पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ पुलिस की एक वरिष्ठ महिला अधिकारी पर उत्पीड़न और धमकी देने का आरोप लगाते हुए अपनी जान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग करने वाली महिला वकील की याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव के खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं और उनके समर्थन में कोई ठोस आधार नहीं है।
जस्टिस विक्रम अग्रवाल ने 6 अक्टूबर को दिए आदेश में याचिका की भाषा पर भी कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि एक वकील से अपेक्षा की जाती है कि वह न्यायिक कार्यवाही के दौरान अनुशासन और मर्यादा बनाए रखे तथा किसी के खिलाफ आरोप लगाते समय शब्दों का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करे।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का अधिकार न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का माध्यम नहीं बन सकता।
याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा पर हाईकोर्ट की नाराजगी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि महिला वकील ने पुलिस अधिकारी और बार एसोसिएशन के पूर्व पदाधिकारी के खिलाफ आरोप लगाते समय ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया, जो कोर्ट में पेश किए जाने वाले दस्तावेजों की गरिमा के अनुरूप नहीं थी।
जस्टिस अग्रवाल ने कहा कि याचिकाकर्ता स्वयं नियमित रूप से वकालत करती हैं। ऐसे में उनसे अपेक्षा थी कि वह अपने आरोपों को अधिक सावधानी और जिम्मेदारी के साथ कोर्ट के सामने रखें।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी अधिकारी या प्राधिकरण के खिलाफ शिकायत करना अलग बात है, लेकिन शिकायत दर्ज कराते समय भाषा और आरोपों की मर्यादा का पालन करना भी जरूरी है।
कोर्ट ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव के खिलाफ लगाए गए आरोपों और उनके लिए इस्तेमाल की गई भाषा पर भी कड़ी आपत्ति जताई।
महिला वकील ने पुलिस अधिकारी पर लगाए थे गंभीर आरोप
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि चंडीगढ़ पुलिस की एक वरिष्ठ महिला अधिकारी जानबूझकर उन्हें परेशान कर रही हैं और उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं।
महिला वकील के अनुसार, वर्ष 2025 में उनके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई थीं। उनका आरोप था कि पुलिस अधिकारी इन मामलों का इस्तेमाल उन्हें धमकाने और ब्लैकमेल करने के लिए कर रही हैं।
याचिका में दावा किया गया कि संबंधित अधिकारी तथ्यों और परिस्थितियों की उचित जांच किए बिना उनके खिलाफ कार्रवाई कर रही हैं और उन्हें लगातार निशाना बना रही हैं।
महिला वकील ने यह भी बताया कि वह वर्ष 2023 से ब्लैकमेलिंग, जबरन वसूली, हत्या के प्रयास और सोशल मीडिया पर परेशान किए जाने जैसी घटनाओं को लेकर कई शिकायतें दे चुकी हैं।
उनका आरोप था कि इन शिकायतों पर कानूनी कार्रवाई करने के बजाय पुलिस अधिकारी ने उन्हें ही परेशान करना शुरू कर दिया। उन्होंने लंबित मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और उन्हें ब्लैकमेल करने का भी आरोप लगाया।
बार एसोसिएशन की सदस्यता से जुड़े विवाद का भी किया जिक्र
याचिका में हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की सदस्यता से जुड़े दस्तावेजों में कथित जालसाजी का मामला भी उठाया गया था।
महिला वकील ने दावा किया कि जिन लोगों पर उन्होंने दस्तावेजों में जालसाजी का आरोप लगाया था, उनके कहने पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने उनके खिलाफ कार्रवाई की।
उनके मुताबिक, संबंधित अधिकारी ने अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और उनके पेशेवर सहयोगियों को भी उनके खिलाफ कर दिया।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि इसी वजह से उन्हें हाईकोर्ट परिसर में प्रवेश करने से रोका गया, उनके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज हुईं और उनके एक सहयोगी को कथित रूप से अवैध हिरासत में रखकर पीटा गया।
मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के नाम पर कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग स्वीकार नहीं
मामले के तथ्यों और याचिका में लगाए गए आरोपों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं कर सकीं।
कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव के खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार और अप्रमाणित हैं।
जस्टिस अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का संवैधानिक अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी आड़ में किसी को भी कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने महिला वकील की याचिका को गुण-दोष के आधार पर पूरी तरह निराधार पाते हुए खारिज कर दिया। साथ ही दोहराया कि वकीलों को न्यायिक कार्यवाही के दौरान अनुशासन, संयम और मर्यादा बनाए रखनी चाहिए, विशेष रूप से तब जब वे किसी सरकारी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोप लगा रहे हों।

