सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) द्वारा अतिबीर इंडस्ट्रीज कंपनी लिमिटेड का कर्ज एक एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को ट्रांसफर किए जाने से जुड़े लंबे विवाद का निपटारा कर दिया है। कोर्ट ने अतिबीर इंडस्ट्रीज को पहले से भुगतान किए गए ₹250 करोड़ के अतिरिक्त ₹125 करोड़ का भुगतान करने का निर्देश दिया है। इस तरह कुल ₹375 करोड़ के भुगतान से दोनों पक्षों के बीच विवाद का पूर्ण और अंतिम निपटारा होगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि वह इस सवाल पर कोई फैसला नहीं दे रही है कि कंपनी के लोन खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित करना या उसके कर्ज को एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को ट्रांसफर करना कानूनी रूप से वैध था या नहीं। कोर्ट ने इन दोनों कानूनी प्रश्नों को भविष्य में विचार के लिए खुला रखा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को ₹125 करोड़ का भुगतान करने के लिए 12 सप्ताह का समय दिया है। भुगतान मिलने के चार सप्ताह के भीतर संबंधित पक्षों को संपत्ति के मूल दस्तावेज लौटाने और सभी सिक्योरिटी तथा गारंटी मुक्त करने का निर्देश दिया गया है।
कंपनी और SBI के बीच कैसे शुरू हुआ विवाद?
अतिबीर इंडस्ट्रीज स्पंज आयरन और पिग आयरन का निर्माण करती है। कंपनी ने SBI के नेतृत्व वाले बैंकों के समूह से ऋण सुविधाएं प्राप्त की थीं।
SBI ने 31 मार्च 2021 को कंपनी के लोन खाते को NPA घोषित कर दिया था। इस वर्गीकरण को 16 अक्टूबर 2020 से पूर्वव्यापी प्रभाव दिया गया था।
इसके बाद बैंक ने ऋण वसूली के लिए ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT), राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) और SARFAESI अधिनियम के तहत कार्यवाही शुरू की।
विवाद के दौरान कंपनी ने कई बार वन टाइम सेटलमेंट (OTS) का प्रस्ताव दिया। अंतिम प्रस्ताव 7 फरवरी 2023 को ₹238 करोड़ का था।
हालांकि, इसके तीन दिन बाद SBI ने वेब नोटिस जारी कर लोन को ई-नीलामी के माध्यम से ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
कंपनी की रिट याचिका लंबित रहने के दौरान 24 मार्च 2023 को SBI ने ₹250 करोड़ में यह कर्ज एक एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को सौंप दिया।
कलकत्ता हाईकोर्ट में अलग-अलग फैसले
अतिबीर इंडस्ट्रीज ने SBI की कार्रवाई को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने माना कि कंपनी के खाते को NPA घोषित करने का फैसला समय से पहले लिया गया था। कोर्ट ने इसे भारतीय रिजर्व बैंक के 1 जुलाई 2015 के मास्टर सर्कुलर और कोविड-19 महामारी के दौरान जारी मोरेटोरियम संबंधी सर्कुलरों के विपरीत पाया।
एकल न्यायाधीश ने NPA वर्गीकरण और कर्ज के ट्रांसफर, दोनों को रद्द कर दिया था।
हालांकि, 25 जुलाई 2024 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस फैसले को पलट दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज को सौंपी गई अतिरिक्त देनदारी तय करने की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान पेश हुए।
अभिषेक मनु सिंघवी के सुझाव पर सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिल आर. दवे को यह निर्धारित करने की जिम्मेदारी सौंपी कि पहले से भुगतान किए गए ₹250 करोड़ के अतिरिक्त कंपनी पर कितनी देनदारी बनती है।
अपील लंबित रहने के दौरान अतिबीर इंडस्ट्रीज ने पूरे ₹250 करोड़ का भुगतान कर दिया था।
जस्टिस दवे ने 9 जुलाई 2025 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने माना कि एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी अपने ₹250 करोड़ के निवेश पर उचित रिटर्न पाने की हकदार है, न कि कर्ज ट्रांसफर होने से पहले की ₹453.83 करोड़ की कुल बकाया राशि पर।
रिपोर्ट में 13 प्रतिशत, 14 प्रतिशत और 15 प्रतिशत वार्षिक दरों के आधार पर संभावित रिटर्न की गणना की गई। इसके अतिरिक्त ₹50 लाख खर्च के रूप में देने का सुझाव भी दिया गया।
अतिबीर इंडस्ट्रीज ने प्रतिद्वंद्वी कंपनी की भूमिका पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अतिबीर इंडस्ट्रीज ने दावा किया कि कर्ज खरीदने के लिए इस्तेमाल किए गए ₹250 करोड़ एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी के अपने फंड से नहीं आए थे।
कंपनी का आरोप था कि यह रकम ऐसी संस्था ने उपलब्ध कराई थी, जिसे नियंत्रित करने वाले व्यक्ति उसी कारोबार में उसकी एक प्रतिस्पर्धी कंपनी को भी नियंत्रित करते हैं।
अतिबीर इंडस्ट्रीज ने आशंका जताई कि कर्ज ट्रांसफर करने का उद्देश्य उसके कारोबार पर नियंत्रण हासिल करना हो सकता है।
