ट्रांसफर को रिलेटेड पार्टी संबंधी प्रतिबंध से बचने के प्रयास के रूप में ही देखा जा सकता है।

कोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा उल्लेखित फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया, जिसमें धन के कथित डायवर्जन से संबंधित बातें सामने आई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“इसलिए यह अधिकार हस्तांतरण वास्तविक और सद्भावनापूर्ण हस्तांतरण की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।”

बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल अधिकारों का ट्रांसफर कर देने से किसी रिलेटेड पार्टी को CoC में शामिल होने की पात्रता नहीं मिल सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें खारिज कीं

सभी समझौतों, दस्तावेजों और पक्षकारों के अधिकारों की जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ECL का कॉरपोरेट देनदार से जुड़ी परियोजनाओं और व्यावसायिक निर्णयों पर व्यापक नियंत्रण था।

इसलिए ECL और ITSL को IBC की धारा 5(24) के तहत रिलेटेड पार्टी मानकर CoC से बाहर रखना उचित था।

बेंच ने कहा कि NCLAT के आदेश में कानून का ऐसा कोई प्रश्न या विकृत निष्कर्ष नहीं है, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलें खारिज कर दीं और संबंधित अवमानना याचिकाओं का भी निपटारा कर दिया।

केस डिटेल्स

केस का नाम: ECL Finance Ltd. and Anr. v. Abhinav Mukherjee and Ors.

केस नंबर: Civil Appeal No. 6268 of 2022 और Civil Appeal No. 6273 of 2022

पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

फैसले की तारीख: 27 अक्टूबर 2026

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