हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अभ्यावेदन पर निर्णय में अकारण देरी से प्रिवेंटिव डिटेंशन अवैध: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने हिरासत आदेश रद्द किया

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बंदी बनाए गए व्यक्ति (डिटेन्यू) के अभ्यावेदन (रिप्रजेंटेशन) पर निर्णय लेने में बिना किसी उचित कारण के देरी करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(5) के तहत मिले संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। जस्टिस रवि नाथ तिल्हारी और जस्टिस सुनीता गंधम की खंडपीठ ने इस आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) आदेश को रद्द करते हुए डिटेन्यू को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। पीठ ने माना कि यद्यपि प्रारंभिक हिरासत आदेश जारी किए जाने के समय वैध था, लेकिन सरकार द्वारा अभ्यावेदन के निस्तारण में चार महीने से अधिक की अकारण देरी ने आगे की हिरासत को अवैध बना दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला श्रीमती तालासीला शांति द्वारा दायर एक हेबियस कॉर्पस रिट याचिका से संबंधित है, जिसमें उन्होंने अपने पति तालासीला वेंकट नरसिम्हा राव की निवारक हिरासत को चुनौती दी थी। कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट, एस.पी.एस. नेल्लोर जिला ने 19 जनवरी 2026 को आंध्र प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ बूटलेगर्स, डकैत, ड्रग ऑफेंडर्स, गुंडा, अनैतिक व्यापार अपराधी और लैंड ग्रैबर्स अधिनियम, 1986 की धारा 3(1) और (2) के तहत हिरासत आदेश जारी किया था।

यह हिरासत आदेश जलादंकी पुलिस स्टेशन में दर्ज पांच लंबित आपराधिक मामलों पर आधारित था: क्राइम नंबर 52/2024, क्राइम नंबर 45/2025, क्राइम नंबर 73/2025, क्राइम नंबर 76/2025 और क्राइम नंबर 116/2025। इसके बाद एडवाइजरी बोर्ड की 17 फरवरी 2026 की रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार ने 11 मार्च 2026 को जी.ओ.आर.टी. नंबर 546 के जरिए 20 जनवरी 2026 से बारह महीने की अवधि के लिए हिरासत की पुष्टि कर दी।

इसके बाद, डिटेन्यू की ओर से 1 मार्च 2026 को प्रस्तुत किए गए अभ्यावेदन को राज्य सरकार ने 14 जुलाई 2026 को जी.ओ.आर.टी. नंबर 1384 के जरिए खारिज कर दिया। वहीं 28 जुलाई 2026 को दिए गए एक अन्य अभ्यावेदन को भी 15 सितंबर 2026 को जी.ओ.आर.टी. नंबर 1796 के तहत खारिज कर दिया गया। इन अस्वीकृति आदेशों को भी बाद में याचिका में संशोधन करके चुनौती दी गई।

दोनों पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील श्री एम.एम.एम. श्रीनिवास राव की ओर से पेश वकील श्री गुडापति वेंकटेश्वर राव ने तर्क दिया कि क्राइम नंबर 116/2025 में डिटेन्यू को 6 फरवरी 2026 को नियमित जमानत मिल गई थी। 11 मार्च 2026 को हिरासत की पुष्टि करते समय राज्य सरकार ने इस जमानत और उसकी शर्तों पर कोई विचार नहीं किया। इसके अलावा, डिटेन्यू ने 1 मार्च 2026 को ही अपना अभ्यावेदन दे दिया था, लेकिन जिला कलेक्टर ने चार महीने से अधिक समय बाद 7 जुलाई 2026 को सरकार को अपनी टिप्पणी भेजी, जिसके बाद 14 जुलाई 2026 को इसे खारिज किया गया। वकील ने कहा कि इस अकारण और अत्यधिक देरी के कारण डिटेन्यू की हिरासत अवैध हो गई।

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दूसरी ओर, राज्य सरकार के सहायक सरकारी वकील श्री आकुला वेंकट साई जगदीश ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि हिरासत आदेश पारित करते समय सक्षम प्राधिकारी को यह पूरी तरह से ज्ञात था कि डिटेन्यू न्यायिक हिरासत में है। प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट थे कि डिटेन्यू के जमानत पर रिहा होने और दोबारा सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों में लिप्त होने की आशंका है। उन्होंने स्वीकार किया कि 1 मार्च 2026 के अभ्यावेदन पर पुष्टि आदेश से पहले विचार नहीं किया गया था, लेकिन बाद में 14 जुलाई 2026 को इसे खारिज कर दिया गया। उन्होंने यह भी दलील दी कि देरी इसलिए हुई क्योंकि डिटेनिंग अथॉरिटी ने 7 जुलाई 2026 को देरी से अपनी टिप्पणी भेजी थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने सबसे पहले प्रारंभिक हिरासत आदेश की वैधता की जांच की। अदालत ने पाया कि हिरासत आदेश जारी करते समय प्राधिकारी को डिटेन्यू की न्यायिक हिरासत की जानकारी थी और उन्होंने जमानत मिलने तथा फिर से अपराध करने की आशंका पर अपनी संतुष्टि दर्ज की थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले यूनियन ऑफ इंडिया बनाम डिंपल हैप्पी धाकड़ (2019) का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि यदि प्राधिकारी ऐसी संतुष्टि दर्ज करते हैं, तो हिरासत में मौजूद व्यक्ति के खिलाफ भी प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश दिया जा सकता है। इसलिए मूल आदेश जारी होने के समय अवैध नहीं था।

