सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 (पीएमएलए) की धारा 45 के तहत जमानत की वैधानिक दोहरी शर्तें लंबे समय तक हिरासत के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती हैं। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। शीर्ष अदालत ने 6,210 करोड़ रुपये से अधिक के कथित बैंक धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में संजय सुरेखा उर्फ संजय कुमार सुरेखा को नियमित जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा गिरफ्तारी के दस्तावेजों को न्यायनिर्णायक प्राधिकरण (एडजुकेटिंग अथॉरिटी) को भेजने में हुई पांच दिनों की देरी से पीएमएलए की धारा 19(2) के तहत गिरफ्तारी अवैध नहीं हो जाती, लेकिन जिस मामले के ट्रायल के पूरा होने में लंबा समय लगना तय हो, वहां आरोपी को अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मूल रूप से मेसर्स कॉन्कास्ट स्टील एंड पावर लिमिटेड के खिलाफ 7 नवंबर 2017 को शुरू हुई कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी) से जुड़ा है, जो बाद में कंपनी के लिक्विडेशन में जाने के साथ समाप्त हुई। 8 अक्टूबर 2021 को लिक्विडेटर ने इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (आईबीसी) की धारा 43, 45 और 66 के तहत एनसीएलटी के समक्ष एक आवेदन दायर किया, जिसमें कंपनी प्रबंधन द्वारा सीआईआरपी के दौरान या उससे पहले धोखाधड़ी और टालने योग्य लेनदेन करने का आरोप लगाया गया था। एनसीएलटी ने एक विस्तृत आदेश के जरिए इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसे आगे चुनौती नहीं दी गई।
इसके बाद, 6 सितंबर 2022 को सीबीआई ने आईपीसी की धारा 120बी, 420 और 477ए तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) और 13(2) के तहत एफआईआर दर्ज की। एफआईआर दर्ज होने के करीब एक साल तीन महीने बाद, 24 मार्च 2023 को ईडी ने अपीलकर्ता और चार अन्य आरोपियों के खिलाफ ईसीआईआर दर्ज की।
ईडी का आरोप था कि अपीलकर्ता ने कंपनी के टर्नओवर को कृत्रिम रूप से बढ़ाकर दिखाने, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले बैंकों के कंसोर्टियम से क्रेडिट सुविधाएं हासिल करने और उन फंड्स को 62 शेल कंपनियों के जरिए निजी लाभ के लिए डायवर्ट करने का एक जटिल वित्तीय जाल रचा। जांच एजेंसी के अनुसार, मामले में कथित अपराध की आय 6,210.72 करोड़ रुपये है, जिसमें से अब तक केवल 777.10 करोड़ रुपये की संपत्ति ही अटैच की जा सकी है। यह भी आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता ने 62 शेल कंपनियां बनाईं, 34 डमी डायरेक्टर नियुक्त किए और 20 कंपनियों में अपने रिश्तेदारों को तैनात किया। ईडी ने अपीलकर्ता को 18 दिसंबर 2024 को गिरफ्तार किया था।
पक्षकारों की दलीलें
कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा 14 नवंबर 2025 को जमानत खारिज किए जाने के खिलाफ अपील करते हुए अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह गिरफ्तारी पीएमएलए की धारा 19(1) और 19(2) का पालन न करने के कारण दूषित थी, इसलिए धारा 45 की कठोर शर्तें लागू नहीं हो सकतीं। विशेष रूप से यह तर्क दिया गया कि गिरफ्तारी आदेश और संबंधित सामग्री को न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को भेजने में पांच दिन की देरी की गई, जो धारा 19(2) का उल्लंघन है। इसके अलावा, 18 नवंबर 2024 के “गिरफ्तारी के आधार” और “विश्वास के कारण” दस्तावेजों की सामग्री अंतिम पैराग्राफ के सतही अंतर को छोड़कर लगभग एक जैसी थी, जो यह दर्शाती है कि कारण दर्ज करते समय विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया। यह भी कहा गया कि हिरासत के दौरान अपीलकर्ता से कोई पूछताछ तक नहीं की गई।
ट्रायल की समय-सीमा पर अपीलकर्ता ने बताया कि ईडी ने 15 फरवरी 2025 को पहली अभियोजन शिकायत (चार्जशीट) दायर करते हुए स्पष्ट कहा था कि अपीलकर्ता के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है। इसके बाद 11 जुलाई 2025 को पहली और 1 जुलाई 2026 को दूसरी सप्लीमेंट्री शिकायत दाखिल की गई। तीनों शिकायतों को मिलाकर कुल 97 आरोपी, 48 अभियोजन गवाह और लगभग 15,000 पन्नों के दस्तावेज शामिल हैं, जबकि अन्य आरोपियों के खिलाफ जांच अभी भी लंबित है। अपीलकर्ता ने अदालत को बताया कि अधिकतम सात वर्ष की सजा वाले इस अपराध में वह पहले ही 20 महीने से अधिक समय हिरासत में बिता चुका है, इसलिए निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होना असंभव है। अपनी दलीलों के समर्थन में अपीलकर्ता ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब, अरविंद धाम बनाम प्रवर्तन निदेशालय, बासुदेब बागची एवं अन्य बनाम प्रवर्तन निदेशालय, अरविंद वालिया बनाम प्रवर्तन निदेशालय और पदम चंद जैन बनाम प्रवर्तन निदेशालय के फैसलों का हवाला दिया।
दूसरी तरफ, प्रवर्तन निदेशालय ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी को 24 घंटे के भीतर विशेष अदालत में पेश किया गया था और धारा 19(2) के कथित उल्लंघन की दलील पूरी तरह निराधार है। एजेंसी का कहना था कि गिरफ्तारी के बाद की प्रक्रियात्मक औपचारिकता को रिमांड से पहले की अनिवार्य मंजूरी जैसी शर्त नहीं बनाया जा सकता। पांच दिनों की यह देरी अपने आप में गिरफ्तारी को अमान्य नहीं करती क्योंकि कानून में देरी पर गिरफ्तारी रद्द होने का कोई प्रावधान नहीं है।
