सीपीसी के गलत प्रावधान का हवाला देना डिक्री के निष्पादन पर तीसरे पक्ष की आपत्ति खारिज करने का आधार नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के किसी गलत कानूनी प्रावधान का उल्लेख करना, डिक्री के निष्पादन (एग्जीक्यूशन) में किसी तीसरे पक्ष द्वारा दर्ज कराई गई आपत्ति याचिका को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने तेलंगाना हाईकोर्ट और एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें संपत्ति का कब्जा सौंपने का विरोध करने वाले एक तीसरे पक्ष की आपत्ति याचिका खारिज कर दी गई थी। शीर्ष अदालत ने माना कि निचली अदालतों के निष्कर्ष स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं। इसके साथ ही अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए मामले को हैदराबाद के VII सीनियर सिविल जज, सिटी सिविल कोर्ट को वापस भेज दिया और पक्षों को नए सिरे से दलीलें रखने, साक्ष्य प्रस्तुत करने तथा अदालत को पूरी जांच कर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मूल रूप से वर्ष 2012 में शुरू हुआ, जब मोहम्मद सलीम उर्फ मोहम्मद वाजिद अली (प्रतिवादी संख्या 1 / डिक्री धारक) ने हैदराबाद के VII सीनियर सिविल जज, सिटी सिविल कोर्ट में ओ.एस. संख्या 2204/2012 के तहत एक दीवानी वाद दायर किया। यह वाद 23 फरवरी 2001 के एक विक्रय समझौते (एग्रीमेंट ऑफ सेल) के विशिष्ट अनुपालन (स्पेसिफिक परफॉरमेंस) के लिए था। यह समझौता प्रतिवादी संख्या 2 के पिता अली अहमद द्वारा रिकाबगंज, पाथरगट्टी, हैदराबाद में स्थित 375 वर्ग गज भूमि व दुकानों (मुलगियों) के संबंध में 8,00,000 रुपये के नकद प्रतिफल पर निष्पादित किया जाना बताया गया था। प्रतिवादी संख्या 2 अदालत में पेश नहीं हुए और एकतरफा (एक्स-पार्टी) रहे। अदालत ने 18 मार्च 2015 को वाद को एकतरफा डिक्री कर दिया और सेल डीड निष्पादित कर पंजीकृत कराने तथा संपत्ति का भौतिक कब्जा सौंपने का आदेश दिया।

इसके बाद, 5 जनवरी 2016 को डिक्री धारक ने भौतिक कब्जा प्राप्त करने के लिए ई.पी. संख्या 4/2016 (एग्जीक्यूशन पिटीशन) दाखिल की। इस डिक्री के निष्पादन का विरोध करते हुए अलादीन चैरिटीज़ एंड ज़कात वक्फ ने अपने प्रबंध ट्रस्टी के माध्यम से एक अजनबी या तीसरे पक्ष के आपत्तिकर्ता के रूप में ई.ए. संख्या 94/2016 दाखिल कर कब्जा सौंपने का विरोध किया। अपीलकर्ता ट्रस्ट का दावा था कि इस संपत्ति पर उसका मालिकाना हक और कब्जा हैदराबाद के तत्कालीन निज़ाम द्वारा जारी ‘फरमान मुबारक’ से चला आ रहा है। इस फरमान के तहत पाथरगट्टी स्थित भूमि खान बहादुर अहमद अलादीन नवाब अहमद नवाज जंग बहादुर को धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए वक्फ स्थापित करने हेतु दी गई थी। इसके बाद 6 जून 1949 के मुंतखब में इसका उल्लेख ‘मक्का मदीना बिल्डिंग’ के रूप में हुआ, 23 सितंबर 1976 को लगभग 3,151.51 वर्ग गज क्षेत्र के लिए ट्रस्ट डीड निष्पादित की गई और वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत 20 नवंबर 2003 को आंध्र प्रदेश राजपत्र (गजट) अधिसूचना जारी की गई।

एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने 29 जनवरी 2019 को तीसरे पक्ष की आपत्ति याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता संपत्ति के विशिष्ट शेड्यूल का मालिकाना हक साबित करने में विफल रहा क्योंकि नगरपालिका संख्या 21-1-1098/9 से 11 का गजट अधिसूचना में स्पष्ट उल्लेख नहीं था। इसके अलावा, अदालत ने माना कि सीपीसी के आदेश XXI नियम 58 के तहत दायर याचिका पोषणीय (मेंटेनेबल) नहीं है, क्योंकि निष्पादन याचिका संपत्ति की कुर्की (अटैचमेंट) के लिए नहीं बल्कि कब्जा सौंपने के लिए दायर की गई थी।

अपीलकर्ता ने इस फैसले को तेलंगाना हाईकोर्ट में सीसीसीए संख्या 94/2019 के माध्यम से चुनौती दी। हाईकोर्ट ने भी अपील खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने माना कि अधिकृत दस्तावेज के अभाव में प्रबंध ट्रस्टी के पास याचिका दायर करने का अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं था, फरमान या नक्शा रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया गया, अपीलकर्ता ने 1943 के मूल सेल डीड को चुनौती नहीं दी थी, और याचिका सीपीसी के आदेश XXI नियम 58 के बजाय नियम 97 के तहत दाखिल की जानी चाहिए थी।

