इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि जेंडर बदलने की सर्जरी (एसआरएस) कराने के बाद भी ट्रांसजेंडर महिला, भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 69 के तहत परिभाषित ‘महिला’ के दायरे में नहीं आती है। बीएनएस की धारा 69 शादी का झूठा वादा करके या धोखे से बनाए गए यौन संबंधों को दंडनीय अपराध बनाती है। अदालत ने कहा कि बीएनएस और ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के कानूनी ढांचे के तहत ‘ट्रांसजेंडर’ को ‘महिला मानव’ से अलग एक स्वतंत्र पहचान के रूप में संहिताबद्ध किया गया है। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने इस कानूनी व्याख्या के आधार पर बीएनएस की धारा 69, 352 और 351(3) के तहत मुकदमे का सामना कर रहे आरोपी की जमानत याचिका मंजूर कर ली।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बरेली जिले के इज्जतनगर थाने में दर्ज केस क्राइम संख्या 0728/2026 से जुड़ा है। प्राथमिकी के अनुसार, शिकायतकर्ता एक ट्रांसजेंडर महिला है। उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ डेढ़ साल से अधिक समय तक संबंध बनाए। इस दौरान आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध स्थापित किए, पांच लाख रुपये से अधिक की रकम ली और बाद में शादी करने से मुकर गया। साथ ही उसके परिजनों ने शिकायतकर्ता को डांट-फटकार कर भगा दिया।
शिकायतकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 180 के तहत दर्ज अपने बयान में स्वीकार किया कि जन्म के समय वह पुरुष थी। उसने 11 अप्रैल 2023 को वुल्वल रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी कराकर खुद को महिला में बदला था। इसके बाद एक वैवाहिक कार्यक्रम में आरोपी से उसकी मुलाकात हुई, जहां आरोपी ने शादी का प्रस्ताव रखा। इसके बाद दोनों के बीच संबंध बने। बाद में बीएनएसएस की धारा 183 के तहत दिए बयान में शिकायतकर्ता ने पहली बार यह बात कही कि संबंध बनाने से पहले ही उसने आरोपी को अपने ट्रांसजेंडर महिला होने की जानकारी दे दी थी, फिर भी आरोपी संबंध जारी रखने को तैयार था और बाद में बड़ी रकम हड़पने के बाद शादी से पीछे हट गया।
पक्षों और एमिकस क्यूरी की दलीलें
आवेदक के अधिवक्ता ने दलील दी कि 19 अगस्त 2026 की मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट के अनुसार, शिकायतकर्ता वास्तव में महिला नहीं पाई गई, बल्कि वह बदले हुए गुप्तांग वाला एक पुरुष है और उसके शरीर में गर्भाशय (यूटरस) नहीं है। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि बीएनएस की धारा 69 के तत्वों को लागू करने के लिए प्राथमिक शर्त यह है कि पीड़ित ‘महिला’ होनी चाहिए। वहीं बीएनएस की धारा 2(35) में ‘महिला’ को स्पष्ट रूप से ‘किसी भी उम्र की महिला मानव’ के रूप में परिभाषित किया गया है।
बचाव पक्ष ने आगे कहा कि बीएनएस की धारा 2(10) के तहत ‘जेंडर’ में पुरुष, महिला और ट्रांसजेंडर तीनों शामिल हैं, जहां ट्रांसजेंडर की परिभाषा 2019 के अधिनियम की धारा 2(के) से ली गई है। लिहाजा, सर्जरी के जरिए गुप्तांग बदलवाने वाला व्यक्ति कानून की नजर में ट्रांसजेंडर ही रहेगा, वह बीएनएस की धारा 2(35) की ‘महिला’ नहीं बन जाता। इसके अलावा शिकायतकर्ता ने यौन शोषण की पुष्टि के लिए मेडिकल परीक्षण कराने से इनकार कर दिया था, जिससे झूठे फंसाए जाने की आशंका को बल मिलता है।
