दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई विधवा बहू अपनी कमाई या दिवंगत पति की छोड़ी गई संपत्ति से अपना गुजारा नहीं कर सकती, तो उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी ससुर की होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण में रहने के लिए आवास उपलब्ध कराना भी शामिल है। ससुर केवल संपत्ति का मालिक होने के आधार पर विधवा बहू के रहने के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 12 अक्टूबर को एक विधवा महिला और उसकी दो बेटियों की अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। महिला ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे और उसकी बेटियों को ससुर के फ्लैट से बेदखल करने का निर्देश दिया गया था।
हाईकोर्ट ने ससुर के पक्ष में संपत्ति खाली कराने के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन स्पष्ट किया कि इसे तभी लागू किया जा सकेगा, जब वह अपनी विधवा बहू के लिए उसी इलाके या आसपास रहने की उचित व्यवस्था करेगा। इसके विकल्प के तौर पर ससुर को हर महीने 15,000 रुपये किराए के रूप में देने होंगे।
विधवा बहू के भरण-पोषण में रहने का अधिकार भी शामिल
हाईकोर्ट ने हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के प्रावधानों पर विचार करते हुए कहा कि कानून विधवा बहू को कुछ परिस्थितियों में अपने ससुर से भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार देता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विधवा महिला अपनी आय या पति की छोड़ी गई संपत्ति से जीवनयापन नहीं कर सकती, तो ससुर का दायित्व है कि वह उसके भरण-पोषण की व्यवस्था करे।
जस्टिस कृष्णा ने कहा कि भरण-पोषण का मतलब केवल आर्थिक सहायता देना नहीं है, बल्कि इसमें रहने के लिए आवास उपलब्ध कराना भी शामिल है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति की मृत्यु हो जाने से साझा घर में रहने का बहू का स्वतंत्र अधिकार अपने आप समाप्त नहीं हो जाता।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद एक फ्लैट को लेकर शुरू हुआ था, जिसे महिला के ससुर ने खरीदा था। शादी के बाद महिला इसी फ्लैट में रहने लगी थी। पति की मृत्यु के बाद भी वह अपनी दो बेटियों के साथ वहीं रह रही थी।
बाद में ससुर ने फ्लैट खाली कराने के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया।
ट्रायल कोर्ट ने ससुर के पक्ष में फैसला सुनाते हुए महिला और उसकी बेटियों को फ्लैट खाली करने का निर्देश दिया। इसके अलावा उन्हें हर महीने 10,000 रुपये हर्जाना देने का भी आदेश दिया गया।
इस फैसले से असहमत होकर महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की।
महिला की कोई स्वतंत्र आय या संपत्ति नहीं थी
मामले के तथ्यों और सबूतों की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि महिला की अपनी कोई कमाई या संपत्ति नहीं थी। ऐसा कोई सबूत भी नहीं था जिससे पता चलता कि उसके दिवंगत पति ने इतनी संपत्ति छोड़ी थी, जिससे उसका भरण-पोषण हो सके।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने माना कि महिला के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उसके ससुर पर आती है और इसमें रहने की व्यवस्था करना भी शामिल है।
हाईकोर्ट ने विवादित फ्लैट को महिला का साझा घर माना और कहा कि पति की मृत्यु के बावजूद वहां रहने का उसका अधिकार बना हुआ है।
संपत्ति का मालिकाना हक बहू के रहने के अधिकार को खत्म नहीं कर सकता
हाईकोर्ट ने कहा कि ससुर का संपत्ति पर मालिकाना हक होना महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल इसी आधार पर विधवा बहू के रहने के अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कोर्ट के अनुसार, एक तरफ संपत्ति के मालिक का अपना अधिकार है, तो दूसरी तरफ विधवा महिला का आवास का अधिकार भी कानून द्वारा संरक्षित है। ऐसे में दोनों अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने माना कि ससुर अपनी संपत्ति का कब्जा वापस प्राप्त कर सकता है, लेकिन उससे पहले विधवा बहू के रहने की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।
वैकल्पिक मकान दें या हर महीने 15,000 रुपये किराया चुकाएं
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि ससुर को विधवा बहू के लिए उसी इलाके या आसपास के क्षेत्र में रहने की ऐसी व्यवस्था करनी होगी, जो उसके पहले के आवास के स्तर के अनुरूप हो।
यदि ससुर वैकल्पिक आवास उपलब्ध नहीं कराता है, तो उसे महिला को हर महीने 15,000 रुपये किराए के रूप में देने होंगे, ताकि वह अपने लिए उचित मकान ले सके।
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा महिला और उसकी बेटियों पर लगाया गया 10,000 रुपये मासिक हर्जाना भी रद्द कर दिया।
इस तरह हाईकोर्ट ने महिला और उसकी बेटियों की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि ससुर फ्लैट का कब्जा वापस ले सकता है, लेकिन उससे पहले उसे विधवा बहू के आवास संबंधी अधिकार की सुरक्षा के लिए निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा।

