कारोबारी समझौता टूटने पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी का केस रद्द किया

कलकत्ता हाईकोर्ट ने फैक्ट्री किराए पर देने के समझौते से जुड़े विवाद में एक फैक्ट्री मालिक के खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और धमकी देने का मुकदमा रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह विवाद पूरी तरह कारोबारी अनुबंध से संबंधित है और इसका समाधान सिविल कानून के तहत किया जा सकता है। केवल इसलिए किसी कारोबारी विवाद को आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता कि दोनों पक्षों के बीच समझौता सफल नहीं हो पाया।

जस्टिस उदय कुमार ने 12 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाते हुए पाया कि फैक्ट्री मालिक द्वारा चेक बाउंस का मामला दर्ज कराने के बाद उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई थी। हाईकोर्ट ने इसे चेक बाउंस की कार्यवाही के जवाब में की गई बदले की कार्रवाई माना।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे आपराधिक मुकदमे को जारी रखने की अनुमति देना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

क्या था पूरा विवाद?

मामला पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में करीब 16,000 वर्ग फुट के एक फैक्ट्री शेड को किराए पर देने से जुड़ा है।

फैक्ट्री मालिक विशाल अग्रवाल का यह शेड हावड़ा के सांकराइल स्थित मौजा जाला-धूलागोरी में था। विवेक अग्रवाल ने बृज लाल बंसल के साथ मिलकर प्रस्तावित कंपनी बंसल पॉली प्लास्ट प्राइवेट लिमिटेड के लिए प्लास्टिक ग्रैन्यूल्स का प्लांट लगाने के उद्देश्य से यह परिसर किराए पर लेने की बात की थी।

दोनों पक्षों के बीच 11 दिसंबर 2018 को लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट हुआ। इसके तहत 1 जनवरी 2019 से 12 महीने के लिए फैक्ट्री परिसर उपलब्ध कराया जाना था।

समझौते के अनुसार, विवेक अग्रवाल ने ₹19,25,760 की सिक्योरिटी राशि चेक के माध्यम से जमा की। इसके अतिरिक्त बिजली कनेक्शन से संबंधित सुरक्षा के लिए ₹25 लाख का चेक भी दिया गया।

शुरुआत में फैक्ट्री के लिए 250 केवीए बिजली लोड की आवश्यकता बताई गई थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 200 केवीए कर दिया गया। इसके बाद विवेक अग्रवाल ने ₹20 लाख का भुगतान किया। दोनों पक्षों के बीच यह समझ थी कि ₹25 लाख का पहले दिया गया चेक वापस कर दिया जाएगा।

हालांकि, बाद में दोनों पक्षों के बीच विवाद हो गया और कारोबारी समझौता आगे नहीं बढ़ सका।

चेक बाउंस का केस दर्ज होने के बाद कराई गई एफआईआर

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विवाद बढ़ने पर विवेक अग्रवाल ने 11 फरवरी 2019 को फैक्ट्री मालिक को कानूनी नोटिस भेजकर ₹39,25,760 वापस करने की मांग की।

इसके बाद फैक्ट्री मालिक ने 14 मार्च 2019 को ₹25 लाख का चेक बैंक में जमा किया, लेकिन भुगतान रोकने के निर्देश के कारण चेक बाउंस हो गया।

फैक्ट्री मालिक ने 18 अप्रैल 2019 को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस की शिकायत दर्ज कराई।

इसके सात दिन बाद, 25 अप्रैल 2019 को विवेक अग्रवाल ने हावड़ा के गोलाबाड़ी पुलिस स्टेशन में फैक्ट्री मालिक के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 406 और 506 के तहत एफआईआर दर्ज करा दी।

पुलिस ने मई 2021 में चार्जशीट दाखिल की। दूसरी ओर, विवेक अग्रवाल ने रकम की वसूली के लिए हावड़ा की सिविल कोर्ट में भी मुकदमा दायर किया।

आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए फैक्ट्री मालिक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

फैक्ट्री मालिक की दलील: समझौते के तहत परिसर स्वीकार किया गया था

याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट रचित लखमानी और एडवोकेट अनुराग सरदार ने दलील दी कि किराएदार ने समझौते की शर्त संख्या 11 के तहत फैक्ट्री परिसर को उसकी मौजूदा स्थिति में स्वीकार किया था।

समझौते की शर्त संख्या 12 के अनुसार, परिसर में किसी भी प्रकार के निर्माण या अन्य सिविल कार्य का खर्च भी किराएदार को ही उठाना था।

याचिकाकर्ता ने कहा कि चेक बाउंस का मुकदमा शुरू होने के बाद दबाव बनाने के उद्देश्य से आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई।

यह भी दलील दी गई कि आईपीसी की धारा 406 और 420 के आरोप एक ही लेनदेन के संबंध में परस्पर विरोधी हैं।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट का ध्यान इस तथ्य की ओर भी दिलाया कि पुलिस की चार्जशीट में स्वयं यह दर्ज था कि विवाद किराएदारी से संबंधित सिविल प्रकृति का है।

