सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी मंदिर की इनाम जमीन (देवता के नाम पर दी गई भूमि) राज्य सरकार को दान नहीं की जा सकती। कोर्ट ने तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 41(1) के तहत ऐसे दान को शुरू से ही अमान्य करार दिया है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जमीन के हस्तांतरण को सही ठहराने वाले मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने जमीन के लिए राज्य सरकार द्वारा दिए जाने वाले मासिक किराए में बढ़ोतरी की और तमिलनाडु सरकार को मंदिर के पक्ष में ₹1 लाख का जुर्माना भरने का निर्देश दिया।
जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने फैसले की शुरुआत में ही मंदिर की संपत्ति के संरक्षण से जुड़ा महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किया।
कोर्ट ने कहा, “किसी धार्मिक या धर्मार्थ संस्था की संपत्ति का प्रबंधन करने वाले व्यक्ति का कर्तव्य उस संपत्ति का संरक्षण करना है, न कि उसे अपनी मर्जी से किसी को हस्तांतरित कर देना।”
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद तमिलनाडु के इरोड जिले के कोडुमुडी गांव में स्थित 1 एकड़ 10 सेंट जमीन से जुड़ा है। यह जमीन नागापालयम मरियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर की थी।
30 अगस्त 2017 को मंदिर के अस्थायी ट्रस्टी ने इस जमीन को तालुक कार्यालय के निर्माण के लिए तमिलनाडु सरकार को दान कर दिया। तहसीलदार ने सरकार की ओर से यह दान स्वीकार कर लिया।
मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी ने दानपत्र को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, 19 मार्च 2019 को हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट का कहना था कि 1959 के अधिनियम की धारा 34 में ‘दान’ शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। साथ ही, जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवादित तथ्य मौजूद हैं, जिनका फैसला रिट याचिका में नहीं किया जा सकता।
इसके बाद मंदिर के श्रद्धालुओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अपीलों पर सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने 23 मार्च 2022 को एक हलफनामा दाखिल किया। इसमें सरकार ने स्वीकार किया कि विवादित जमीन इनाम टाइटल डीड संख्या 388 के तहत देवता के नाम पर दी गई थी।
सरकार ने यह भी बताया कि राजस्व विभाग दानपत्र रद्द करने और जमीन को पट्टे पर लेने के लिए सहमत हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट में पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता एस. रविशंकर ने दलील दी कि जमीन मंदिर की होने पर कोई विवाद नहीं है। ऐसे में अस्थायी ट्रस्टी को मंदिर की संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति या सरकार को हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं था।
उन्होंने कहा कि अधिनियम की धारा 34 के तहत आवश्यक मंजूरी के बिना किया गया दान अमान्य है। साथ ही, रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 22-ए भी ऐसे दस्तावेज के पंजीकरण पर रोक लगाती है।
उन्होंने यह भी मांग की कि मंदिर को मिलने वाला किराया जमीन के बाजार मूल्य के आधार पर तय किया जाए।
दूसरी ओर, अस्थायी ट्रस्टी की ओर से अधिवक्ता के.एल. जनजानी ने कहा कि जमीन सार्वजनिक हित में दी गई थी। उन्होंने दावा किया कि श्रद्धालुओं और ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से जमीन हस्तांतरित करने का फैसला किया था।
उनका यह भी तर्क था कि अधिनियम की धारा 34 में दान का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरिप्रिया पद्मनाभन और हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम. सत्यनारायणन ने इस बात पर विवाद नहीं किया कि जमीन मंदिर की है और दानपत्र कानूनी रूप से कायम नहीं रह सकता।
हालांकि, उन्होंने बताया कि जमीन पर सरकारी धन से तालुक कार्यालय का निर्माण हो चुका है।
कोर्ट की सहायता के लिए नियुक्त एमिकस क्यूरी शैलेश मडियाल ने तर्क दिया कि दान में बदले में कोई प्रतिफल नहीं मिलता। इसलिए किसी धार्मिक संस्था की संपत्ति दान करना उस संस्था के लिए आवश्यक या लाभकारी नहीं माना जा सकता।
