आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी की खंडपीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की हैदराबाद पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक रेलवे अधिकारी के ट्रांसफर को निरस्त कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतें और न्यायाधिकरण केवल व्यक्तिगत असुविधा, पारिवारिक कठिनाइयों या गैर-वैधानिक कार्यकारी दिशानिर्देशों के आधार पर किसी कर्मचारी के ट्रांसफर आदेश में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। केंद्र सरकार की रिट याचिका को स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने दोहराया कि प्रशासनिक ट्रांसफर की न्यायिक समीक्षा केवल दो ही स्थितियों में संभव है—जब किसी वैधानिक प्रावधान (कानून) का उल्लंघन हुआ हो या फिर दुर्भावना (मैलफाइड) सिद्ध होती हो। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226(2) के तहत मामले की सुनवाई के अपने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र की पुष्टि की और कहा कि चूंकि अधिकारी का ट्रांसफर आंध्र प्रदेश स्थित गुंटकल से किया गया था और मूल आवेदन भी विजयवाडा सर्किट बेंच में दायर हुआ था, इसलिए वाद-कारण (कॉज ऑफ एक्शन) का अभिन्न हिस्सा आंध्र प्रदेश के भीतर ही उत्पन्न हुआ है।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रतिवादी कुंडा प्रदीप बाबू को दिसंबर 2015 में भारतीय रेलवे लेखा सेवा (आईआरएएस) में नियुक्त किया गया था। आंध्र प्रदेश के गुंटकल मंडल में पदस्थापना के दौरान, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने एक ट्रैप कार्रवाई में उन्हें अन्य रेलवे कर्मियों के साथ पकड़ा। यह मामला आरसी संख्या 2182024A0013/CBI/AC-III/New Delhi के तहत दर्ज किया गया था, जिसमें उन पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 61(2) (आपराधिक षड्यंत्र) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 8, 9, 10 और 12 के आरोप लगाए गए।
सीबीआई हिरासत 48 घंटे से अधिक होने के कारण बाबू को 5 जुलाई 2024 से निलंबित कर दिया गया। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अगस्त 2024 में उन्हें इस शर्त पर जमानत दी कि वे अपने कार्यालय और आधिकारिक रिकॉर्ड तक नहीं जाएंगे तथा जांच एजेंसी के समक्ष निर्धारित समय पर उपस्थिति दर्ज कराएंगे।
इसके बाद, समीक्षा समिति की सिफारिश पर रेलवे बोर्ड ने 26 अगस्त 2025 को उनका निलंबन रद्द कर दिया। निलंबन हटने के तीन दिन बाद, यानी 29 अगस्त 2025 को रेलवे बोर्ड ने प्रशासनिक आधार पर रिक्त पद के विरुद्ध उनका ट्रांसफर दक्षिण मध्य रेलवे (एससीआर) से पूर्वोत्तर रेलवे (एनईआर) में कर दिया। उन्हें 1 सितंबर 2025 को कार्यमुक्त (रिलीव) कर दिया गया।
बाबू ने इस ट्रांसफर आदेश को कैट की हैदराबाद पीठ (मूल आवेदन संख्या 933/2025) में चुनौती दी। ट्रिब्यूनल द्वारा अंतरिम राहत न दिए जाने पर वे तेलंगाना हाईकोर्ट पहुंचे, जिसने कैट को दो सप्ताह के भीतर अंतरिम अर्जी का निपटारा करने और तब तक उन्हें गुंटकल में बनाए रखने का निर्देश दिया। इसके बाद बाबू ने 17 अक्टूबर 2025 को प्रधान वित्तीय सलाहकार, एससीआर, सिकंदराबाद के कार्यालय में कार्यभार संभालते हुए किसी गैर-संवेदनशील पद पर नियुक्ति की मांग की।