वहीं, शिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट शतद्रु लाहिड़ी और एडवोकेट स्वाति चौधरी ने याचिका का विरोध किया।

शिकायतकर्ता का कहना था कि फैक्ट्री मालिक ने परिसर में 250 केवीए का बिजली कनेक्शन, धुआं निकालने वाली चिमनियां और औद्योगिक उपयोग के लिए तैयार फर्श होने का गलत दावा किया था।

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राज्य सरकार की ओर से एडवोकेट पवन कुमार गुप्ता और एडवोकेट श्रेयश कुमार सिंह पेश हुए।

विरोधी पक्षों ने कहा कि मामले में तथ्यों को लेकर विवाद है, जिसकी जांच दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत सीमित सुनवाई में नहीं की जा सकती।

कारोबारी समझौता टूटना अपने आप में आपराधिक अपराध नहीं: हाईकोर्ट

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने अपने कानूनी नोटिस में स्वयं स्वीकार किया था कि समझौता करते समय फैक्ट्री परिसर का निरीक्षण किया गया था और उसे देखने के बाद ही चुना गया था।

कोर्ट ने कहा कि पूरा विवाद कारोबारी किराएदारी समझौते और उसके पूरा नहीं होने से उत्पन्न हुआ था।

जस्टिस उदय कुमार ने टिप्पणी की,

“केवल इसलिए सिविल जिम्मेदारी को आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता कि कोई कारोबारी समझौता विफल हो गया या बाद में अनुबंध की किसी शर्त का उल्लंघन हुआ।”

कोर्ट ने कहा कि कारोबारी अनुबंध के तहत जमा की गई सिक्योरिटी राशि या किया गया आंशिक भुगतान अपने आप में आपराधिक विश्वासघात का आधार नहीं बनता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया,

“कारोबारी किराएदारी समझौते में दी गई सिक्योरिटी राशि और आंशिक भुगतान को ऐसी संपत्ति सौंपना नहीं माना जा सकता, जिससे विश्वास पर आधारित विशेष कानूनी जिम्मेदारी या आपराधिक जिम्मेदारी पैदा होती हो।”

कोर्ट ने ललित चतुर्वेदी और दिल्ली रेस क्लब के मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि एक ही लेनदेन पर आईपीसी की धारा 406 और 420 को एक साथ लागू नहीं किया जा सकता।

चेक बाउंस की कार्यवाही के बाद एफआईआर दर्ज होने पर उठाए सवाल

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुई कानूनी कार्यवाही के घटनाक्रम को भी महत्वपूर्ण माना।

कोर्ट ने पाया कि फैक्ट्री मालिक ने 18 अप्रैल 2019 को चेक बाउंस का मुकदमा दर्ज कराया था, जबकि उसके खिलाफ धोखाधड़ी की एफआईआर 25 अप्रैल 2019 को दर्ज कराई गई।

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इस घटनाक्रम पर जस्टिस उदय कुमार ने कहा,

“धारा 138 के तहत कार्यवाही शुरू होने के तुरंत बाद एक सिविल कारोबारी शिकायत का अचानक आपराधिक मुकदमे में बदल जाना, एफआईआर दर्ज कराने के पीछे के वास्तविक उद्देश्य के बारे में बहुत कुछ बताता है।”

कोर्ट ने सुनील कुमार, डी.पी. गुलाटी और महमूद अली के मामलों में दिए गए फैसलों का भी उल्लेख किया।

हाईकोर्ट ने कहा,

“ऐसी कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देना आपराधिक न्याय व्यवस्था को दबाव बनाने और मजबूर करने के साधन में बदल देगा।”

बेंच ने माना कि फैक्ट्री परिसर की वास्तविक स्थिति और फर्श से जुड़े निर्माण कार्य को लेकर दोनों पक्षों के दावों की जांच सामान्य परिस्थितियों में ट्रायल के दौरान की जा सकती थी।

हालांकि, कोर्ट ने पाया कि मौजूदा मामले में विवाद मूल रूप से सिविल प्रकृति का था। आपराधिक धाराओं के तहत आरोप कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं थे और एफआईआर भी चेक बाउंस की कार्यवाही के जवाब में दर्ज कराई गई थी।

इन परिस्थितियों में आपराधिक मुकदमा जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

हाईकोर्ट ने एफआईआर से जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द की

कलकत्ता हाईकोर्ट ने फैक्ट्री मालिक की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए हावड़ा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में लंबित जीआर केस संख्या 2138/2019 की पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

इसके साथ ही मई 2021 में दाखिल चार्जशीट संख्या 149/2021 भी रद्द कर दी गई।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले में की गई टिप्पणियों का दोनों पक्षों के बीच लंबित रकम वसूली के सिविल मुकदमे या नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चल रहे चेक बाउंस मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

कोर्ट ने किसी भी पक्ष पर जुर्माना या मुकदमे का खर्च नहीं लगाया।

केस डिटेल्स

  • केस टाइटल: विशाल अग्रवाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य
  • केस नंबर: सीआरआर 4089/2022
  • बेंच: जस्टिस उदय कुमार
  • फैसले की तारीख: 12 अक्टूबर 2026

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