केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को निर्देश दिया है कि वह करीब आठ साल पुराने दोहरे हत्याकांड के अज्ञात संदिग्धों को पकड़ने के लिए अपराध स्थल से मिले फिंगरप्रिंट का मिलान तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के बायोमेट्रिक डेटा से करे।
जस्टिस जी. गिरीश ने 14 अक्टूबर को केरल पुलिस की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश मामले के असाधारण तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया है, इसलिए इसे भविष्य के मामलों में मिसाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, यूआईडीएआई को घटनास्थल से बरामद फिंगरप्रिंट की तुलना केवल कोयंबटूर जिले के बायोमेट्रिक रिकॉर्ड से करनी होगी और जिन लोगों के निशान मेल खाते हैं, उनके पते-ठिकाने की जानकारी जांच अधिकारी को देनी होगी। जस्टिस गिरीश ने कहा कि जब जांच एजेंसी को ऐसे लोगों के बारे में सूचना मिल जाएगी, तो उसके बाद उन संदिग्धों से सीधे फिंगरप्रिंट लेना और फॉरेंसिक स्तर पर उनकी जांच आगे बढ़ाना पूरी तरह से पुलिस का काम होगा।
सैकड़ों जांच के बाद भी नहीं मिला था सुराग
यह मामला 14 नवंबर 2016 की रात का है, जब पलक्कड़ के कन्नुकुरिस्सी स्थित घर में एक अधेड़ दंपती की निर्मम हत्या कर दी गई थी। पुलिस के मुताबिक, बदमाशों ने तीन तोला सोना और 4,000 रुपये नकद लूटने के लिए इस वारदात को अंजाम दिया था।
जांच दल ने अपराध स्थल से छह उंगलियों के निशान बरामद किए थे। पुलिस ने एक संदिग्ध को पकड़ा था, जिसका फिंगरप्रिंट घटनास्थल के नमूनों से मेल खा गया, लेकिन बाकी आरोपियों की पहचान नहीं हो सकी। पुलिस ने इस दौरान 1,200 से अधिक लोगों के फिंगरप्रिंट से तुलना की, लेकिन अन्य कोई सुराग हाथ नहीं लगा।
जब जांच आगे नहीं बढ़ सकी, तो पुलिस ने आधार डेटाबेस से मदद मांगी। यूआईडीएआई द्वारा फिंगरप्रिंट मिलान की अर्जी ठुकराए जाने के बाद पुलिस ने हाईकोर्ट का रुख किया।
यूआईडीएआई ने जताई थी निजता और तकनीकी दिक्कतों की चिंता
केंद्र सरकार और यूआईडीएआई की ओर से पेश डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ओ.एम. शलीना और वकील सुविन आर. मेनन ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि कानून प्राधिकरण के डेटाबेस में दर्ज बायोमेट्रिक और अन्य जानकारियों को साझा करने की अनुमति नहीं देता।
प्राधिकरण के वकीलों का तर्क था कि इस मांग को स्वीकार करने से करोड़ों नागरिकों के निजता के अधिकार का हनन होगा। साथ ही, इससे जांच एजेंसियों की ऐसी याचिकाओं की बाढ़ आ जाएगी, जो यूआईडीएआई द्वारा गोपनीय रखे गए 130 करोड़ से अधिक लोगों के बायोमेट्रिक डेटा से मिलान की मांग करने लगेंगी। इसके अलावा, उन्होंने कागज या अन्य सतहों से उठाए गए फिंगरप्रिंट को आधार डेटा से मिलाने में तकनीकी बाधाओं की बात भी कही।
जांच का दायरा सिर्फ एक जिले तक सीमित
केरल पुलिस की ओर से पेश वकील पी. नारायणन ने अदालत को आश्वस्त किया कि पुलिस पूरे देश के आधार डेटाबेस में जांच नहीं कराना चाहती। उन्होंने कहा कि पुलिस को पक्का भरोसा है कि बाकी संदिग्ध तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले में छिपे हुए हैं, इसलिए केवल उसी जिले के आंकड़ों से मिलान कराना काफी होगा।
तकनीकी अड़चनों पर पुलिस के वकील ने बताया कि सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक) के विशेषज्ञों ने पुष्टि की है कि यह काम संभव है। सी-डैक के सॉफ्टवेयर और नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (नेफिस) की मदद से जेपीईजी फॉर्मेट वाले फिंगरप्रिंट को बाइनरी फॉर्मेट में आसानी से बदला जा सकता है।
अदालत ने आधार कानून के नियमों पर क्या कहा
कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आधार कानून में दर्ज सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़ी धाराएं तब लागू नहीं होतीं, जब खुद हाईकोर्ट के किसी जज ने जानकारी साझा करने का आदेश दिया हो।
अदालत ने यह भी माना कि सामान्य तौर पर कानून में आदेश देने से पहले यूआईडीएआई और संबंधित आधार कार्डधारक दोनों का पक्ष सुनना जरूरी होता है। हालांकि, जस्टिस गिरीश ने कहा कि इस मामले में आधार कार्डधारकों को सुनना संभव नहीं है, क्योंकि अगर जांच एजेंसी को संदिग्धों के बारे में पहले से पता होता तो उसे यूआईडीएआई के पास जाने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती।
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि कानून मूल बायोमेट्रिक जानकारी साझा करने से रोकता है। इसलिए अदालत ने यूआईडीएआई को सिर्फ कोयंबटूर के डेटाबेस से फिंगरप्रिंट का मिलान करने और मैच होने की स्थिति में संबंधित व्यक्तियों के ठिकाने की जानकारी पुलिस को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।

