इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस विकास बुधवार की पीठ ने मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 (आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट) की धारा 37 के तहत दाखिल एक अपील को 831 दिनों के अत्यधिक विलंब के कारण खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने देरी माफी के लिए दी गई दलीलों को अविश्वसनीय मानते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी पक्षकार अदालती कार्यवाही की स्थिति और चरण की सुध लिए बिना गहरी नींद में नहीं सो सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही से जुड़ा था। अपीलकर्ता—जिन्होंने खुद को गौतमबुद्ध नगर जिले के परगना दनकौर स्थित औरंगपुर गांव का निवासी बताया—गांव में स्थित खसरा संख्या 954/1 (रकबा 1,092.50 वर्ग मीटर) और खसरा संख्या 514 (रकबा 3,479.8 वर्ग मीटर) के सह-खातेदार थे।
राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम की धारा 3ए और 3डी के तहत 2006 से 2012 के दौरान कई अधिसूचनाएं जारी की गईं। इसके बाद आर्बिट्रेटर / जिला मजिस्ट्रेट / कलेक्टर, गौतमबुद्ध नगर ने 16 मई 2016 को एक मध्यस्थता निर्णय (आर्बिट्रल अवॉर्ड) पारित किया।
इस निर्णय से असंतुष्ट होकर भूस्वामियों ने मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत जिला जज, गौतमबुद्ध नगर की अदालत में आपत्तियां दाखिल कीं, जिसे आर्बिट्रेशन केस संख्या 85/2023 (पूर्व में 2013) के रूप में दर्ज किया गया। जिला जज की अदालत ने 8 जनवरी 2024 को इन आपत्तियों को खारिज कर दिया।
निचली अदालत के इस फैसले को चुनौती देते हुए अपीलकर्ताओं ने 19 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में धारा 37 के तहत अपील पेश की। यह अपील 831 दिनों के भारी विलंब के साथ दाखिल की गई थी, जिसके साथ देरी माफी का आवेदन (आवेदन संख्या 2/2026) भी लगाया गया था।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील ने अदालत के समक्ष दलील दी कि अपील दाखिल करने में हुई देरी जानबूझकर नहीं की गई थी, बल्कि यह उनके नियंत्रण से परे और सद्भावनापूर्ण (बोनाफाइड) परिस्थितियों के कारण हुई। इसलिए न्याय के हित में इसे माफ कर मामले की सुनवाई मेरिट के आधार पर की जानी चाहिए। अपीलकर्ताओं ने शपथपत्र में कहा कि 8 जनवरी 2024 को आए आदेश के बाद उन्होंने इसी तरह के जुड़े मामलों के अन्य व्यथित लोगों के साथ मिलकर हाईकोर्ट के अधिवक्ता श्री मनोज कुमार को फाइल सौंप दी थी। कुछ समय बाद अधिवक्ता गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और अंततः उनका देहांत हो गया। अपीलकर्ताओं को उनके निधन की जानकारी नहीं थी और वे इसी भरोसे में रहे कि उनकी अपील हाईकोर्ट में लंबित है। जब उन्होंने पड़ताल की, तब पता चला कि अपील दाखिल ही नहीं हुई थी। इसके तुरंत बाद उन्होंने नए अधिवक्ता को नियुक्त किया और बिना किसी अतिरिक्त देरी के अपील दाखिल कर दी।
दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की ओर से पेश वकील श्री प्रांजल मेहरोत्रा ने इस अर्जी का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि देरी माफी के लिए दिए गए आधार पूरी तरह निराधार, संदर्भहीन और महज एक बहाना हैं, जो इतने लंबे विलंब को माफ करने का कोई वैध आधार पेश नहीं करते।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और अहम टिप्पणियां
