इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के आंबेडकर नगर जिले की विधानसभा सीटों के परिसीमन और आलापुर सीट को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि करीब दो दशक पुराने इस फैसले को अब दोबारा नहीं खोला जा सकता, क्योंकि याचिका बेहद देरी से दाखिल की गई है।
जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता परिसीमन में किसी भी तरह के संवैधानिक उल्लंघन को साबित करने में नाकाम रहा है। पीठ ने कहा कि 5 दिसंबर 2006 को जारी परिसीमन आदेश कानून का रूप ले चुका है। महज इसलिए इसे रद्द या दोबारा शुरू नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी याचिकाकर्ता ने अपनी निजी गणना या जातिगत आंकड़ों के आधार पर अलग निष्कर्ष निकाला है।
संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन का दावा
यह याचिका आंबेडकर नगर के स्थानीय मतदाता दिलीप कुमार ने दायर की थी। उन्होंने जिले के सभी विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन और आरक्षण के नए सिरे से निर्धारण की मांग की थी।
याचिकाकर्ता की दलील थी कि जिले की पांचों विधानसभा सीटों—कटेहरी, टांडा, आलापुर, जलालपुर और अकबरपुर—के बीच जनसंख्या का बंटवारा समान नहीं है, जो संविधान के अनुच्छेद 170(2) का उल्लंघन है। उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि परिसीमन से असंतुलन पैदा हुआ, जिसके चलते जलालपुर की आबादी 4,60,245 हो गई जबकि अकबरपुर की आबादी महज 3,68,722 रह गई। याचिका में यह आरोप भी लगाया गया कि भौगोलिक सीमाओं के इस फेरबदल से आलापुर के आरक्षण दर्जे पर गलत असर पड़ा और वहां अनुसूचित जाति की आबादी का अनुपात ऐसा नहीं है कि उसे आरक्षित सीट बनाए रखा जाए।
न्यायिक समीक्षा के सीमित अधिकार
इन सभी तर्कों को नामंजूर करते हुए खंडपीठ ने कहा कि अनुच्छेद 170(2) में जनसंख्या और सीट के अनुपात में समानता ‘जहां तक संभव हो’ लागू करने की बात कही गई है। इससे परिसीमन आयोग को भौगोलिक निरंतरता, प्रशासनिक सीमाओं और अन्य स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखने की पूरी छूट मिलती है। जजों ने कहा कि औसत जनसंख्या में 10 प्रतिशत तक के अंतर की अनुमति देने वाले आयोग के दिशा-निर्देश केवल आंतरिक मानक हैं, कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी अधिकार नहीं।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि परिसीमन आदेशों की न्यायिक समीक्षा का दायरा बेहद सीमित होता है। अदालतें केवल तभी हस्तक्षेप कर सकती हैं जब मामला विधायी अधिकार क्षेत्र से बाहर का हो या मौलिक अधिकारों व संविधान के किसी प्रावधान का हनन हुआ हो। अदालत के मुताबिक याचिकाकर्ता इनमें से कोई भी आधार साबित नहीं कर पाया।
विगत चुनाव और नई जनगणना का हवाला
पीठ ने याचिका के समय पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा कि इस आदेश को जारी हुए लगभग बीस साल बीत चुके हैं और इस व्यवस्था के तहत कई विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। ऐसे में इतने लंबे समय बाद पुरानी प्रक्रिया को फिर से खोलना अनुचित होगा।
अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि 2026 की जनगणना पूरी होने की ओर बढ़ रही है, जिसके बाद नया परिसीमन शुरू हो सकता है।