जमानत अर्जी का विरोध करते हुए अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने तर्क दिया कि गुप्तांग बदलने की सर्जरी के बाद पुरुष के रूप में जन्मा व्यक्ति, जिसमें महिला हार्मोन हों, वह गर्भाशय न होने के बावजूद महिला के दायरे में आएगा। सरकार का कहना था कि सर्जरी के बाद महिला बनी ट्रांसजेंडर को महिला की श्रेणी से बाहर नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार ने यह भी तथ्य सामने रखा कि शिकायतकर्ता ने आधिकारिक रिकॉर्ड में अपना जेंडर बदलने के लिए कोई आवेदन नहीं दिया था और वह सरकारी दस्तावेजों में अब भी पुरुष के रूप में दर्ज है।
मामले के कानूनी महत्व को देखते हुए हाईकोर्ट ने अधिवक्ता सुश्री मयूरी मेहरोत्रा को न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया। एमिकस क्यूरी ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के विश्वनाथन कृष्णमूर्ति बनाम आंध्र प्रदेश राज्य फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि प्रजनन क्षमता न होने पर भी ट्रांसजेंडर महिला को महिला की परिभाषा से बाहर नहीं किया जा सकता और उसके खिलाफ क्रूरता आईपीसी की धारा 498ए के तहत दंडनीय है। उन्होंने उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक्स बनाम उत्तराखंड राज्य मामले का भी उल्लेख किया, जो सुप्रीम कोर्ट के नालसा फैसले पर आधारित था। हालांकि, एमिकस क्यूरी ने यह भी रेखांकित किया कि 2019 के अधिनियम की धारा 2(के) के तहत सर्जरी के बाद भी व्यक्ति ट्रांसजेंडर के दायरे में आता है और ऐसे व्यक्तियों के साथ शारीरिक या यौन दुर्व्यवहार के लिए उसी कानून की धारा 18(डी) में अधिकतम दो साल की सजा का विशिष्ट प्रावधान मौजूद है।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण
हाईकोर्ट ने विचार के लिए मुख्य प्रश्न तय किया: “क्या बीएनएस की धारा 69 के प्रयोजन के लिए किसी ट्रांसजेंडर महिला को ‘महिला’ माना जाएगा?”
अदालत ने बीएनएस की धारा 69 का अवलोकन किया, जो किसी ‘महिला’ के साथ शादी का झूठा वादा करके या धोखे से यौन संबंध बनाने को दंडित करती है। अदालत ने पाया कि बीएनएस की धारा 2(35) के तहत ‘महिला’ का अर्थ किसी भी उम्र की ‘महिला मानव’ है। इसके विपरीत, धारा 2(10) में जेंडर के अंतर्गत पुरुष, महिला और ट्रांसजेंडर को अलग-अलग श्रेणी में रखा गया है।
कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“जेंडर की उपरोक्त परिभाषा से यह स्पष्ट है कि ट्रांसजेंडर न तो पुरुष है और न ही महिला, 2019 के अधिनियम की धारा 2(के) में उल्लिखित अनुसार इसकी एक अलग पहचान है। 2019 के अधिनियम की धारा 2(के) के अनुसार, ट्रांसजेंडर व्यक्ति में वह व्यक्ति शामिल होगा जिसका जेंडर जन्म के समय उसे दिए गए जेंडर से मेल नहीं खाता है और ट्रांसजेंडर में ट्रांस-मैन या ट्रांस-वुमन शामिल हैं, भले ही ऐसे व्यक्ति ने सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी कराई हो…”
अदालत ने आगे स्पष्ट किया:
“ट्रांसजेंडर व्यक्ति की उपरोक्त परिभाषा स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि भले ही किसी व्यक्ति को जन्म के समय पुरुष माना गया हो और सर्जरी के बाद वह महिला बन गया हो, या जन्म के समय महिला माना गया व्यक्ति सर्जरी के बाद पुरुष बन गया हो, तो भी यह स्पष्ट है कि ट्रांसजेंडर पुरुष या महिला एक ट्रांसजेंडर ही रहेगा, न कि पुरुष मानव या महिला मानव। बीएनएस की धारा 69 में उल्लिखित ‘महिला’ शब्द में केवल महिला मानव ही शामिल है।”