28 जनवरी 2026 को कैट ने बाबू के आवेदन को स्वीकार करते हुए उनके ट्रांसफर आदेश को रद्द कर दिया और रेलवे को उन्हें सिकंदराबाद में ही बनाए रखने का निर्देश दिया। ट्रिब्यूनल ने स्वास्थ्य कारणों, अगस्त 2025 में बच्चे के जन्म और सीबीआई जांच में किसी छेड़छाड़ की शिकायत न होने का हवाला देते हुए माना कि पूर्वोत्तर रेलवे में ट्रांसफर से अधिकारी को गंभीर व्यक्तिगत व पारिवारिक कठिनाई होगी। इस निर्णय के खिलाफ केंद्र सरकार और रेलवे प्रशासन ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
पक्षों की दलीलें
केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चाल्ला धनंजय और केंद्र सरकार के वकील जुपुडी वी.के. यज्ञदत्त ने दलील दी कि ट्रांसफर सेवा की एक अंतर्निहित शर्त है। बाबू ग्रुप-ए संवर्ग के अधिकारी हैं और उनकी सेवा अखिल भारतीय स्तर पर स्थानांतरणीय है। सीबीआई जांच को प्रभावित होने से बचाने और गवाहों पर असर न पड़ने देने के उद्देश्य से यह ट्रांसफर प्रशासनिक आवश्यकता के तहत किया गया था।
केंद्र सरकार ने कहा कि कैट ने केवल पारिवारिक और चिकित्सीय आधार पर ट्रांसफर रद्द करके अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा लांघी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले श्री पुबी लोम्बी बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य (2024) का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्तिगत असुविधा किसी कर्मचारी को अदालत से राहत पाने का कानूनी अधिकार नहीं देती। एस.सी. सक्सेना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2006) का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि कर्मचारी का पहला कर्तव्य नई जगह पर कार्यभार संभालना है, जिसके बाद ही वह प्रशासनिक स्तर पर अपनी समस्याएं रख सकता है। क्षेत्राधिकार के मुद्दे पर सरकार ने कहा कि बाबू का मूल ट्रांसफर गुंटकल (आंध्र प्रदेश) से हुआ था और उन्होंने प्रारंभिक याचिका भी विजयवाडा सर्किट बेंच में ही दायर की थी।
दूसरी तरफ, प्रतिवादी के वकील टी. श्रीधर ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई। उन्होंने तर्क दिया कि कैट का अंतिम आदेश तेलंगाना के हैदराबाद में पारित हुआ था और केंद्र सरकार पहले बिना आपत्ति तेलंगाना हाईकोर्ट के समक्ष पेश हो चुकी थी। उन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल खजूर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1961), यूनियन ऑफ इंडिया बनाम अलापन बंद्योपाध्याय (2022) और बख्शीश अहमद बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2026) का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक समीक्षा का अधिकार केवल उसी हाईकोर्ट को है जिसके दायरे में ट्रिब्यूनल स्थित है।
गुण-दोष पर दलील देते हुए बाबू के वकील ने कहा कि यह ट्रांसफर रेलवे बोर्ड के उन परिपत्रों का उल्लंघन है जिनमें ग्रुप-ए अधिकारियों को सेलेक्शन ग्रेड मिलने से पहले उनके आवंटित जोन से बाहर न भेजने की बात कही गई है। साथ ही गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिजनों के प्रति सहानुभूति बरतने के दिशानिर्देशों की भी अनदेखी की गई है। उन्होंने समानता का तर्क देते हुए यह भी कहा कि इसी मामले के एक सह-आरोपी अधिकारी को ट्रिब्यूनल से राहत मिल चुकी है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
खंडपीठ ने दो मुख्य कानूनी प्रश्न तय किए: पहला, क्या आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट को अनुच्छेद 226 के तहत इस मामले की सुनवाई का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र है? दूसरा, क्या व्यक्तिगत कठिनाई के आधार पर कैट द्वारा ट्रांसफर आदेश रद्द करना कानूनन सही था?
