झारखंड हाईकोर्ट ने 26 साल से अधिक समय तक वास्तविक जेल काट चुके एक उम्रकैदी की समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज करने वाली कार्यकारी अधिसूचना को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल अपराध की जघन्यता या उसकी गंभीरता के आधार पर ही किसी बंदी को रिहाई (रिमिशन) से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस रोनगोन मुखोपाध्याय ने क्रिमिनल रिट याचिका को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड (स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड) ने बिना सोचे-समझे और लकीर का फकीर बनकर बार-बार एक ही ढर्रे पर आदेश पारित किए। बोर्ड ने बंदी के सुधारात्मक आचरण, उसके द्वारा दोबारा अपराध किए जाने की घटी संभावना और सुधार की प्रगति पर कोई ध्यान नहीं दिया। अदालत ने 25 मार्च 2026 की खारिज करने वाली अधिसूचना को निरस्त करते हुए बोर्ड को निर्देश दिया कि वह अपनी अगली बैठक में स्थापित न्यायिक नज़ीरों के आलोक में याचिकाकर्ता की अर्जी पर विचार करे और एक विस्तृत एवं तर्कसंगत आदेश पारित करे।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता अनिल शर्मा पर लोअर बाजार थाना कांड संख्या 12/99 के तहत आरोप दर्ज किया गया था। आरोप था कि जब वह रांची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में बंद था, तब उसने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर सुधीर सिंह उर्फ भोमा नाम के एक साथी कैदी पर हमला किया, जिससे उसकी मौत हो गई। निचली अदालत ने 22 मार्च 2002 को सत्र वाद संख्या 443/99 में उसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302/34 और 307/34 के तहत दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई।
इसके बाद हाईकोर्ट ने 29 नवंबर 2002 को दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा को घटाकर सश्रम आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी 30 अप्रैल 2004 को अपील खारिज कर दी। वर्तमान रिट याचिका की सुनवाई के समय याचिकाकर्ता 26 साल की वास्तविक सजा और परिहार (रिमिशन) मिलाकर 29 साल से अधिक की जेल काट चुका था।
याचिकाकर्ता ने 1984 की बिहार समयपूर्व रिहाई नीति के तहत रिहाई की गुहार लगाई थी, जो उसकी दोषसिद्धि के समय प्रभावी थी। रिकॉर्ड पर रखी गई जांच रिपोर्ट भी उसके पक्ष में थीं: प्रधान परिवीक्षा अधिकारी (प्रिंसिपल प्रोबेशन ऑफिसर), बेगूसराय ने कहा कि उम्र, पारिवारिक जिम्मेदारियों और समाज की सकारात्मक राय को देखते हुए यह उम्मीद है कि वह जेल से छूटने के बाद एक अच्छे नागरिक का जीवन जीएगा। रांची के प्रोबेशन ऑफिसर ने उसके निवास स्थान का मुआयना करने के बाद रिपोर्ट दी कि वह अन्य सभी मामलों में बरी हो चुका है और उसे समयपूर्व रिहाई का लाभ दिया जाना उचित होगा। बेगूसराय के पुलिस अधीक्षक (एसपी) द्वारा भेजी गई रिपोर्ट में भी स्थानीय ग्रामीणों की ओर से कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी।
इन अनुकूल रिपोर्टों के बावजूद, स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड ने कई बैठकों में—2018, 2020, 2023, 2024, 2025 और अंततः 25 मार्च 2026 की विवादित अधिसूचना संख्या 1262 के तहत—उसकी अर्जी खारिज कर दी। बोर्ड ने हर बार यही आधार दोहराया कि हत्या जेल के भीतर हुई थी, कैदी पूर्व में न्यायिक हिरासत से भाग चुका था और उसके छूटने से समाज में गैंगवार छिड़ने व शांति भंग होने की प्रबल संभावना है।