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पक्षों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सी. आर्यमा सुंदरम ने शीर्ष अदालत के हालिया फैसले पेरियम्मल (मृतक) विधिक प्रतिनिधियों के माध्यम से एवं अन्य बनाम वी. राजामणि व अन्य (2025) 9 एससीसी 568 पर भरोसा जताया। उन्होंने दलील दी कि किसी गलत कानूनी प्रावधान का उल्लेख करना किसी तीसरे पक्ष की आपत्ति याचिका को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। उन्होंने रेखांकित किया कि सीपीसी के आदेश XXI के नियम 97 से 101 के तहत एग्जीक्यूटिंग कोर्ट किसी संपत्ति में अधिकार, हक या हित से जुड़े सभी सवालों की विस्तृत जांच करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी कहा कि इस मामले में निर्णायक पहलू पुराने और समकालीन राजस्व या नगरपालिका रिकॉर्ड के आधार पर संपत्ति की वास्तविक पहचान तय करना था। उन्होंने तर्क दिया कि डिक्री धारक के दस्तावेज अस्पष्ट थे, 1943 के सेल डीड की सीमाएं डिक्री के शेड्यूल से भिन्न थीं, और साबित करने का पूरा भार अनुचित रूप से तीसरे पक्ष पर डाल दिया गया।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 1 (डिक्री धारक) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री बसव प्रभु एस पाटिल ने शुरुआत में निचली अदालतों के आदेशों को सही ठहराते हुए कहा कि डिक्री धारक केवल समझौते और डिक्री में शामिल संपत्ति का कब्जा ले रहा है। हालांकि, जब पीठ ने सवाल किया कि क्या 1943 के सेल डीड, विक्रय समझौते और अदालत द्वारा निष्पादित सेल डीड के शेड्यूल का दस्तावेजी मिलान स्थापित किया गया है, तो वरिष्ठ अधिवक्ता ने निष्पक्षता से स्वीकार किया कि डिक्री धारक इस धारणा में था कि साबित करने का भार तीसरे पक्ष पर है। उन्होंने सहमति जताई कि मामले को एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को वापस भेजा जाए ताकि दोनों पक्षों को अतिरिक्त दलीलें और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिल सके।

कानूनी सिद्धांत और अदालत का विश्लेषण

निष्पादन कार्यवाही में तीसरे पक्ष द्वारा किए जाने वाले प्रतिरोध के दायरे को स्पष्ट करते हुए, पीठ ने पेरियम्मल (मृतक) मामले में दोहराए गए कानूनी सिद्धांतों का उल्लेख किया:

“सीपीसी का आदेश XXI नियम 35 एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को डिक्री से बंधे किसी भी व्यक्ति को, जो संपत्ति खाली करने से इनकार करता है, हटाने का अधिकार क्षेत्र प्रदान करता है। आदेश XXI के नियम 97 से 101 उन स्थितियों से निपटते हैं जहां निष्पादन में ‘किसी भी व्यक्ति’ द्वारा बाधा या प्रतिरोध उत्पन्न किया जाता है, जिसमें डिक्री के लिए अजनबी व्यक्ति भी शामिल है जो इससे बंधा नहीं है या जो संपत्ति में स्वतंत्र अधिकार, हक या हित का दावा करता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने कब्जा सौंपने से पहले और बाद के कानूनी उपायों के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा:

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“आदेश XXI नियम 97 कब्जे की डिक्री निष्पादित होने से पहले लागू होता है, जिससे अदालत डिक्री धारक को कब्जा सौंपने से पहले बाधा डालने वाले की शिकायत का समाधान कर सके। नियम 99 बाद में लागू होता है, जब संपत्ति में अधिकार का दावा करने वाले किसी अजनबी को बेदखल कर दिया जाता है और वह बहाली की मांग करता है।”

“यदि डिक्री के लिए अजनबी व्यक्ति निष्पादन का विरोध करता है, तो डिक्री धारक का एकमात्र उपाय सीपीसी के आदेश XXI नियम 97 के तहत है। डिक्री धारक ऐसी बाधा को दरकिनार करके आदेश XXI नियम 35 के तहत कब्जे के वारंट को दोबारा जारी करने पर जोर नहीं दे सकता।”

“सीपीसी के आदेश XXI नियम 97 के तहत आवेदन पर निर्णय करने वाली अदालतों को नियम 101 के अनुसार कार्य करना चाहिए और पार्टियों के बीच संपत्ति में अधिकार, हक या हित से संबंधित सभी प्रश्नों की पूर्ण जांच करनी चाहिए।”

इन तय सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“उपरोक्त के आलोक में, हम आश्वस्त हैं कि विवादित निर्णयों में दर्ज कुछ निष्कर्ष कानून के सुस्थापित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं।”

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील को स्वीकार करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट और एग्जीक्यूटिंग कोर्ट दोनों के आदेशों को निरस्त कर दिया। मामले को हैदराबाद के VII सीनियर सिविल जज, सिटी सिविल कोर्ट को विशिष्ट निर्देशों के साथ वापस भेजा गया:

“एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को दोनों पक्षों की ओर से अतिरिक्त या नए अभिवचन प्रस्तुत करने की अनुमति देने, ऊपर संदर्भित निर्णय के आलोक में नई जांच करने और मामले का नए सिरे से निपटारा करने का निर्देश दिया जाता है।”

शीर्ष अदालत ने मुकदमे के खर्च को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया और सभी लंबित अर्जियों का निस्तारण कर दिया।

मामले का शीर्षक: अलादीन चैरिटीज़ एंड ज़कात वक्फ बनाम मोहम्मद सलीम उर्फ मोहम्मद वाजिद अली एवं अन्य

वाद संख्या:एस.एल.पी. (सिविल) संख्या 23573/2025 

पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी, जस्टिस एन. वी. अंजारिया 

निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026

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