बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के मालेगांव में प्राथमिक विद्यालय और खेल मैदान के लिए आरक्षित जमीन का आरक्षण महाराष्ट्र क्षेत्रीय एवं नगर नियोजन अधिनियम, 1966 (MRTP Act) की धारा 127 के तहत समाप्त घोषित कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जमीन मालिकों से खरीद नोटिस मिलने के बाद नगर निगम द्वारा ऐसे दस्तावेज मांगना, जो उसके पास पहले से उपलब्ध हैं, केवल कानून में निर्धारित समयसीमा को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास था।
जस्टिस एम.एस. कार्णिक और जस्टिस संदेश डी. पाटिल की डिवीजन बेंच ने याचिका स्वीकार करते हुए मालेगांव नगर निगम की आपत्तियों को खारिज कर दिया। याचिका में मालेगांव कैंप स्थित सर्वे नंबर 68 के प्लॉट नंबर 24 से 38, जिन्हें आरक्षण स्थल संख्या 20 के रूप में चिह्नित किया गया था, का आरक्षण समाप्त घोषित करने की मांग की गई थी।
क्या था मामला?
विवादित जमीन लगभग 3,400 वर्ग मीटर क्षेत्रफल की है। मालेगांव की विकास योजना में इसे प्राथमिक विद्यालय और खेल मैदान के लिए आरक्षित किया गया था। यह विकास योजना 12 अक्टूबर 2009 से प्रभावी हुई थी।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, जमीन 10 साल से अधिक समय तक आरक्षित रही, लेकिन उसके अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई।
इसके बाद जमीन मालिकों ने 13 फरवरी 2020 को MRTP अधिनियम की धारा 127 के तहत खरीद नोटिस जारी किया, जो अगले दिन नगर निगम को प्राप्त हुआ। राज्य सरकार ने भी 24 फरवरी 2020 के पत्र के माध्यम से नोटिस मिलने की पुष्टि की।
निर्धारित 24 महीने की अवधि बीतने के बाद याचिकाकर्ताओं ने 5 अप्रैल 2022 को जमीन पर निर्माण की अनुमति मांगी। हालांकि, नगर आयुक्त ने 18 जुलाई 2022 को उनका निर्माण प्लान खारिज कर दिया।
इस बीच याचिकाकर्ता श्रीकांत देविदास उपलेकर का निधन हो गया, जिसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को मामले में पक्षकार बनाया गया।
नगर निगम ने नोटिस को बताया अमान्य
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रकाश आहूजा के निर्देश पर अधिवक्ता विनीत पी. आहूजा ने दलील दी कि नगर निगम ने धारा 127 के तहत निर्धारित 24 महीने की अवधि में जमीन अधिग्रहण के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इसलिए जमीन का आरक्षण कानून के अनुसार समाप्त हो चुका है।
दूसरी ओर, नगर निगम की ओर से अधिवक्ता एस.एस. पटवर्धन और अधिवक्ता ए.वी. हरदास ने कहा कि निगम ने 26 अगस्त 2020 को याचिकाकर्ताओं से कई दस्तावेज मांगे थे, लेकिन उन्होंने दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए।
नगर निगम ने तर्क दिया कि धारा 127 के तहत खरीद नोटिस के साथ जमीन के स्वामित्व से संबंधित दस्तावेज देना आवश्यक है। चूंकि नोटिस के साथ दस्तावेज नहीं लगाए गए थे, इसलिए उसे वैध नोटिस नहीं माना जा सकता।
राज्य सरकार की ओर से अपर सरकारी वकील रीना ए. सालुंखे उपस्थित हुईं।
दस्तावेज मांगना समयसीमा रोकने का प्रयास: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच में पाया कि खरीद नोटिस के पैराग्राफ 6 में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि जमीन के स्वामित्व के प्रमाण के रूप में 7/12 रिकॉर्ड की प्रति संलग्न की गई है। रिकॉर्ड से यह भी साबित हुआ कि नोटिस के साथ संबंधित दस्तावेज नगर निगम को दिए गए थे।
इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की,
“ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिवादी संख्या 1, नगर निगम ने MRTP अधिनियम की धारा 127 के प्रावधानों से बचने के लिए एक दिखावटी आधार तैयार किया है।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर बॉम्बे बनाम डॉ. हकीमवाड़ी टेनेंट्स एसोसिएशन, 1988 (Supp) SCC 55 फैसले का हवाला दिया।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,
“अधिनियम की धारा 127 में नियोजन प्राधिकरण के अधिकारियों द्वारा स्वामित्व की जांच करने का प्रावधान नहीं है और न ही अधिकारी वैध नोटिस दिए जाने की स्थिति में समयसीमा को आगे बढ़ने से रोक सकते हैं।”
डिवीजन बेंच ने कहा कि नगर निगम के पास विवादित जमीन सहित सभी भूमि रिकॉर्ड उपलब्ध हैं।
कोर्ट ने 26 अगस्त 2020 को नगर निगम द्वारा भेजे गए पत्र के संबंध में कहा,
“यह पत्र समयसीमा को आगे बढ़ने से रोकने के प्रयास के अलावा कुछ नहीं था और आरक्षण समाप्त होने के प्रश्न का निर्णय करने के लिए इसका बहुत कम या कोई महत्व नहीं था।”
हाईकोर्ट ने पाया कि खरीद नोटिस में जमीन का पर्याप्त और स्पष्ट विवरण दिया गया था। इसके अलावा 7/12 रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ताओं का स्वामित्व भी साबित होता था।
कोर्ट ने कहा,
“इस प्रकार खरीद नोटिस सभी पहलुओं से MRTP अधिनियम की धारा 127 की वैधानिक आवश्यकताओं का पालन करता था।”
बेंच ने अपने निष्कर्ष में चिन्मय गुरुनाथ पराडे बनाम महाराष्ट्र राज्य (WP/3890/2021) और याकूब सालेभाई कॉन्ट्रैक्टर बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2026 SCC OnLine Bom 1292 फैसलों का भी उल्लेख किया।
24 महीने में अधिग्रहण की कार्रवाई नहीं हुई
हाईकोर्ट ने पाया कि खरीद नोटिस के बाद निर्धारित 24 महीने की अवधि 13 फरवरी 2022 को समाप्त हो गई थी।
नगर निगम के वकील ने स्वयं स्वीकार किया कि अगस्त 2020 के पत्र के अनुसार याचिकाकर्ताओं द्वारा दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण निगम ने आगे कोई कदम नहीं उठाया।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा,
“चूंकि प्रतिवादी संख्या 1, नगर निगम ने MRTP अधिनियम की धारा 127 में निर्धारित कोई कदम नहीं उठाया है, इसलिए इस मामले में आरक्षण समाप्त हो जाने का निष्कर्ष अपरिहार्य है।”
हाईकोर्ट ने जमीन का आरक्षण समाप्त घोषित किया
बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए विवादित जमीन का आरक्षण समाप्त घोषित कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता अब मालेगांव की विकास योजना के तहत अनुमत उपयोग के अनुसार जमीन का इस्तेमाल कर सकते हैं।
हाईकोर्ट ने याचिका में मांगी गई राहत मंजूर कर ली और मुकदमे के खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया। इसके साथ ही लंबित अंतरिम आवेदन का भी निस्तारण कर दिया गया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: श्रीकांत देविदास उपलेकर (दिवंगत, कानूनी उत्तराधिकारियों के माध्यम से) बनाम मालेगांव नगर निगम एवं अन्य
केस नंबर: रिट याचिका संख्या 4596/2024
बेंच: जस्टिस एम.एस. कार्णिक और जस्टिस संदेश डी. पाटिल
फैसले की तारीख: 22 अक्टूबर 2026