अदालत ने कहा कि यदि किसी ट्रांसजेंडर महिला का यौन शोषण होता है, तो उसके लिए ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 18(डी) के तहत विशेष प्रावधान मौजूद है, जिसमें दो साल तक के कारावास की सजा तय की गई है।
हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के भूपेश ठाकुर बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2024) फैसले का भी संदर्भ लिया, जिसमें माना गया था कि बीएनएस में ‘महिला’ और ‘ट्रांसजेंडर’ की अलग पहचान तय होने के कारण आरोपी पर धारा 69 लागू नहीं की जा सकती, बल्कि मामला 2019 के अधिनियम की धारा 18(डी) के तहत देखा जाएगा। वहीं उत्तराखंड और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पुराने फैसलों को अलग करते हुए अदालत ने कहा कि वे आदेश बीएनएस के लागू होने से पहले के थे, जब कानून में ट्रांसजेंडर को एक अलग कानूनी पहचान के रूप में संहिताबद्ध नहीं किया गया था।
जस्टिस देशवाल ने विधायी इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट संख्या 246 (दिसंबर 2023) में सिफारिश की थी कि बीएनएस में संशोधन कर ट्रांसजेंडर महिलाओं को भी महिलाओं से जुड़े अपराधों के दायरे में लाया जाए। लेकिन संसद ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया और बीएनएस में बिना ट्रांसजेंडर महिलाओं को शामिल किए ‘महिला’ शब्द को यथावत रखा।
इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला:
“उपरोक्त विश्लेषण के आलोक में यह स्पष्ट है कि ट्रांस-वुमन (सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी के बाद भी) ट्रांसजेंडर की श्रेणी में ही शामिल होगी, न कि महिला (महिला मानव) की परिभाषा में, विशेष रूप से बीएनएस की धारा 69 के प्रयोजन के लिए, जहां कपटपूर्ण साधन या शादी का झूठा वादा महिला से संबंधित है।”
अदालत का निर्णय और जमानत की शर्तें
मामले के तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता जन्म से पुरुष थी, जिसने सर्जरी कराकर ट्रांस-महिला का रूप लिया और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष जेंडर बदलने का कोई कानूनी आवेदन भी नहीं किया था। ऐसे में प्रथम दृष्टया बीएनएस की धारा 69 का अपराध नहीं बनता है। अदालत ने साफ किया कि उसकी यह टिप्पणी केवल बीएनएस की धारा 69 में प्रयुक्त ‘महिला’ की व्याख्या तक ही सीमित है।
अदालत ने आरोपी को व्यक्तिगत बंधपत्र और दो प्रतिभूतियां प्रस्तुत करने पर जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही गवाहों को न धमकाने, जांच व मुकदमे में सहयोग करने और अपराध न करने की शर्तें तय कीं।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुपालन में, विचारण अदालत को निर्देश दिया गया कि वह बेल ऑर्डर मैनेजमेंट सिस्टम (बीओएमएस) और ई-प्रिजन पोर्टल के माध्यम से 24 घंटे के भीतर रिहाई का आदेश बरेली जेल भेजे। इसके अलावा हाईकोर्ट ने मामले में सहयोग देने के लिए एमिकस क्यूरी सुश्री मयूरी मेहरोत्रा को 10,000 रुपये का मानदेय देने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मोहम्मद साकिर उर्फ मोहम्मद साकिर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लीकेशन संख्या 36167/2026
पीठ: जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल
निर्णय की तिथि: 15 अक्टूबर 2026

