उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नियमित प्रोफेसरों के बजाय एडहॉक और संविदा पर तैनात एसोसिएट प्रोफेसरों द्वारा विभागों का संचालन किए जाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ ने चिकित्सा विभाग की कार्यप्रणाली पर असंतोष व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को एक अंतिम अवसर दिया है कि वह स्पष्ट करे कि मेडिकल कॉलेजों में नियमित प्रोफेसरों के खाली पदों, उनके अधियाचन और विज्ञापनों की वास्तविक स्थिति क्या है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि पूरे विवरण के साथ व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की कार्रवाई की जा सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 15 अप्रैल 2022 के शासनादेश के अनुपालन में जारी 3 जून 2025 के आदेश को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य का चिकित्सा विभाग बेहद असंतोषजनक ढंग से काम कर रहा है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि मेडिकल कॉलेजों में नियमित नियुक्तियां करने के बजाय विभाग एडहॉक कर्मचारियों की जगह दूसरे एडहॉक कर्मचारियों को ही तैनात करने में जुटा हुआ है।
इस व्यवस्थागत समस्या की पड़ताल के लिए हाईकोर्ट ने पिछली सुनवाई पर प्रतिवादी संख्या 3 से पांच प्रमुख बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी मांगी थी:
- उत्तर प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों के विभागाध्यक्षों (हेड ऑफ डिपार्टमेंट) का पूरा ब्योरा, जिन्हें प्रोफेसर न होने के कारण एसोसिएट प्रोफेसर या असिस्टेंट प्रोफेसर होने के बावजूद विभागाध्यक्ष बनाया गया है;
- प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसर पद पर खाली पड़ी कुल रिक्तियों की संख्या;
- प्रोफेसरों के इन खाली पदों को भरने के लिए भेजे गए अधियाचनों (रिक्विजिशन) का विवरण;
- अधियाचन भेजे जाने के बाद जारी विज्ञापनों का विवरण और उनकी मौजूदा स्थिति, साथ ही जहां अधियाचन भेजे जाने के बाद भी विज्ञापन जारी नहीं हुए, उनके स्पष्ट कारण; और
- क्या कार्यवाहक प्रधानाचार्यों (ऑफिशिएटिंग प्रिंसिपल्स) द्वारा संभाले जा रहे पदों को भरने के लिए कोई चयन विज्ञापन जारी किया गया है या नहीं।
पक्षों की दलीलें और वकीलों की मौजूदगी
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता श्रीनिवासन गांधी की ओर से अधिवक्ता अख्तर अली पेश हुए, जबकि राज्य सरकार के प्रतिवादियों का पक्ष स्टैंडिंग काउंसिल (सीएससी) ने रखा।
स्टैंडिंग काउंसिल ने कोर्ट को अवगत कराया कि उन्हें संबंधित विभाग से तथ्यात्मक निर्देश मिल चुके हैं और प्रतिवादी संख्या 3 का व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने के लिए कुछ समय की आवश्यकता है। इस पर कोर्ट के निर्देशानुसार स्टैंडिंग काउंसिल ने प्रदेश के 13 मेडिकल कॉलेजों और 2 सरकारी चिकित्सा संस्थानों के विभिन्न विभागों में विभागाध्यक्षों के कामकाज से संबंधित विवरण रिकॉर्ड पर रखा।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण
राज्य सरकार द्वारा पेश की गई सूची का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों की प्रशासनिक स्थिति पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:
“उक्त सूची को सरसरी तौर पर देखने से ही कोर्ट की अंतरात्मा स्तब्ध है, क्योंकि अधिकांश मेडिकल कॉलेजों में शायद ही कोई प्रोफेसर विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत है, और ज्यादातर मामलों में ये पद एसोसिएट प्रोफेसरों द्वारा संभाले जा रहे हैं।”
कोर्ट ने इस बात पर भी कड़ा ऐतराज जताया कि कई महत्वपूर्ण विभागों का संचालन संविदा पर रखे गए चिकित्सकों के भरोसे चल रहा है। चिकित्सा विभाग के रवैये की आलोचना करते हुए कोर्ट ने कहा:
“इससे कोर्ट को ऐसा प्रतीत होता है कि चिकित्सा विभाग बेहद सुस्त और लचर तरीके से काम कर रहा है। इसके अलावा, यदि मेडिकल कॉलेजों के महत्वपूर्ण विभागों की कमान एसोसिएट प्रोफेसरों के हाथ में है और वह भी संविदा के आधार पर, तो उनकी जवाबदेही और कार्यप्रणाली का अंदाजा उनकी नियुक्ति की प्रकृति से ही लगाया जा सकता है।”
दस्तावेजों की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने पाया कि कन्नौज, आजमगढ़, बांदा और बदायूं के मेडिकल कॉलेजों में 50 प्रतिशत से अधिक विभागाध्यक्ष पदों पर एसोसिएट प्रोफेसर ही तैनात हैं।
इसके अलावा, कोर्ट ने स्टेट मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज के हालात पर भी हैरानी जताई, जहां कार्डियोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, रेडियोडायग्नोस्टिक्स, साइकियाट्री, एंडोक्रिनोलॉजी, न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील सुपर-स्पेशियलिटी व क्लीनिकल विभागों का जिम्मा एसोसिएट प्रोफेसरों के पास है।
कोर्ट का निर्णय और निर्देश
हाईकोर्ट ने स्थिति को सुधारने के लिए राज्य सरकार को “अंतिम अवसर” देते हुए प्रतिवादी संख्या 3 को 2 नवंबर 2026 तक या उससे पहले अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस व्यक्तिगत हलफनामे में निम्नलिखित जानकारियां स्पष्ट रूप से दर्ज होनी चाहिए:
- उत्तर प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों में प्रोफेसर के कितने पद रिक्त हैं;
- इन रिक्तियों के सापेक्ष संबंधित भर्ती संस्थाओं को अधियाचन भेजा गया है या नहीं;
- भेजे गए अधियाचनों के आधार पर क्या भर्ती विज्ञापन जारी किए गए हैं; और
- यदि अधियाचन भेजे जाने के बावजूद विज्ञापन जारी नहीं किए गए, तो उसका ठोस और स्पष्ट कारण क्या है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो कोर्ट संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि जिन पदों के लिए अभी तक अधियाचन नहीं भेजा गया है, उन्हें तुरंत भेजा जाए और इसकी जानकारी हलफनामे में दी जाए। साथ ही, हलफनामे के साथ एक विस्तृत चार्ट संलग्न किया जाए, जिसमें प्रत्येक कॉलेज के उन विभागों का अलग से ब्योरा हो जहां एसोसिएट प्रोफेसर विभागाध्यक्ष हैं और जहां विभागाध्यक्ष संविदा के आधार पर कार्य कर रहे हैं।
मामले की अगली सुनवाई 3 नवंबर 2026 को दोपहर 2:00 बजे नियत की गई है। रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) को इस आदेश की प्रति तत्काल प्रतिवादी संख्या 3 को भेजने का निर्देश दिया गया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: श्रीनिवासन गांधी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य
वाद संख्या: रिट-ए संख्या 13035 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ नंदन
निर्णय की तिथि: 13 अक्टूबर 2026