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार ने तर्क दिया कि रिव्यू बोर्ड का 25 मार्च 2026 का आदेश बिना किसी वैध कारण के पारित किया गया है और इसमें बाद के कानूनी घटनाक्रमों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने बताया कि हिरासत से भागने के जिस आरोप को बोर्ड बार-बार दोहरा रहा है, उस मामले में एक अपीलीय अदालत याचिकाकर्ता को पहले ही बरी कर चुकी है। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता का मामला 1984 की बिहार नीति के तहत आता है, जिसके अनुसार 14 साल की वास्तविक कैद और रिमिशन मिलाकर 20 साल पूरे होने पर रिहाई का प्रावधान था। इसके अलावा, यदि झारखंड की 2007 की नीति को भी देखा जाए, तो याचिकाकर्ता उसमें निर्धारित 25 साल (रिमिशन सहित) की अधिकतम सीमा से भी कहीं अधिक समय जेल में बिता चुका है। वरिष्ठ वकील ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की उम्र 65 वर्ष से अधिक है, वह कई गंभीर बीमारियों से ग्रसित है और एम्स में उसकी बाईपास सर्जरी भी हो चुकी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ‘रोहित चतुर्वेदी बनाम उत्तराखंड राज्य’ फैसले का हवाला देते हुए लंबी कैद के आधार पर रिहाई की मांग की।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता एक हिस्ट्रीशीटर व गैंगस्टर रहा है, जिसने जेल के अंदर हत्या का गंभीर अपराध किया था। राज्य ने तर्क दिया कि केवल 14 साल की वास्तविक कैद और 20 साल की कुल सजा काट लेने से समयपूर्व रिहाई का कोई स्वत: अधिकार नहीं मिल जाता। यह निर्णय लेने का कानूनी अधिकार रिव्यू बोर्ड के पास है, जो शांति व्यवस्था और गैंगवार की आशंका को देखते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करता है। राज्य का यह भी कहना था कि झारखंड सरकार द्वारा 2003, 2007, 2011 और 2013 में जारी संकल्पों के बाद 1984 की नीति का कोई औचित्य नहीं रह जाता। साथ ही, जेल के अंदर उसे समुचित चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
संवैधानिक और वैधानिक सिद्धांतों का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने ‘हरियाणा राज्य बनाम जगदीश’, ‘लक्ष्मण नस्कर बनाम भारत संघ’ और ‘भारत संघ बनाम वी. श्रीहरन उर्फ मुरुगन’ (संविधान पीठ) के फैसलों का संदर्भ लिया। अदालत ने याद दिलाया कि ‘शहजाद अंसारी बनाम झारखंड राज्य’ के मामले में यह साफ किया जा चुका है कि झारखंड में 18 अप्रैल 2007 को नई नीति आने से पहले तक 1984 की नीति ही लागू मानी जाएगी।
हाईकोर्ट ने झारखंड सरकार के 18 अप्रैल 2007 के संकल्प संख्या 1315 के खंड 3 का बारीकी से परीक्षण किया। इसमें कहा गया था कि 14 साल की वास्तविक सजा और 20 साल परिहार सहित पूरा कर लेने से कैदी को सीधे रिहाई का अधिकार नहीं मिल जाता, लेकिन साथ ही यह अनिवार्य शर्त भी थी कि “किसी भी परिस्थिति में कारावधि परिहार सहित पच्चीस वर्ष से अधिक नहीं होगी।” अदालत ने पाया कि हालांकि 10 सितंबर 2009 और 26 मई 2011 के संकल्पों में इस 25 साल की अधिकतम सीमा वाले हिस्से को हटा दिया गया था, लेकिन राज्य सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में इन बाद के संकल्पों को रिकॉर्ड पर पेश ही नहीं किया और केवल खानापूरी वाले तर्क दिए।