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हालांकि, हाईकोर्ट ने इसके बाद की प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाईं। पीठ ने कहा कि पुष्टि करने वाले प्राधिकारी ने 6 फरवरी 2026 को मिली नियमित जमानत और उसकी शर्तों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन नहीं किया, न ही पुष्टि से पहले 1 मार्च 2026 के अभ्यावेदन पर विचार किया।

राज्य के इस तर्क को खारिज करते हुए कि डिटेन्यू ने पहले जमानत आदेश प्रस्तुत नहीं किया था, हाईकोर्ट ने कहा:

“वर्तमान मामले जैसे निवारक हिरासत के मामलों में, सामग्री पर विचार करके अपने आदेश को उचित ठहराने का भार हिरासत प्राधिकारी अथवा पुष्टि करने वाले प्राधिकारी पर होता है। यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनने का मामला है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त सबसे मूल्यवान मौलिक अधिकार है। यह डिटेन्यू का काम नहीं है, बल्कि प्रायोजक प्राधिकारी (स्पॉन्सरिंग अथॉरिटी) का दायित्व है कि वह हिरासत प्राधिकारी और पुष्टि प्राधिकारी के समक्ष संपूर्ण प्रासंगिक सामग्री प्रस्तुत करे।”

अभ्यावेदन के निपटारे में हुई देरी पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ दिया। रामा धोंडू बोराडे बनाम वी.के. सराफ (1989) के मामले का उल्लेख करते हुए पीठ ने दोहराया कि अभ्यावेदन पर विचार करने में अनुचित देरी और असंतोषजनक स्पष्टीकरण हिरासत को दूषित करता है।

इसके बाद, संविधान पीठ के निर्णय के.एम. अब्दुल्ला कुन्ही और बी.एल. अब्दुल खादर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1991) का उल्लेख करते हुए अदालत ने अनुच्छेद 22(5) के तहत सरकार के संवैधानिक दायित्व को रेखांकित किया:

“अभ्यावेदन व्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है, जो हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित अत्यंत संजोया हुआ अधिकार है। इसलिए अनुच्छेद 22 का खंड (5) सरकार पर यह कानूनी दायित्व डालता है कि वह अभ्यावेदन पर यथाशीघ्र विचार करे। यह एक संवैधानिक जनादेश है जो उस संबंधित प्राधिकारी को आदेश देता है, जिसके समक्ष डिटेन्यू अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत करता है, कि वह बिना किसी टालने योग्य देरी के और तात्कालिकता की भावना के साथ यथाशीघ्र इसका निस्तारण करे।”

“आवश्यकता यह है कि अभ्यावेदन पर विचार करने में कोई उदासीनता, ढिलाई या लापरवाह रवैया नहीं होना चाहिए। अभ्यावेदन के निस्तारण में कोई भी अकारण देरी संवैधानिक अनिवार्यता का उल्लंघन होगी और यह आगे की हिरासत को अस्वीकार्य और अवैध बना देगी।”

हाईकोर्ट ने रशीद कपाड़िया बनाम मेधा गाडगिल (2012) मामले का भी उल्लेख किया, जहां टिप्पणियां भेजने में 15 दिनों की अकारण देरी को हिरासत के लिए घातक माना गया था। इसके साथ ही अदालत ने अपने हालिया निर्णय चीमपर्थी शाहीन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2026) का हवाला देते हुए दोहराया कि अभ्यावेदन पर विचार में अकारण देरी से आगे की हिरासत गैरकानूनी हो जाती है।

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वर्तमान मामले के तथ्यों पर इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि 1 मार्च 2026 से 7 जुलाई 2026 के बीच की लंबी देरी के लिए सरकार की ओर से कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। अदालत ने कहा:

“यह स्पष्टीकरण कि देरी टिप्पणियों को देर से प्रस्तुत करने के कारण हुई, अपने आप में देरी को संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं करता, विशेषकर तब जब अभ्यावेदन डिटेन्यू की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित हो और उस पर यथाशीघ्र विचार किया जाना आवश्यक हो। देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण न होने की स्थिति में, डिटेन्यू की आगे की हिरासत को बरकरार नहीं रखा जा सकता।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए 19 जनवरी 2026 के प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश, 11 मार्च 2026 के सरकारी पुष्टि आदेश और उसके बाद अभ्यावेदन खारिज करने वाले 14 जुलाई 2026 तथा 15 सितंबर 2026 के आदेशों को रद्द कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि यदि डिटेन्यू तालासीला वेंकट नरसिम्हा राव किसी अन्य लंबित आपराधिक मामले में हिरासत में अपेक्षित न हों, तो उन्हें तत्काल रिहा कर दिया जाए।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती तालासीला शांति बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य

वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 10194 / 2026

पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिल्हरी और जस्टिस सुनीता गंधम

निर्णय की तिथि: 24 सितंबर 2026

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