केरल हाईकोर्ट ने गिरफ्तार व्यक्तियों को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक का समय निर्धारित करने वाले राज्य सरकार के दिशानिर्देशों के कुछ हिस्सों को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को बिना अनावश्यक देरी के मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना संवैधानिक और कानूनी दायित्व है। इसके लिए सामान्य अदालती समय को प्राथमिकता देने वाली प्रशासनिक व्यवस्था इस दायित्व को सीमित नहीं कर सकती।
जस्टिस राजा विजयराघवन वी. और जस्टिस के.वी. जयकुमार की डिवीजन बेंच ने एडवोकेट पी.एस. सुबीश की जनहित याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट ने कहा कि शाम 5 बजे के बाद आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की अनुमति केवल असाधारण परिस्थितियों में देने वाला प्रावधान भी उचित नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने शाम 5 बजे के बाद आरोपी को पेश करने से पहले संबंधित मजिस्ट्रेट को सूचना देने की शर्त बरकरार रखी।
क्या था मामला?
यह मामला केरल सरकार द्वारा 21 सितंबर 2023 को जारी आदेश G.O.(Ms) No. 202/2023/Home के तहत बनाए गए दिशानिर्देशों से संबंधित था।
इन दिशानिर्देशों में गिरफ्तार व्यक्तियों को अस्पतालों में डॉक्टरों या न्यायिक अधिकारियों के सामने पेश करने की प्रक्रिया निर्धारित की गई थी।
याचिकाकर्ता ने दिशानिर्देशों के क्लॉज 17 से 21 को चुनौती दी थी।
राज्य सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में बताया कि ये दिशानिर्देश कोट्टारक्करा के तालुक अस्पताल में हाउस सर्जन डॉ. वंदना दास की मौत के बाद तैयार किए गए थे।
सरकार के अनुसार, दिशानिर्देश बनाने से पहले केरल न्यायिक अधिकारी संघ और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन सहित संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श किया गया था।
याचिका लंबित रहने के दौरान सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि 24 सितंबर 2026 को आदेश G.O.(Ms) No. 173/2026/HOME के माध्यम से संबंधित प्रावधानों में संशोधन किया गया है।
संशोधित क्लॉज 18 के अनुसार, गिरफ्तार व्यक्तियों को 24 घंटे की समयसीमा का सख्ती से पालन करते हुए जहां तक संभव हो, सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे के बीच न्यायिक अधिकारी के सामने पेश किया जाना था।
वहीं, क्लॉज 19 में प्रावधान था कि किसी असाधारण परिस्थिति में शाम 5 बजे के बाद आरोपी को पेश करना आवश्यक होने पर संबंधित न्यायिक अधिकारी को पहले से सूचना दी जाएगी।
याचिकाकर्ता ने कहा, गिरफ्तारी के बाद पेशी के लिए समय की पाबंदी नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट टी.के. संदीप ने दलील दी कि संशोधित दिशानिर्देश भी अनुचित प्रतिबंध लगाते हैं।
उन्होंने कहा कि ‘जहां तक संभव हो’ और ‘असाधारण परिस्थितियां’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल से देरी को सामान्य मानने की स्थिति बनती है। इसके कारण पुलिस अधिकारियों और अभियोजकों को कानून के अनुसार की गई कार्रवाई का भी औचित्य साबित करना पड़ सकता है।
उन्होंने तर्क दिया कि संविधान और संबंधित कानूनी प्रावधानों में गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए अदालत के कामकाज के समय या दिन के किसी विशेष समय की पाबंदी नहीं लगाई गई है।
अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जसकरण जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य सहित अन्य फैसलों का हवाला दिया।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से डायरेक्टर जनरल ऑफ प्रॉसिक्यूशन आसिफ अली ने याचिका का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना था कि गिरफ्तार व्यक्तियों को संविधान के अनुच्छेद 22(2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 के अनुसार मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए।
राज्य सरकार ने कहा कि दिशानिर्देशों से गिरफ्तार व्यक्ति के किसी अधिकार में कटौती नहीं की गई है। सरकार ने केरल पुलिस अधिनियम, 2011 की धारा 50 का भी उल्लेख किया।