मामले के पूरे घटनाक्रम और कानूनी प्रावधानों का अवलोकन करते हुए जस्टिस विकास बुधवार ने रेखांकित किया कि 16 मई 2016 के मध्यस्थता निर्णय को चुनौती देने वाली धारा 34 की आपत्ति ही 2023 में दाखिल की गई थी। अदालत ने धारा 34(3) और उसके परंतुक का हवाला देते हुए याद दिलाया कि निर्णय प्राप्त होने के तीन महीने के भीतर ही आपत्ति दर्ज की जा सकती है; यदि पर्याप्त कारण साबित हों तो अदालत 30 दिनों की अतिरिक्त छूट दे सकती है, लेकिन इसके बाद कतई नहीं।
हाईकोर्ट ने भीमाशंकर सहकारी शक्कर कारखाने नियमित बनाम वालचंद नगर इंडस्ट्रीज लिमिटेड (2023) मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया। इस फैसले में शीर्ष अदालत ने पॉपुलर कंस्ट्रक्शन कंपनी, असम अर्बन, और हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी के नज़ीरों को दोहराते हुए कहा था कि मध्यस्थता कानून एक विशेष कानून है और इसमें निर्धारित समय-सीमा अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के प्रावधान मध्यस्थता कानून की धारा 34(3) द्वारा निर्धारित सख्त सीमा को नहीं लांघ सकते, क्योंकि वहां तीन महीने और 30 दिन के बाद किसी भी विलंब को माफ करने पर पूर्ण प्रतिबंध है।
धारा 37 की अपील में हुए 831 दिनों के असाधारण विलंब पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:
“इसके अतिरिक्त, वर्तमान अपील 831 दिनों की अवधि बीत जाने के बाद दाखिल की गई है, और इसके लिए दिया गया कारण अदालत के भीतर विश्वास पैदा नहीं करता। विशेष रूप से तब, जब यह नहीं कहा जा सकता कि कोई वादी गहरी नींद में सो सकता है, जबकि उसे अपनी अदालती कार्यवाही की स्थिति और उसके चरण की लगातार जानकारी रखनी होती है।”
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा महाराष्ट्र सरकार बनाम मैसर्स बोर्स ब्रदर्स इंजीनियर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर्स प्राइवेट लिमिटेड (2021) में निर्धारित कानूनी मानकों का भी हवाला दिया:
“मध्यस्थता कानून और वाणिज्यिक कानून दोनों के तहत त्वरित निपटारे के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, धारा 37 के तहत दाखिल अपीलों में निर्धारित समय-सीमा के बाद की देरी को नियम के रूप में नहीं, बल्कि अपवाद के रूप में ही माफ किया जाना चाहिए। केवल उसी उचित मामले में जहां पक्षकार ने सद्भावनापूर्वक कार्य किया हो और लापरवाही न बरती हो, अदालत अपने विवेक से छोटी देरी को माफ कर सकती है। साथ ही अदालत को हमेशा सिक्के के दूसरे पहलू को भी ध्यान में रखना होगा कि विरोधी पक्ष ने न्याय और साम्यता के आधार पर वह लाभ प्राप्त कर लिया हो सकता है, जिसे पहला पक्ष अपनी निष्क्रियता, लापरवाही या ढिलाई के कारण खो चुका है।”
हाईकोर्ट ने बल देकर कहा कि प्रस्तुत किए गए आधार 831 दिनों के भारी-भरकम और अस्पष्ट विलंब को माफ करने के लिए नितांत अपर्याप्त हैं, विशेषकर तब जब ऐसे मामलों में प्रत्येक दिन की देरी का ठोस कारण स्पष्ट करना आवश्यक होता है।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि देरी को माफ करने का कोई ठोस या उचित आधार रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है। अदालत ने देरी माफी के आवेदन को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। फलस्वरूप, समय-सीमा के उल्लंघन के कारण दोषपूर्ण (डिफेक्टिव) धारा 37 अपील भी खारिज कर दी गई।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रामी (मृतक) एवं 4 अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य
वाद संख्या: अपील अंडर सेक्शन 37 ऑफ आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट 1996 डिफेक्टिव संख्या 147/2026
पीठ: जस्टिस विकास बुधवार
निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

