मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अचल संपत्ति की बिक्री के लिए किया गया रजिस्टर्ड एग्रीमेंट टू सेल (Agreement to Sell) खरीदार को संपत्ति का मालिकाना हक नहीं देता, भले ही उसे संपत्ति का कब्जा सौंप दिया गया हो। कोर्ट ने कहा कि केवल बिक्री के समझौते के आधार पर मालिकाना हक की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त नहीं की जा सकती, यदि खरीदार समझौते के विशिष्ट पालन (Specific Performance) की राहत नहीं मांगता।
ग्वालियर बेंच के जस्टिस आशीष श्रोती ने दूसरी अपील स्वीकार करते हुए सिविल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले तथा डिक्री रद्द कर दिए। हाईकोर्ट ने जमीन खरीदने का समझौता करने वाले व्यक्ति का मुकदमा भी खारिज कर दिया।
क्या था मामला?
विवाद भिंड जिले के गोहद गांव में सर्वे नंबर 1712 की कुल 0.549 हेक्टेयर जमीन में से 0.158 हेक्टेयर भूमि से संबंधित था।
वादी का दावा था कि प्रतिवादी संख्या 1 ने ₹33,000 में यह जमीन बेचने का समझौता किया था। इसमें से ₹5,200 अग्रिम भुगतान किया गया था और जमीन का कब्जा भी उसे सौंप दिया गया था।
27 दिसंबर 1989 को एक रजिस्टर्ड एग्रीमेंट टू सेल किया गया था। इसमें तय हुआ था कि राजस्व रिकॉर्ड में प्रतिवादी संख्या 1 का नाम दर्ज होने के बाद बिक्री विलेख (Sale Deed) निष्पादित किया जाएगा।
इसके बाद वादी को जानकारी मिली कि प्रतिवादी संख्या 1 अन्य व्यक्तियों से जमीन बेचने की बातचीत कर रहा है। इस पर उसने 13 जुलाई 1990 को सिविल मुकदमा दाखिल किया।
वादी ने अदालत से यह घोषणा करने की मांग की कि प्रतिवादी संख्या 1 किसी अन्य व्यक्ति को जमीन बेचने का हकदार नहीं है। साथ ही जमीन के हस्तांतरण पर रोक लगाने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा भी मांगी।
इस बीच प्रतिवादी संख्या 1 और उसके भाइयों ने 10 अक्टूबर 1991 को प्रतिवादी संख्या 4 के पक्ष में जमीन का बिक्री विलेख निष्पादित कर दिया। इसके बाद वादी ने अपने मुकदमे में संशोधन करके इस बिक्री विलेख को भी चुनौती दी।
सिविल जज क्लास-I, गोहद ने 18 जनवरी 2001 को वादी के पक्ष में डिक्री पारित की। इसके बाद अपर जिला जज, गोहद ने 28 सितंबर 2001 को इस फैसले को बरकरार रखा।
दोनों अदालतों ने माना कि रजिस्टर्ड एग्रीमेंट के आधार पर वादी को जमीन का मालिकाना हक और कब्जा प्राप्त हो गया था। अदालतों ने बाद में निष्पादित बिक्री विलेख को भी शून्य और अमान्य घोषित कर दिया।
इस फैसले के खिलाफ जमीन खरीदने वाले प्रतिवादी संख्या 4 ने हाईकोर्ट में दूसरी अपील दाखिल की। उनकी मृत्यु के बाद कानूनी उत्तराधिकारियों ने अपील की पैरवी जारी रखी।
अपीलकर्ताओं ने क्या दलील दी?
अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अवधेश पाराशर ने कहा कि वादी ने केवल एग्रीमेंट टू सेल के आधार पर जमीन के मालिकाना हक का दावा किया था, जबकि ऐसा समझौता किसी संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित नहीं करता।
उन्होंने तर्क दिया कि जब वादी ने समझौते के विशिष्ट पालन की मांग ही नहीं की थी, तो उसके पक्ष में मालिकाना हक की घोषणा या स्थायी निषेधाज्ञा की डिक्री पारित नहीं की जा सकती थी।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य फैसले और हाईकोर्ट के प्रेम बाई बनाम श्रीमती नीलम तथा नेहल शाह बनाम जमीत सिंह कछवाहे फैसलों का हवाला दिया।
राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता राजेंद्र जैन उपस्थित हुए। वहीं, नोटिस की तामील होने के बावजूद वादी की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ।
एग्रीमेंट टू सेल से मालिकाना हक हस्तांतरित नहीं होता: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने पाया कि वादी ने जमीन के मालिकाना हक का दावा पूरी तरह 27 दिसंबर 1989 के रजिस्टर्ड एग्रीमेंट टू सेल के आधार पर किया था।
कोर्ट ने कहा,
“इस प्रकार यह स्पष्ट है कि पक्षकारों ने केवल विवादित जमीन को बेचने का समझौता किया था, लेकिन जमीन का मालिकाना हक वादी के पक्ष में हस्तांतरित नहीं हुआ था।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था,
“बिक्री का समझौता, चाहे कब्जे के साथ हो या बिना कब्जे के, संपत्ति के स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं है।”
कोर्ट ने प्रेम बाई, नेहल शाह और सुप्रीम कोर्ट के आरबीएएनएमएस एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन बनाम बी. गुणशेखर फैसलों पर भी भरोसा किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि वादी को 27 दिसंबर 1989 के एग्रीमेंट टू सेल के विशिष्ट पालन की राहत मांगनी चाहिए थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
इस संबंध में कोर्ट ने स्पष्ट किया,
“इस प्रकार एग्रीमेंट टू सेल के विशिष्ट पालन की किसी राहत के अभाव में वादी के लिए विवादित संपत्ति पर मालिकाना हक प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं है।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“संपत्ति पर मालिकाना हक नहीं होने के कारण वादी स्थायी निषेधाज्ञा की डिक्री प्राप्त करने का भी हकदार नहीं था।”
हाईकोर्ट ने माना कि सिविल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने केवल बिक्री के समझौते के आधार पर मालिकाना हक की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा देकर कानूनी गलती की थी।
कोर्ट फीस के सवाल पर क्या कहा?
दूसरे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर हाईकोर्ट ने कहा कि वादी 10 अक्टूबर 1991 को निष्पादित बिक्री विलेख का पक्षकार नहीं था।
इसलिए उस बिक्री विलेख को शून्य और अमान्य घोषित कराने के लिए वादी को संपत्ति के मूल्य के अनुपात में कोर्ट फीस (Ad Valorem Court Fee) जमा करने की आवश्यकता नहीं थी।
इस निष्कर्ष के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सुहरिद सिंह उर्फ सरदूल सिंह बनाम रणधीर सिंह फैसले पर भरोसा किया।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले कानूनी प्रश्न पर दिए गए निष्कर्ष को देखते हुए कोर्ट फीस से संबंधित इस प्रश्न का अंतिम परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले रद्द किए
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दूसरी अपील स्वीकार करते हुए सिविल जज क्लास-I, गोहद के 18 जनवरी 2001 और अपर जिला जज, गोहद के 28 सितंबर 2001 के फैसलों और डिक्री को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने वादी का मूल मुकदमा भी खारिज कर दिया और उसे अपील का खर्च वहन करने का निर्देश दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: किलेदार सिंह (दिवंगत, कानूनी उत्तराधिकारी कल्याण सिंह एवं अन्य के माध्यम से) बनाम अनिल कुमार एवं अन्य
केस नंबर: सेकंड अपील संख्या 438/2001
बेंच: जस्टिस आशीष श्रोती
फैसले की तारीख: 23 अक्टूबर 2026