24 घंटे की समयसीमा हिरासत में रखने का अधिकार नहीं: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने सबसे पहले पाया कि संशोधित दिशानिर्देशों में गलती से संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लेख किया गया था, जबकि गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का प्रावधान अनुच्छेद 22(2) में है।
बेंच ने स्पष्ट किया कि संविधान और BNSS में निर्धारित 24 घंटे की अवधि अधिकतम सीमा है। इसका यह अर्थ नहीं है कि पुलिस किसी गिरफ्तार व्यक्ति को पूरे 24 घंटे तक हिरासत में रखने की हकदार है।
कोर्ट ने कहा,
“यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ये अधिकतम समयसीमाएं हैं, न कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को समयसीमा समाप्त होने तक हिरासत में रखने का सामान्य अधिकार।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शीला बारसे, जोगिंदर कुमार, प्रबीर पुरकायस्थ और मिहिर राजेश शाह मामलों के फैसलों का उल्लेख किया।
इन फैसलों के आधार पर बेंच ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा,
“गिरफ्तारी के क्षण से ही लागू हो जाती है और केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए उसे टाला नहीं जा सकता।”
शाम 5 बजे के बाद गिरफ्तारी होने पर अगली सुबह तक इंतजार करना उचित नहीं
हाईकोर्ट ने दिशानिर्देशों के संभावित प्रभाव को समझाने के लिए दो परिस्थितियों पर विचार किया।
पहली स्थिति में यदि किसी व्यक्ति को शाम 5 बजे के बाद गिरफ्तार किया जाता है, तो पुलिस उसे अगले दिन सुबह मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए इंतजार कर सकती है।
ऐसा होने पर गिरफ्तार व्यक्ति को कानूनी सहायता प्राप्त करने और रिमांड का विरोध करने का अवसर मिलने में देरी हो सकती है।
दूसरी स्थिति में किसी जांच अधिकारी को समय के लिहाज से महत्वपूर्ण साक्ष्य बरामद करने की कार्रवाई टालनी पड़ सकती है, ताकि आरोपी को निर्धारित अदालती समय के भीतर पेश किया जा सके।
इन परिस्थितियों पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की,
“इसलिए यह चिंता केवल सैद्धांतिक नहीं है।”
कोर्ट ने कहा कि दिशानिर्देशों में 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा का उल्लेख कर देना ही पर्याप्त नहीं है।
बेंच ने स्पष्ट किया,
“सामान्य अदालती समय के दौरान आरोपी को पेश करने की प्रशासनिक प्राथमिकता, गिरफ्तार व्यक्ति को बिना अनावश्यक देरी के पेश करने के दायित्व पर हावी नहीं हो सकती।”
प्रशासनिक दिशानिर्देश संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर नहीं कर सकते
हाईकोर्ट ने माना कि राज्य सरकार न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए उचित उपाय कर सकती है।
हालांकि, ऐसी व्यवस्था संविधान और कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्तियों को मिले अधिकारों को कमजोर नहीं कर सकती।
कोर्ट ने कहा,
“कार्यपालिका द्वारा निर्धारित कोई प्रक्रिया संविधान और लागू कानून के तहत सुनिश्चित सुरक्षा उपायों को कमजोर नहीं कर सकती, चाहे ऐसा सीधे तौर पर किया जाए या ऐसी प्रक्रियात्मक व्यवस्थाओं के माध्यम से, जिनका प्रभाव इन सुरक्षा उपायों के पालन को हतोत्साहित करना हो।”
सुबह 10 से शाम 5 बजे के बीच पेशी का नियम रद्द
इन निष्कर्षों के आधार पर केरल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के संशोधित दिशानिर्देशों के उन हिस्सों को रद्द कर दिया, जिनमें गिरफ्तार व्यक्तियों को जहां तक संभव हो सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे के बीच मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का प्रावधान था।
कोर्ट ने शाम 5 बजे के बाद पेशी को केवल असाधारण परिस्थितियों तक सीमित करने वाले प्रावधान को भी रद्द कर दिया।
हालांकि, शाम 5 बजे के बाद आरोपी को पेश करने से पहले संबंधित मजिस्ट्रेट को सूचना देने की शर्त को बरकरार रखा गया।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अपने निष्कर्षों के अनुरूप नए दिशानिर्देश जारी करने का निर्देश दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: एडवोकेट पी.एस. सुबीश बनाम केरल राज्य एवं अन्य
केस नंबर: WP(PIL) संख्या 165/2025
बेंच: जस्टिस राजा विजयराघवन वी. और जस्टिस के.वी. जयकुमार
फैसले की तारीख: 23 अक्टूबर 2026