कंपनी ने दलील दी कि एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को अधिकतम 7.5 प्रतिशत वार्षिक दर से ही रिटर्न दिया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने अतिबीर इंडस्ट्रीज को बार-बार कर्ज भुगतान में चूक करने वाली कंपनी बताया।
उसने तर्क दिया कि जस्टिस दवे की रिपोर्ट उन्हें सौंपे गए कार्यक्षेत्र से आगे चली गई है और इसमें कर्ज की कुल कीमत तथा उसे खरीदने के लिए चुकाई गई रकम के बीच अंतर को नजरअंदाज किया गया है।
वैकल्पिक रूप से उसने मांग की कि संविदात्मक दस्तावेजों के आधार पर कुल देनदारी तय करने के लिए मामला दोबारा भेजा जाए।
समझौते की बातचीत के बाद अचानक ई-नीलामी नोटिस पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने SBI द्वारा समझौते की बातचीत के बाद ई-नीलामी का नोटिस जारी किए जाने की परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया।
पीठ ने कहा:
“समझौते की बातचीत के बाद जारी किया गया ई-नीलामी नोटिस अपीलकर्ता के लिए अचानक बिजली गिरने जैसा था।”
कोर्ट ने एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को फंड उपलब्ध कराने वाले व्यक्तियों और अतिबीर इंडस्ट्रीज की प्रतिस्पर्धी कंपनी के बीच कथित संबंधों पर भी विचार किया।
पीठ ने कहा:
“अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवादी संख्या 2 के खिलाफ लगाए गए इन आरोपों का कोई खंडन नहीं किया गया है कि प्रतिवादी संख्या 1 से परिसंपत्ति हासिल करने के लिए उपलब्ध कराई गई धनराशि कारोबार में एक प्रतिस्पर्धी द्वारा दी गई थी।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि जस्टिस दवे के अनुरोध के बावजूद एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने अपने वित्तीय विवरण और उधार ली गई रकम पर लागू ब्याज दर की जानकारी उपलब्ध नहीं कराई।
कर्मचारियों की आजीविका और दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखकर फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अतिबीर इंडस्ट्रीज एक चालू औद्योगिक प्रतिष्ठान है और उसके कर्मचारियों की आजीविका भी इस विवाद से जुड़ी हुई है।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने न्याय और समानता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए विवाद का अंतिम समाधान करना उचित समझा।
पीठ ने जस्टिस दवे की रिपोर्ट में दी गई अधिकतम 15 प्रतिशत वार्षिक दर, रिपोर्ट के बाद बीत चुके 18 महीने से अधिक समय और एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा किए गए खर्चों को ध्यान में रखकर अतिरिक्त भुगतान की राशि ₹125 करोड़ तय की।
कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“यह राशि इस प्रश्न में गए बिना निर्धारित की गई है कि यह निवेश पर रिटर्न है या कुछ और, ताकि पक्षों के बीच वर्षों से जारी विवाद का अंत किया जा सके।”
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा:
“यह कोर्ट केवल कानून की अदालत ही नहीं, बल्कि न्यायसंगतता के सिद्धांतों पर कार्य करने वाली अदालत भी है। दोनों पक्षों के हितों में संतुलन बनाकर और उनके बीच पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए राहत दी गई है।”
12 सप्ताह में भुगतान नहीं हुआ तो दोबारा शुरू हो सकती है वसूली की कार्यवाही
सुप्रीम कोर्ट ने अतिबीर इंडस्ट्रीज को निर्देश दिया कि वह ₹125 करोड़ की अतिरिक्त राशि 12 सप्ताह के भीतर चुकाए। इस भुगतान को विवाद का पूर्ण और अंतिम समझौता माना जाएगा।
राशि प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर संबंधित प्रतिवादियों को संपत्तियों के मूल स्वामित्व दस्तावेज लौटाने होंगे। साथ ही सभी प्रतिभूतियां और गारंटी भी मुक्त करनी होंगी।
कोर्ट ने NCLT में IBC की धारा 7 के तहत चल रही कार्यवाही और DRT-I, कोलकाता में लंबित कार्यवाही का भी निपटारा कर दिया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अतिबीर इंडस्ट्रीज निर्धारित 12 सप्ताह के भीतर भुगतान नहीं करती है तो प्रतिवादी संबंधित कार्यवाहियों को दोबारा शुरू करने के लिए स्वतंत्र होंगे। ऐसी स्थिति में कंपनी को इस फैसले के तहत दी गई राहत का लाभ नहीं मिलेगा।
पीठ ने जस्टिस अनिल आर. दवे की रिपोर्ट को ₹125 करोड़ के अतिरिक्त भुगतान संबंधी संशोधन के साथ स्वीकार करते हुए अपीलों का निपटारा कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने NPA वर्गीकरण और कर्ज ट्रांसफर की वैधता से जुड़े कानूनी प्रश्नों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया।
केस डिटेल्स
केस का नाम: Atibir Industries Co. Ltd. vs. State Bank of India & Anr.
केस नंबर: Civil Appeals arising out of SLP (C) Nos. 21029-30 of 2024
पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना
फैसले की तारीख: 26 अक्टूबर 2026
