पहले पति से तलाक लिए बिना दूसरी शादी करने पर धारा 498A के तहत क्रूरता का मामला नहीं बनता: गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी महिला ने अपनी पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त होने से पहले दूसरी शादी की है, तो ऐसी शादी के आधार पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत क्रूरता का मामला नहीं बनता। कोर्ट ने इस आधार पर एक महिला की सास के खिलाफ क्रूरता, द्विविवाह और आपराधिक विश्वासघात के आरोपों में दर्ज FIR रद्द कर दी।

जस्टिस पी.एम. रावल ने पाया कि मामला सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल फैसले में निर्धारित मानदंडों के अंतर्गत आता है। हाईकोर्ट ने सास के खिलाफ दर्ज FIR और उससे संबंधित सभी कानूनी कार्यवाहियां रद्द कर दीं।

क्या था मामला?

13 जनवरी 2018 को अहमदाबाद के महिला पुलिस स्टेशन (पूर्व) में IPC की धारा 498A, 323, 494, 406 और 114 के तहत FIR दर्ज की गई थी।

शिकायतकर्ता महिला ने 1 फरवरी 2007 को आवेदिका के बेटे से शादी की थी। बाद में पति-पत्नी लंदन चले गए।

महिला ने आरोप लगाया कि उसकी सास ने लंदन में कुछ समय रहने के दौरान अपने बेटे द्वारा किए गए दुर्व्यवहार में उसका साथ दिया और उसे बढ़ावा दिया।

शिकायतकर्ता का यह भी आरोप था कि उसके पति ने दिसंबर 2012 में दूसरी महिला से शादी कर ली थी और बाद में उसे तलाक दे दिया।

महिला के अनुसार, उसकी सास ने पति की दूसरी शादी की जानकारी उससे छिपाकर इस अपराध में सहयोग किया।

इन आरोपों के आधार पर सास के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

सास की दलील, पहली शादी खत्म होने से पहले हुआ था दूसरा विवाह

सास की ओर से सीनियर एडवोकेट हर्षित टोलिया और एडवोकेट हार्दिककुमार डी. राव ने दलील दी कि विवाद मुख्य रूप से पति-पत्नी के बीच था, लेकिन सास को गलत तरीके से इसमें आरोपी बना दिया गया।

उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता और आवेदिका के बेटे के बीच हुई शादी ही कानूनी रूप से शून्य थी।

उनके अनुसार, शिकायतकर्ता ने खुद को अविवाहित बताया था, जबकि उसकी पहली शादी पहले से मौजूद थी। अहमदाबाद की फैमिली कोर्ट से उसे अपने पहले पति से तलाक की डिक्री 20 नवंबर 2007 को मिली थी।

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इसके विपरीत, उसने आवेदिका के बेटे से 1 फरवरी 2007 को शादी कर ली थी, यानी पहली शादी समाप्त होने से नौ महीने से भी अधिक समय पहले।

सास की ओर से यह भी कहा गया कि IPC की धारा 323 के तहत मारपीट के आरोप अस्पष्ट थे। धारा 406 के लिए किसी संपत्ति को सौंपे जाने का आरोप नहीं था और FIR दर्ज करने में हुई देरी का भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था।

शिकायतकर्ता और राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया

शिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट जय एस. शाह ने दलील दी कि FIR को पढ़ने मात्र से आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मजबूत मामला बनता है।

उन्होंने कहा कि सास ने अपने बेटे की दूसरी शादी की जानकारी छिपाई थी। इसलिए हाईकोर्ट को इस स्तर पर साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण करके मामले का फैसला नहीं करना चाहिए।

राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक रोहन शाह ने भी याचिका का विरोध किया।

उन्होंने कहा कि सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए और मामले को ट्रायल के लिए आगे बढ़ने देना चाहिए।

पहली शादी के रहते दूसरा विवाह कानूनी रूप से शून्य: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता की पहली शादी 12 मई 2003 को हुई थी।

यह भी निर्विवाद था कि अहमदाबाद की फैमिली कोर्ट ने उसके पहले विवाह के संबंध में तलाक की डिक्री 20 नवंबर 2007 को पारित की थी।

जबकि शिकायतकर्ता ने आवेदिका के बेटे से 1 फरवरी 2007 को ही शादी कर ली थी।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शिवचरण लाल वर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य और पी. शिवकुमार बनाम राज्य फैसलों पर भरोसा किया।

जस्टिस रावल ने कहा,

“स्थापित कानूनी स्थिति के अनुसार, वर्तमान आरोपी संख्या 1 के साथ किया गया विवाह शून्य और अमान्य है। इसलिए IPC की धारा 498A लागू होने का प्रश्न ही नहीं उठता।”