मंदिर की इनाम जमीन का दान शुरू से ही अमान्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवादित जमीन इनाम भूमि है। इसलिए इस पर 1959 के अधिनियम की धारा 41 लागू होती है। धारा 34(5) के कारण ऐसी जमीन धारा 34 के दायरे से बाहर है।
कोर्ट ने कहा कि धारा 41(1) के तहत सरकार कुछ प्रकार के हस्तांतरण की मंजूरी दे सकती है, लेकिन इसमें दान की अनुमति शामिल नहीं है।
बेंच ने कहा, “किसी देवता के भरण-पोषण और धार्मिक कार्यों के लिए समर्पित इनाम संपत्ति का दान शुरू से ही अमान्य है। ऐसी स्थिति में किसी भी स्तर पर दी गई मंजूरी उस दान को कानूनी वैधता प्रदान नहीं कर सकती।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल दानपत्र का पंजीकरण हो जाने से अवैध हस्तांतरण वैध नहीं हो जाता।
बेंच ने कहा, “एक कानून के तहत किया गया पंजीकरण उस कार्य को वैध नहीं बना सकता, जिसे संबंधित संपत्ति पर लागू दूसरा कानून अमान्य घोषित करता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी ट्रस्टी के अधिकारों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि किसी दूसरे की संपत्ति का प्रबंधन करने वाले व्यक्ति से सामान्य समझदारी और सावधानी के साथ काम करने की अपेक्षा की जाती है।
बेंच ने स्पष्ट किया कि “दान को उसकी प्रकृति के कारण ही किसी दूसरे की संपत्ति के प्रबंधन में सामान्य विवेक से किया गया कार्य नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने मंदिर की संपत्ति के संबंध में राज्य सरकार की भूमिका भी स्पष्ट की।
बेंच ने कहा, “राज्य मंदिर की संपत्तियों का संरक्षक और नियामक है, उनका मालिक नहीं।”
तमिलनाडु सरकार के रवैये पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि तमिलनाडु सरकार ने पहले मद्रास हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में दानपत्र का समर्थन किया था।
सरकार ने अपना रुख तब बदला, जब सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2022 में उससे हलफनामा दाखिल करने को कहा।
इसके बाद सरकार ने स्वीकार किया कि जमीन मंदिर की है और दानपत्र को कानूनी रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता।
मासिक किराया ₹13,235 से बढ़ाकर ₹31,000 किया
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विवादित जमीन पर अब तालुक कार्यालय का निर्माण हो चुका है। इस स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने सरकार के पक्ष में किए गए पट्टे को रद्द नहीं किया।
हालांकि, कोर्ट ने मंदिर को मिलने वाला किराया बढ़ाने का निर्देश दिया।
बेंच ने उचित किराया निर्धारण समिति के फॉर्मूले को लागू करते हुए सरकारी आदेश जी.ओ. (एमएस) संख्या 200 के अनुसार जमीन के बाजार मूल्य का 225 प्रतिशत आधार माना। इसके साथ भवन के मूल्यह्रास के बाद बचे मूल्य को भी गणना में शामिल किया गया।
इस आधार पर कोर्ट ने मासिक किराया ₹13,235 से बढ़ाकर ₹31,000 कर दिया।
बढ़ा हुआ किराया 8 मार्च 2019 से प्रभावी होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह बढ़े हुए किराए की बकाया राशि तीन महीने के भीतर जमा करे।
इसके अतिरिक्त सरकार को आठ सप्ताह के भीतर मंदिर को ₹1 लाख बतौर मुकदमे का खर्च देना होगा।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अधिनियम की धारा 34-ए के अनुसार हर तीन साल में किराए का नए सिरे से निर्धारण किया जाए। हालांकि, किसी भी स्थिति में मासिक किराया ₹31,000 से कम नहीं होगा।
मंदिर की संपत्ति से जुड़े फैसलों में संस्था का हित सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 34, 34-ए और 41 का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया।
बेंच ने स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्ति के संबंध में कोई भी निर्णय लेते समय धार्मिक संस्था और उसके हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे निर्णय हमेशा ट्रस्ट के हित में होने चाहिए, “न कि सरकार की प्रशासनिक सुविधा के आधार पर।”
इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मंदिर की जमीन के दान को शुरू से ही अमान्य घोषित कर दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: के. रामलिंगम एवं अन्य बनाम तमिलनाडु सरकार, सचिव के माध्यम से एवं अन्य
केस नंबर: सिविल अपील संख्या ___/2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 20051-20052/2019 से उत्पन्न)
बेंच: जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
फैसले की तारीख: 16 अक्टूबर 2026