क्षेत्राधिकार के बिंदु पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लेफ्टिनेंट कर्नल खजूर सिंह मामले की व्याख्या अब लागू नहीं होती, क्योंकि संविधान के 15वें संशोधन के जरिए अनुच्छेद 226 में खंड (1-ए) जोड़ा गया था, जिसे बाद में खंड (2) के रूप में पुनर्क्रमांकित किया गया। इस संशोधन ने स्पष्ट रूप से ‘वाद-कारण’ (कॉज ऑफ एक्शन) के सिद्धांत को समाहित किया है।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों जैसे नवीनचंद्र एन. मजीठिया बनाम महाराष्ट्र राज्य (2000), ऑयल एंड नेचुरल गैस कमीशन बनाम उत्पल कुमार बसु (1994), यूनियन ऑफ इंडिया बनाम अदानी एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (2002), कुसुम इंगोट्स एंड अलॉयज लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2004), नवल किशोर शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2014) और स्टेट ऑफ गोवा बनाम समिट ऑनलाइन ट्रेड सॉल्यूशंस (पी) लिमिटेड (2023) का विश्लेषण करते हुए पीठ ने दोहराया कि यदि वाद-कारण का एक छोटा सा हिस्सा भी किसी हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है, तो वहां रिट याचिका सुनवाई योग्य होती है। एल. चंद्र कुमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1997) और स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम योगेंद्र मोहन सेनगुप्ता (2024) में प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“आंध्र प्रदेश से जुड़े किसी मूल आवेदन (ओए) का फैसला भले ही हैदराबाद स्थित केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने किया हो, लेकिन ऐसे फैसले को आंध्र प्रदेश में चुनौती दी जा सकती है। ऐसे मामले के लिए हैदराबाद स्थित कैट, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में ही माना जाएगा। यही स्थिति तब भी लागू होगी जब वाद-कारण (कॉज ऑफ एक्शन) का कोई हिस्सा आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में उत्पन्न होता है।”
ट्रांसफर की वैधता पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि कैट ने केवल व्यक्तिगत और सहानुभूतिपूर्ण आधारों पर दखल दिया था, जो कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है:
“आक्षेपित आदेश को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि ट्रांसफर आदेश के कारण होने वाली असुविधा को ही मुख्य आधार बनाया गया है। कानूनी दृष्टि से, ऐसे आधार पर ट्रांसफर आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। प्रत्येक ट्रांसफर में कुछ न कुछ असुविधा होना स्वाभाविक है। यह भली-भांति स्थापित कानून है कि ट्रांसफर आदेश की न्यायिक समीक्षा केवल वैधानिक प्रावधान के उल्लंघन या दुर्भावना (दुर्भावनापूर्ण मंशा) के आधार पर ही संभव है।”
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एस.एल. अब्बास (1993) और श्री पुबी लोम्बी बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य (2024) में स्थापित नजीरों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि कार्यकारी ट्रांसफर नीतियां केवल दिशानिर्देश होती हैं, कोई बाध्यकारी कानून नहीं:
“ट्रांसफर से जुड़े दिशानिर्देशों को लागू करवाने का कोई कानूनी अधिकार तब तक नहीं बनता, जब तक कि वे दिशानिर्देश वैधानिक प्रकृति के न हों। असुविधा या कठिनाई के आधार पर, यह संबंधित कर्मचारी का दायित्व है कि वह सक्षम विभागीय अधिकारियों के समक्ष अपने मामले पर विचार के लिए आवेदन प्रस्तुत करे।”
एस.सी. सक्सेना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का हवाला देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि सरकारी कर्मचारी ट्रांसफर आदेश की अवहेलना कर सीधे अदालतों का रुख नहीं कर सकते।
कोर्ट का निर्णय
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की रिट याचिका स्वीकार करते हुए कैट के 28 जनवरी 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया।
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि ट्रांसफर की शुरुआत गुंटकल से हुई थी और मामले की शुरुआत भी विजयवाडा सर्किट बेंच के समक्ष हुई थी, इसलिए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई का पूर्ण अधिकार क्षेत्र है। गुण-दोष के आधार पर कोर्ट ने माना कि किसी वैधानिक उल्लंघन या दुर्भावना के अभाव में प्रशासनिक ट्रांसफर में हस्तक्षेप करके ट्रिब्यूनल ने अवैध कार्य किया है।
अदालत ने किसी भी पक्ष पर कोई वाद-व्यय नहीं लगाया और सभी लंबित याचिकाओं को समाप्त कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम कुंडा प्रदीप बाबू और अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 16397/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

