दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल सुप्रीम कोर्ट को ही यह निर्देश देने का अधिकार है कि उसके किसी फैसले को अन्य मामलों में नजीर (Precedent) के रूप में उद्धृत नहीं किया जाएगा। निचली अदालतें अपने फैसलों पर ऐसा प्रतिबंध नहीं लगा सकतीं। कोर्ट ने कहा कि यदि निचली अदालतों को ऐसा करने की अनुमति दी जाए, तो समान परिस्थितियों वाले वादियों के साथ अलग-अलग व्यवहार होने की स्थिति पैदा हो सकती है।
जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस विनोद कुमार की डिवीजन बेंच ने 15 अक्टूबर 2026 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MOEFCC) के एक सेवानिवृत्त वैज्ञानिक के पक्ष में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के फैसले को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की।
हालांकि, हाईकोर्ट ने वैज्ञानिक डी ग्रेड में पदोन्नति को लेकर एक शर्त लगाई है कि संबंधित अधिकारी को निर्धारित मानदंडों के आधार पर पदोन्नति के योग्य पाया जाना आवश्यक होगा।
क्या था मामला?
ओम प्रकाश पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में साइंटिस्ट बी के पद पर कार्यरत थे। उन्हें फ्लेक्सिबल कॉम्प्लीमेंटिंग स्कीम (FCS) के तहत 2 जुलाई 2007 से साइंटिस्ट सी के पद पर इन-सीटू पदोन्नति दी गई थी।
वह 30 जून 2013 को साइंटिस्ट सी के पद से सेवानिवृत्त हुए।
इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में आवेदन दाखिल कर मांग की कि साइंटिस्ट सी के पद पर उनकी पदोन्नति की प्रभावी तारीख 1 जनवरी 2006 की जाए। साथ ही उन्हें 1 जनवरी 2010 से साइंटिस्ट डी के पद पर इन-सीटू पदोन्नति दी जाए।
अधिकरण ने मंत्रालय के 13 अगस्त 2013 के कार्यालय ज्ञापन पर भरोसा किया, जिसमें दोनों पदोन्नतियों की प्रभावी तारीखें पहले की करने के लिए उनका नाम शामिल था।
29 जनवरी 2024 को अधिकरण ने उनकी मांग स्वीकार करते हुए वेतन के बकाया भुगतान सहित सभी संबंधित लाभ देने का निर्देश दिया।
इस फैसले को पर्यावरण मंत्रालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DOPT) ने संयुक्त रूप से दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
केंद्र सरकार ने पूर्व प्रभाव से पदोन्नति का विरोध किया
केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय सरकारी स्थायी अधिवक्ता बलेंदु शेखर ने दलील दी कि भर्ती नियमों में पिछली तारीख से पदोन्नति देने पर स्पष्ट रोक है।
उन्होंने कहा कि FCS के तहत पदोन्नति पूरी तरह योग्यता पर आधारित होती है। इसके लिए वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) की जांच, इंटरव्यू और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी आवश्यक है।
केंद्र सरकार का कहना था कि संबंधित अधिकारी की साइंटिस्ट डी पद के लिए योग्यता का कभी मूल्यांकन ही नहीं हुआ था।
यह भी दलील दी गई कि अधिकारी नकुल देव मामले के फैसले का लाभ नहीं ले सकते, क्योंकि उस मामले में अधिकरण ने स्पष्ट किया था कि उसके फैसले को किसी अन्य मामले में नजीर के रूप में उद्धृत नहीं किया जाएगा।
दूसरी ओर, सेवानिवृत्त वैज्ञानिक की ओर से एडवोकेट सुदर्शन राजन ने कहा कि मंत्रालय पदोन्नति पर विचार करने में अपनी ही देरी का लाभ नहीं उठा सकता।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के भारत संघ बनाम एस.के. मूर्ति और दिल्ली हाईकोर्ट के नकुल देव मामले के फैसलों का हवाला दिया।
उन्होंने बताया कि नकुल देव मामले में सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए इंटरव्यू की आवश्यकता समाप्त कर दी गई थी।
अपने फैसले को नजीर मानने से रोकने का अधिकार किसे है?
