मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुंबई में अपनी मर्जी से रह रही एक वयस्क महिला को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने की पूरी छूट देते हुए उसे अदालत में पेश करने की मांग वाली रिट याचिका खारिज कर दी है। इसके साथ ही अदालत ने महिला को यह भी सलाह दी कि वह अपने माता-पिता से रिश्ते पूरी तरह न तोड़े और किसी भी तरह की परेशानी या जरूरत पड़ने पर उनसे बेझिझक संपर्क करे या घर वापस लौट आए।
जस्टिस जी. एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने 6 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब महिला बालिग है, उसने मुंबई में नौकरी हासिल कर ली है और वह किसी गैरकानूनी बंधक स्थिति में नहीं बल्कि अपनी इच्छा से वहां रह रही है, तो इस मामले को अदालत में आगे जारी रखने का कोई आधार नहीं बनता।
‘मुश्किल वक्त में माता-पिता से मदद लेने में न हिचकिचाएं’
पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि वह महिला को यह सलाह देना चाहेगी कि वह अपने माता-पिता से सारे रिश्ते पूरी तरह खत्म न करे। जब कभी वह खुद को किसी संकट या असहज स्थिति में पाए अथवा उसे अपने माता-पिता के सहारे की जरूरत हो, तो वह उनसे दोबारा संपर्क साधने या मायके लौटने में जरा भी संकोच न करे।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश हुई महिला, बताई अपनी स्थिति
अदालत उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उक्त महिला को कोर्ट के समक्ष पेश कराने की गुहार लगाई गई थी। सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश बार काउंसिल में पंजीकृत अधिवक्ता यह महिला वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुई। उसने अदालत को बताया कि वह किसी अवैध हिरासत में नहीं है, उसने मुंबई में नौकरी हासिल कर ली है और वह अपनी मर्जी से वहां रह रही है। इसके साथ ही उसने स्पष्ट किया कि वह बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर होने वाली याचिका में प्रतिवादी बनाए गए व्यक्ति के साथ नहीं, बल्कि अपनी एक सहेली के घर पर रह रही है।
मानसिक स्वास्थ्य और इलाज पर पिता-पुत्री के अपने तर्क
सुनवाई के दौरान महिला के पिता ने अदालत को बताया कि उनकी बेटी का सिजोफ्रेनिया का उपचार चल रहा था। उन्होंने आग्रह किया कि बेटी भले ही घर वापस न आना चाहे, लेकिन वह अपना डॉक्टरी इलाज नियमित रूप से जारी रखे। हाईकोर्ट ने पिता के इस रुख को बेटी की भलाई के प्रति उनकी स्वाभाविक और वास्तविक चिंता करार दिया।
इसके जवाब में महिला ने अदालत से कहा कि उसने एक मनोचिकित्सक से परामर्श लिया था, जिन्होंने बताया था कि वह सिजोफ्रेनिया से पीड़ित नहीं है, हालांकि औपचारिक मानसिक मूल्यांकन के लिए अदालती निर्देश की आवश्यकता होगी। उसने भरोसा दिलाया कि यदि किसी मूल्यांकन में इलाज जरूरी पाया जाता है, तो वह उपचार कराने के लिए तैयार है। उसने यह भी जोड़ा कि यदि उसे कभी अपने माता-पिता के पास लौटने की जरूरत महसूस होगी, तो वह इसका फैसला किसी दबाव के बिना खुद करेगी।
बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका की स्थिति
कार्यवाही के दौरान राज्य सरकार के वकील ने अदालत को बताया कि महिला ने अपनी जान, गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का कदम उठाया है। इस प्रस्तावित याचिका में एक वयस्क नागरिक के रूप में अपने निवास स्थान, शिक्षा, पेशा, संगठन, व्यक्तिगत संबंध और वैवाहिक भविष्य का स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार की घोषणा की मांग भी शामिल है।
जब बॉम्बे हाईकोर्ट के पोर्टल पर इस याचिका का कोई पंजीकरण रिकॉर्ड नहीं मिला, तो सरकारी वकील ने कुछ समय देने का अनुरोध किया। लगभग 30 मिनट बाद वकील ने पीठ को सूचित किया कि संबंधित वकील से बात हो गई है और याचिका उस समय तक दर्ज नहीं हुई थी, लेकिन उसी दिन औपचारिक रूप से दाखिल की जानी थी।
याचिका खारिज
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और महिला के स्वतंत्र फैसले की पुष्टि होने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और महिला को अपनी इच्छानुसार जिंदगी जीने की पूरी स्वतंत्रता प्रदान की।

