बेंगलुरु जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की अवधि पूरी होने के करीब छह साल बाद भी रकम वापस नहीं करने पर एक क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी को ₹3 लाख का मूलधन 9.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया है। आयोग ने इसे सेवा में कमी मानते हुए 66 वर्षीय महिला को मानसिक परेशानी और आर्थिक कठिनाइयों के लिए ₹25,000 मुआवजा तथा मुकदमे के खर्च के रूप में ₹10,000 अतिरिक्त देने का निर्देश भी दिया।
बेंगलुरु शहरी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की तृतीय अतिरिक्त पीठ ने 28 सितंबर 2026 को यह आदेश सुनाया। आयोग के अध्यक्ष शिवराम के. और सदस्य रेखा सयन्नावर तथा सुमा अनिलकुमार ने महिला सबिता की शिकायत पर सुनवाई की।
FD की अवधि पूरी होने के बाद भी नहीं मिला पैसा
सबिता ने 11 अक्टूबर 2017 को क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी में ₹3 लाख की फिक्स्ड डिपॉजिट कराई थी। इसकी अवधि तीन साल थी और इस पर 9.5 प्रतिशत सालाना ब्याज निर्धारित था।
यह FD 11 अक्टूबर 2020 को मैच्योर हो गई थी। महिला का कहना था कि वह उसी दिन मूलधन और ब्याज की रकम लेने सोसायटी पहुंची थीं, लेकिन उन्हें एक महीने बाद आने को कहा गया।
नवंबर 2020 में दोबारा संपर्क करने पर भी भुगतान नहीं हुआ। इस बार सोसायटी ने रकम लौटाने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए और समय मांगा।
इसके बाद महिला ने कई बार सोसायटी के चक्कर लगाए, लेकिन उन्हें अपनी जमा पूंजी वापस नहीं मिली। शिकायत के अनुसार, उन्हें निजी और पारिवारिक जरूरतों के लिए इस रकम की आवश्यकता थी।
कानूनी नोटिस का भी नहीं दिया जवाब
लगातार प्रयासों के बावजूद भुगतान नहीं होने पर सबिता ने 25 फरवरी 2026 को सोसायटी को कानूनी नोटिस भेजा।
नोटिस मिलने के बाद भी सोसायटी ने न तो कोई जवाब दिया और न ही बकाया रकम लौटाई।
इसके बाद महिला ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत आयोग का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने सोसायटी पर सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाया।
मामले की सुनवाई के दौरान सोसायटी को नोटिस भेजा गया, लेकिन उसकी ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। सोसायटी ने शिकायत का विरोध करने के लिए कोई दस्तावेज या साक्ष्य भी पेश नहीं किया।
आयोग ने माना कि सोसायटी की लापरवाही से महिला को हुई परेशानी
आयोग ने FD की रसीद, महिला के हलफनामे और अन्य दस्तावेजों की जांच की।
रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि जमा राशि 11 अक्टूबर 2020 को मैच्योर हो चुकी थी। इसके बावजूद बार-बार अनुरोध करने पर भी सोसायटी ने मूलधन और ब्याज का भुगतान नहीं किया।
आयोग ने कहा कि मैच्योरिटी के बाद भी जमा रकम वापस नहीं करना सेवा में कमी है। सोसायटी के इस व्यवहार के कारण शिकायतकर्ता को आर्थिक कठिनाइयों के साथ मानसिक परेशानी भी उठानी पड़ी।
आयोग ने यह भी ध्यान दिया कि सोसायटी ने शिकायत का जवाब देने या महिला के दावों को गलत साबित करने के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।
₹3 लाख पर 9.5 प्रतिशत ब्याज के साथ मुआवजा भी देना होगा
आयोग ने महिला की शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सोसायटी को ₹3 लाख की मूल जमा राशि लौटाने का निर्देश दिया।
इस रकम पर 11 अक्टूबर 2017 से वास्तविक भुगतान की तारीख तक 9.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
इसके अतिरिक्त सोसायटी को मानसिक परेशानी और आर्थिक कठिनाइयों के लिए ₹25,000 मुआवजा तथा मुकदमे के खर्च के रूप में ₹10,000 देने का आदेश दिया गया।
आयोग ने आदेश का पालन करने के लिए 45 दिन का समय निर्धारित किया है।
यदि सोसायटी निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं करती है, तो मुआवजे और मुकदमे के खर्च की कुल ₹35,000 की राशि पर भी 28 सितंबर 2026 से वास्तविक भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