हाईकोर्ट ने पाया कि नकुल देव मामले के तथ्य वर्तमान मामले से लगभग पूरी तरह मेल खाते हैं।
इसके बाद बेंच ने उस मामले में अधिकरण द्वारा लगाई गई शर्त पर विचार किया, जिसे हाईकोर्ट ने भी स्वीकार किया था। इस शर्त के अनुसार, फैसले को किसी अन्य मामले में नजीर के रूप में उद्धृत नहीं किया जाना था।
डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की,
“हालांकि ऐसा अक्सर किया जाता है, लेकिन हमें इस बात पर गंभीर संदेह है कि सुप्रीम कोर्ट के अलावा किसी अन्य अदालत को न्यायिक फैसला सुनाने के बाद यह शर्त लगाने का अधिकार है या नहीं कि उस फैसले को किसी अन्य मामले में नजीर के रूप में उद्धृत नहीं किया जाएगा।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी फैसले के संबंध में यह कहना कि वह विशेष परिस्थितियों और तथ्यों पर आधारित है, तथा उस फैसले को भविष्य में नजीर के रूप में इस्तेमाल करने से रोकना, दोनों अलग बातें हैं।
बेंच ने कहा,
“ऐसी टिप्पणी को किसी अन्य मामले में उस फैसले को नजीर के रूप में उद्धृत करने पर प्रतिबंध नहीं माना जा सकता, भले ही ऐसा प्रतिबंध अप्रत्यक्ष रूप से लगाने का आशय हो।”
नजीर के रूप में फैसले के इस्तेमाल पर रोक लगाने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के अपीलीय क्षेत्राधिकार से जुड़ा है
हाईकोर्ट ने एनबीसीसी (इंडिया) लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल किसी विशेष विवाद का निपटारा करने वाले फैसलों और अन्य मामलों में नजीर के रूप में लागू होने वाले फैसलों के बीच अंतर करने की शक्ति सुप्रीम कोर्ट के अपीलीय क्षेत्राधिकार की विशेषता है।
बेंच ने कहा,
“यह अंतर सुप्रीम कोर्ट के अपीलीय क्षेत्राधिकार की अनूठी विशेषता है।”
हाईकोर्ट ने इस संबंध में निचली अदालतों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा,
“यदि निचली अदालतें स्वयं यह स्पष्ट करने का अधिकार अपने हाथ में ले लें कि उनके द्वारा दिए गए फैसलों को बाध्यकारी नजीर नहीं माना जाएगा, तो ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जिसमें तथ्यों के आधार पर समान परिस्थितियों वाले वादियों के साथ अदालत द्वारा अलग-अलग व्यवहार किया जाए।”
साइंटिस्ट सी की पदोन्नति पर अधिकरण का फैसला सही
पदोन्नति के विवाद पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि साइंटिस्ट सी के पद पर अधिकारी की पदोन्नति से संबंधित अधिकरण का निर्देश एस.के. मूर्ति और नकुल देव मामलों में निर्धारित सिद्धांतों के अंतर्गत आता है।
कोर्ट ने ध्यान दिया कि संबंधित अधिकारी का साइंटिस्ट सी पद के लिए मूल्यांकन किया गया था और उन्हें उस पद पर पदोन्नति भी मिली थी।
इसलिए हाईकोर्ट ने इस संबंध में अधिकरण के फैसले को सही माना।
साइंटिस्ट डी के लिए योग्यता का मूल्यांकन जरूरी
साइंटिस्ट डी के पद पर पदोन्नति के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि एस.के. मूर्ति मामले का फैसला सीधे लागू नहीं होगा, क्योंकि संबंधित अधिकारी का इस पद के लिए कभी मूल्यांकन नहीं किया गया था।
बेंच ने स्पष्ट किया,
“इस मूल्यांकन को समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह स्वयं FCS की अनिवार्य शर्त है।”
हालांकि, कोर्ट ने माना कि अधिकारी के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद अब उनका इंटरव्यू नहीं लिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि पदोन्नति पर विचार करने में हुई देरी के लिए पूरी तरह पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय जिम्मेदार था।
बेंच ने टिप्पणी की,
“संबंधित अधिकारी को इस लाभ से वंचित करना पूरी तरह अन्यायपूर्ण, असमानतापूर्ण और अनुचित होगा, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि FCS के तहत साइंटिस्ट डी के पद पर उनकी इन-सीटू पदोन्नति पर विचार करने में हुई देरी के लिए पूरी तरह पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय जिम्मेदार है।”
कोर्ट ने नकुल देव मामले के फैसले का अनुसरण करते हुए इंटरव्यू की आवश्यकता समाप्त कर दी।
बेंच ने यह भी ध्यान दिया कि संबंधित अधिकारी को केवल चार साल पहले साइंटिस्ट सी की पदोन्नति के लिए इंटरव्यू में योग्य पाया गया था।
हाईकोर्ट ने अधिकरण का फैसला एक शर्त के साथ बरकरार रखा
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के फैसले को बरकरार रखते हुए साइंटिस्ट डी की पदोन्नति के संबंध में एक शर्त जोड़ी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारी को 1 जनवरी 2010 से साइंटिस्ट डी के पद पर पदोन्नति का लाभ तभी मिलेगा, जब उन्हें कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के 9 नवंबर 1998 के कार्यालय ज्ञापन में निर्धारित मानदंडों के अनुसार योग्य पाया जाएगा।
हालांकि, इस मूल्यांकन में इंटरव्यू की आवश्यकता लागू नहीं होगी।
इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की रिट याचिका का निस्तारण कर दिया। कोर्ट ने किसी भी पक्ष पर मुकदमे का खर्च नहीं लगाया।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: भारत संघ एवं अन्य बनाम ओम प्रकाश
- केस नंबर: रिट याचिका (सिविल) संख्या 5071/2025
- बेंच: जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस विनोद कुमार
- फैसले की तारीख: 15 अक्टूबर 2026