रिव्यू बोर्ड द्वारा अपनाए गए आधारों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि ‘जगदीश’ मामले के पैरा 46 में तय किए गए अनिवार्य मानकों की पूरी तरह अनदेखी की गई है—जैसे कि क्या कैदी में अपराध करने की क्षमता खत्म हो चुकी है, क्या उसे आगे जेल में रखने का कोई सार्थक उद्देश्य है और जेल में उसका आचरण कैसा रहा है। अदालत ने रांची के प्रोबेशन ऑफिसर की 18 सितंबर 2024 की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें साफ लिखा था कि कैदी 63 वर्ष का हो चुका है, कई बीमारियों से जूझ रहा है, उसमें अपराध दोहराने की संभावना न के बराबर है, जेल में उसका आचरण बहुत अच्छा है, वह सुधार कार्यक्रमों में सक्रिय भाग लेता है और जब भी पैरोल पर बाहर गया तो उसका व्यवहार बेदाग रहा।
रिव्यू बोर्ड के ढर्रे पर आधारित फैसलों की कड़ी आलोचना करते हुए जस्टिस रोनगोन मुखोपाध्याय ने टिप्पणी की:
“उक्त खारिज आदेश में जेल अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक, प्रोबेशन अधिकारी और संबंधित अदालत की राय का केवल एक सरसरी उल्लेख किया गया है, बिना यह बताए कि उन रायों में वास्तव में क्या था या प्रोबेशन अधिकारी की अनुकूल रिपोर्ट के बावजूद यह कैसे मान लिया गया कि अब भी गैंगवार और सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका है। वास्तव में, समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज करने वाले रिकॉर्ड पर मौजूद सभी आदेशों में एक ही जैसी बात दोहराई गई है, जो स्पष्ट रूप से विवेक के अभाव को दर्शाती है और ये आदेश एक ऐसे घिसे-पिटे ढर्रे में बंधे हैं जिसे हर हाल में रिहाई की अर्जी खारिज करने के लिए ही तैयार किया गया लगता है।”
अदालत ने इस बात पर खास जोर दिया कि बोर्ड ने हिरासत से भागने की बात बार-बार दोहराई, जबकि क्रिमिनल अपील संख्या 184/2010 में अपीलीय अदालत ने 25 फरवरी 2014 को ही उसे इस आरोप से बाइज्जत बरी कर दिया था।
सजा माफी के संवैधानिक दायरे को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘रोहित चतुर्वेदी बनाम उत्तराखंड राज्य’ फैसले का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट कहा गया था:
“जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं, समयपूर्व रिहाई (रिमिशन) सजा देने की न्यायिक प्रक्रिया का विस्तार नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य से जुड़ी एक स्वतंत्र कार्यकारी व्यवस्था है—अर्थात कैदी का आचरण, उसके सुधरने के प्रमाण और समाज में उसके पुनर्वास की संभावनाएं। केवल अपराध की जघन्यता के आधार पर रिहाई से इनकार करना इस अंतर को मिटाना होगा और रिमिशन को दोबारा से अपराधबोध थोपने की प्रक्रिया में बदलना होगा, जिसका फैसला अदालतें पहले ही कर चुकी हैं।”
हाईकोर्ट ने माना कि रिव्यू बोर्ड केवल पुराने अपराध के इर्द-गिर्द घूमता रहा और उसने कैदी के मौजूदा आचरण, पारिवारिक स्थिति और अपराध करने की समाप्त हो चुकी प्रवृत्ति की पूरी तरह अनदेखी कर दी।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि बोर्ड का आदेश पूरी तरह यांत्रिक और अनुचित आधारों पर दिया गया था। अदालत ने 25 मार्च 2026 की विवादित अधिसूचना संख्या 1262 को याचिकाकर्ता की हद तक रद्द कर दिया।
अदालत ने मामले को राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के मामले को बोर्ड की आगामी बैठक में अनिवार्य रूप से रखा जाए। बोर्ड को हाईकोर्ट की टिप्पणियों और सुप्रीम कोर्ट के ‘रोहित चतुर्वेदी’ मामले के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए एक नया, विस्तृत और कारण सहित आदेश पारित करने का आदेश दिया गया। इसके साथ ही रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अनिल शर्मा बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपी (सीआर) संख्या 307/2026
पीठ: जस्टिस रोनगोन मुखोपाध्याय
निर्णय की तिथि: 13 अक्टूबर 2026