सास के खिलाफ क्रूरता और मारपीट के आरोप अस्पष्ट

हाईकोर्ट ने पाया कि शादी के बाद करीब आठ महीने तक परिवार के साथ रहने के दौरान शिकायतकर्ता ने सास के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया था।

नवंबर 2014 में लंदन में कथित शारीरिक दुर्व्यवहार के आरोपों पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि FIR में घटना का कोई स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया था।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

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“आरोप अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के प्रतीत होते हैं। FIR में कोई विशिष्ट विवरण, तारीख, समय या स्थान नहीं बताया गया है।”

इस आधार पर हाईकोर्ट ने पाया कि सास के खिलाफ लगाए गए आरोपों में आवश्यक स्पष्टता और विशिष्टता का अभाव था।

पति की दूसरी शादी के आरोप पर भी हाईकोर्ट ने किया विचार

IPC की धारा 494 के तहत द्विविवाह के आरोप पर हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता की ओर से दी गई उस दलील पर विचार किया, जिसमें पहले विवाह का प्रथागत तलाक होने का दावा किया गया था।

हालांकि, शिकायतकर्ता के वकील ऐसा कोई रिकॉर्ड या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके जिससे यह साबित होता कि शिकायतकर्ता की जाति में इस तरह के प्रथागत तलाक की व्यवस्था प्रचलित थी।

कोर्ट ने कहा कि जब शिकायतकर्ता ने स्वयं अपना पहला विवाह कायम रहते हुए आवेदिका के बेटे से शादी की थी, तो पति द्वारा वर्ष 2012 में दूसरी शादी करने का आरोप अपना महत्व खो देता है।

हाईकोर्ट ने कहा,

“वर्ष 2012 में पति द्वारा दूसरी शादी करने का आरोप इस तथ्य के मद्देनजर महत्वहीन हो जाता है कि शिकायतकर्ता ने स्वयं अपना पिछला विवाह कायम रहते हुए वर्तमान आवेदिका के बेटे, मूल आरोपी संख्या 1, से शादी की थी।”

संपत्ति सौंपने का आरोप नहीं होने पर धारा 406 लागू नहीं

हाईकोर्ट ने IPC की धारा 406 के तहत आपराधिक विश्वासघात के आरोप की भी जांच की।

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कोर्ट ने पाया कि FIR में यह आरोप ही नहीं लगाया गया था कि शिकायतकर्ता ने कोई संपत्ति सास को सौंपी थी।

इस पर कोर्ट ने कहा,

“जब संबंधित FIR में संपत्ति सौंपे जाने का ऐसा कोई आरोप ही नहीं है, तो IPC की धारा 406 के दंडात्मक प्रावधान के लागू होने का प्रश्न नहीं उठता।”

कोर्ट ने यह भी माना कि जब मुख्य अपराधों के आवश्यक तत्व ही मौजूद नहीं हैं, तो IPC की धारा 114 भी लागू नहीं होगी।

वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदारों को सामान्य आरोपों के आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य और कहकशां कौसर बनाम बिहार राज्य सहित अन्य फैसलों का उल्लेख किया।

इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदारों को सामान्य और व्यापक आरोपों के आधार पर आपराधिक मामलों में शामिल करने के प्रति सावधानी बरतने को कहा है।

हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामला भजन लाल फैसले में निर्धारित मानदंड संख्या 1, 3, 5 और 7 के अंतर्गत आता है।

कार्यवाही के संबंध में कोर्ट ने टिप्पणी की,

“यह कार्यवाही स्पष्ट रूप से निराधार प्रतीत होती है और बदला लेने के छिपे हुए उद्देश्य से शुरू की गई लगती है।”

सास के खिलाफ FIR और सभी संबंधित कार्यवाहियां रद्द

इन निष्कर्षों के आधार पर जस्टिस पी.एम. रावल ने सास की याचिका स्वीकार कर ली।

हाईकोर्ट ने अहमदाबाद के महिला पुलिस स्टेशन (पूर्व) में 13 जनवरी 2018 को दर्ज FIR और उससे उत्पन्न सभी कानूनी कार्यवाहियों को केवल आवेदिका सास के संबंध में रद्द कर दिया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: हंसाबेन पत्नी नटवरलाल चौहान बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य
केस नंबर: R/आपराधिक विविध आवेदन संख्या 2785/2018
बेंच: जस्टिस पी.एम. रावल
फैसले की तारीख: 22 अक्टूबर 2026

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