हैदराबाद के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक निजी स्कूल के चेयरमैन को छात्र के पिता को 2.22 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। यह मामला शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले दाखिला रद्द कराने और स्कूल प्रबंधन द्वारा अग्रिम फीस लौटाने से इनकार करने से जुड़ा है। आयोग ने साफ कहा कि नया सत्र शुरू होने से पहले जमा कराई गई अग्रिम फीस को स्कूल अपने नियमों की आड़ लेकर दबा नहीं सकते।
आयोग ने स्कूल को आदेश दिया कि वह अभिभावक को पहली किस्त के रूप में जमा की गई 1.92 लाख रुपये की पूरी प्रवेश फीस वापस करे। इसके अलावा, अभिभावक को हुई परेशानी और असुविधा के लिए 25,000 रुपये का मुआवजा तथा कानूनी खर्च के मद में 5,000 रुपये चुकाने होंगे। यह संपूर्ण राशि शिकायतकर्ता को 45 दिनों के भीतर अदा करनी होगी।
यह निर्णय उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष वक्कंती नरसिम्हा राव, सदस्य पीवीटीआर जवाहर बाबू और सुमा वाला की पीठ ने 54 वर्षीय पिता द्वारा 29 सितंबर को दायर की गई शिकायत पर सुनाया। मामले में शिकायतकर्ता का पक्ष अधिवक्ता के मुरलीधर रेड्डी कात्रम ने रखा, जबकि स्कूल की ओर से अधिवक्ता एस मधुसूदन रेड्डी पेश हुए।
क्रिकेट अकादमी के कारण पिता ने बदला था स्कूल का फैसला
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता ने शैक्षणिक सत्र 2018-19 में अपने बेटे का दाखिला कक्षा 5 में कराने के लिए 4 अप्रैल 2018 को पहली किस्त के तौर पर 1.92 लाख रुपये जमा किए थे। हालांकि, बाद में पिता ने बच्चे का दाखिला किसी दूसरे स्कूल में कराने का निर्णय लिया, क्योंकि वह स्कूल उस क्रिकेट अकादमी के करीब था जहां बच्चा स्कूल के बाद कोचिंग लेता था।
शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही पिता ने स्कूल प्रबंधन से संपर्क कर पूरी स्थिति स्पष्ट की और जमा कराई गई राशि वापस मांगी। स्कूल प्रबंधन ने यह कहते हुए फीस लौटाने से मना कर दिया कि उनके नियमों के मुताबिक एक बार जमा की गई फीस किसी भी सूरत में वापस नहीं होती। इसके बाद व्यथित पिता ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
नियमों की आड़ में स्कूल नहीं रोक सकते फीस: आयोग
स्कूल प्रबंधन ने आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए किसी भी प्रकार की सेवा में कमी या अनुचित व्यापार व्यवहार से इनकार किया और शिकायत खारिज करने की मांग की। स्कूल का तर्क था कि अभिभावक ने प्रवेश नियमों पर सहमति जताई थी और एक अंडरटेकिंग (घोषणापत्र) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि जमा की गई फीस वापस नहीं होगी।
आयोग ने स्कूल के इस तर्क को खारिज कर दिया। पीठ ने रेखांकित किया कि खुद स्कूल ने यह स्वीकार किया है कि पहली किस्त अप्रैल 2018 में ली गई थी, जो कि शैक्षणिक सत्र शुरू होने से काफी पहले का समय था। आयोग ने अपनी टिप्पणी में कहा कि शिकायतकर्ता ने सत्र शुरू होने से बहुत पहले ही रकम वापस मांगी थी, लेकिन स्कूल नियमों का बहाना बनाकर भुगतान से बचना चाहता है और उसने फीस लौटाने से इनकार कर दिया।
आयोग ने यह निष्कर्ष निकाला कि शिकायतकर्ता राहत का पूरा हकदार है और स्कूल की ‘नो-रिफंड पॉलिसी’ उसे अग्रिम तौर पर ली गई फीस को रोके रखने का असीमित अधिकार नहीं देती।

