इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) से जुड़े मामलों में यदि किसी व्यक्ति पर किसी की पत्नी के साथ व्यभिचार (एडल्ट्री) का विशिष्ट आरोप लगाया जाता है, तो उसके खिलाफ कोई भी प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज करने से पहले उसे अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना अनिवार्य है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बेटे को कुल 30,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की एकल पीठ ने 13 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया। अदालत ने नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों और प्राचीन हिंदू ग्रंथ ‘कात्यायन स्मृति’ का हवाला देते हुए पति की उन दलीलों को खारिज कर दिया, जिनमें उसने पत्नी पर व्यभिचार में रहने का आरोप लगाया था।
बिना पक्ष सुने फैसला न्यायसंगत नहीं: कात्यायन स्मृति का संदर्भ
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति को सुने बिना उसके विरुद्ध कोई प्रतिकूल आदेश देना न्यायिक सिद्धांतों के खिलाफ है। पीठ ने कात्यायन स्मृति के शास्त्रीय सिद्धांत का संदर्भ देते हुए कहा कि जो कोई भी दूसरे पक्ष की बात सुने बिना फैसला करता है, भले ही उसने सही बात कही हो, फिर भी उसने सही काम नहीं किया होगा। कात्यायन स्मृति के अनुसार, पहले पक्ष के अपना पक्ष रखने के बाद विरोधी पक्ष की बात सुनना अनिवार्य होता है।
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता पति ने अपनी पत्नी के साथ संबंध होने का दावा करते हुए एक व्यक्ति का नाम तो विशेष रूप से लिया, लेकिन उस कथित सह-व्यभिचारी को अदालत के समक्ष लाने या उसे नोटिस जारी कराने का कोई कानूनी प्रयास नहीं किया। ऐसी स्थिति में पति की इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसकी पत्नी व्यभिचार में रह रही है।
तीसरे पक्ष के सम्मान और सामाजिक गरिमा की रक्षा जरूरी
अदालत ने कहा कि किसी चिन्हित व्यक्ति पर व्यभिचार का आरोप लगाना कोई सामान्य या महत्वहीन न्यायिक टिप्पणी नहीं है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी विशिष्ट व्यक्ति के संबंध में निकाला गया ऐसा न्यायिक निष्कर्ष केवल भरण-पोषण के विवाद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उस व्यक्ति के चरित्र, प्रतिष्ठा और गरिमा को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
इस संदर्भ में जस्टिस शुक्ला ने ‘हिंदू विवाह नियमावली, 1956’ का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह नियमावली इस मूल सिद्धांत को स्वीकार करती है कि जब किसी पहचाने जा सकने वाले तीसरे पक्ष पर व्यभिचार का विशिष्ट आरोप लगाया जाता है, तो उस पर होने वाला न्यायिक निर्णय सीधे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज करने से पहले उसे अपना बचाव करने और आरोपों का खंडन करने का पूरा अवसर दिया जाना आवश्यक है।
फैमिली कोर्ट के भरण-पोषण आदेश को पति ने दी थी चुनौती
यह पूरा मामला पति-पत्नी के बीच भरण-पोषण विवाद से जुड़ा है। पत्नी ने अपने और अपने नाबालिग बेटे के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मार्च 2025 में फैमिली कोर्ट ने पति को आदेश दिया था कि वह अर्जी दाखिल करने की तारीख से पत्नी को 20,000 रुपये और बेटे को 10,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता दे।
पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि फैमिली कोर्ट ने उसकी आमदनी और वित्तीय स्थिति का सही मूल्यांकन नहीं किया और उसके तर्कों पर पर्याप्त विचार नहीं किया। उसने अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाते हुए कुछ तस्वीरें और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री भी प्रस्तुत की थी। पति का कहना था कि फैमिली कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत अनिवार्य प्रमाणपत्र न होने के आधार पर उसके इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को गलत तरीके से अस्वीकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने पति की इन सभी दलीलों को आधारहीन पाते हुए निचली अदालत के भरण-पोषण आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया।