ईडी ने आगे तर्क दिया कि गिरफ्तारी के आधार और विश्वास के कारणों में समानता होने से आरोपी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है, क्योंकि मुख्य सुरक्षा उपाय पूरे किए गए थे। एजेंसी ने इस बात पर जोर दिया कि यह 6,210.72 करोड़ रुपये से अधिक की अपराध आय से जुड़ा एक अत्यंत गंभीर आर्थिक अपराध है और अपीलकर्ता 444 से अधिक मामलों में शामिल रहा है।
अदालत का विश्लेषण
जमानत मामलों में अधिकारों के संतुलन पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:
“जमानत के मामले में, विशेष रूप से गंभीर अपराधों में, अदालत का काम राज्य के अधिकारों और गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकारों के बीच संतुलन साधना है। पीएमएलए, 2002 जैसे विशेष कानूनों में जमानत देने की शर्तें बहुत कठोर हैं और जिन परिस्थितियों में जमानत दी जा सकती है वे दुर्लभ हैं, इसका सीधा कारण यह है कि बड़े पैमाने के आर्थिक अपराध देश के वित्तीय ढांचे में गहरा आघात करते हैं, जिससे पूरे तंत्र में ऊपर से नीचे तक असर पड़ता है और जिसका खामियाजा अधिकांश आबादी को भुगतना पड़ता है। यही पीएमएलए के प्रावधानों को सख्त बनाने का औचित्य है। इसी सांस में, इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि संस्थाओं का यह कर्तव्य है कि वे मामलों की त्वरित जांच करें, अन्यथा किसी आरोपी व्यक्ति को अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने का औचित्य समाप्त हो जाता है। प्रक्रिया को अपने आप में एक सजा में तब्दील नहीं किया जाना चाहिए।”
गिरफ्तारी की प्रक्रियात्मक वैधता पर विचार करते हुए अदालत ने अपीलकर्ता की यह दलील खारिज कर दी कि सामग्री भेजने में पांच दिन की देरी से गिरफ्तारी अवैध हो गई। पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून में “तत्काल” शब्द का अर्थ कोई निश्चित 24 घंटे की समय-सीमा नहीं है:
“‘तत्काल’ शब्द का अर्थ 24 घंटे के भीतर या किसी तय समय सीमा के भीतर नहीं है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि सामग्री को शीघ्रतापूर्वक और एक साथ प्रेषित किया जाना चाहिए। जब मामले के रिकॉर्ड हजारों पन्नों में हों, तो गिरफ्तारी अधिकारी द्वारा उन्हें आगे भेजने में कुछ समय लगना स्वाभाविक है। पुनः, इस समय को कड़ाई से परिभाषित नहीं किया जा सकता, लेकिन जब तक सामग्री को भेजना गिरफ्तारी के समकालिक है और इसमें केवल वही देरी है जो बिल्कुल अनिवार्य थी, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि यह अधिनियम की धारा 19(2) का उल्लंघन करता है। व्यावहारिकताओं को व्यर्थ नहीं किया जाना चाहिए।”
इसके बाद हिरासत की अवधि और ट्रायल के समय पर विचार करते हुए अदालत ने अपीलकर्ता के इस तर्क को स्वीकार किया कि मुकदमे का दायरा इतना बड़ा है कि इसे जल्द पूरा नहीं किया जा सकता। अपीलकर्ता सात साल की अधिकतम सजा में से 20 महीने से अधिक समय जेल में काट चुका है और उसके खिलाफ जांच पहले ही पूरी हो चुकी है।
संवैधानिक प्रावधानों पर जोर देते हुए अदालत ने कहा:
“पीएमएलए की धारा 45 के तहत निर्धारित दोहरी शर्तें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए संवैधानिक सुरक्षा उपायों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती हैं, जैसा कि मनीष सिसोदिया बनाम प्रवर्तन निदेशालय के मामले में माना गया है। यदि लंबे समय तक कारावास को जारी रखने दिया गया, तो यह अभियुक्त व्यक्तियों को प्राप्त संवैधानिक सुरक्षा उपायों को पूरी तरह समाप्त कर देगा।”
अदालत का निर्णय और जमानत की शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट को हजारों पन्नों के दस्तावेजों की पड़ताल करनी होगी और लगभग 98 गवाहों के बयान दर्ज करने होंगे, जिससे ट्रायल के निष्कर्ष पर पहुंचने में काफी लंबा समय लगेगा। अदालत ने माना कि जब तक ट्रायल लंबित है, तब तक अपीलकर्ता को लगातार जेल की कठोर परिस्थितियों में नहीं रखा जा सकता।
इन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार बेल बॉन्ड और शर्तों पर नियमित जमानत पर रिहा किया जाए।
अदालत ने यह शर्त भी लगाई कि अपीलकर्ता अपना पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा करेगा और ट्रायल कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना देश छोड़कर नहीं जाएगा। साथ ही, वह गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ का प्रयास नहीं करेगा। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो ट्रायल कोर्ट जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियों को मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम निष्कर्ष न माना जाए।
मामले का शीर्षक: संजय सुरेखा उर्फ संजय कुमार सुरेखा बनाम प्रवर्तन निदेशालय
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4904 वर्ष 2026
पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026

