मद्रास हाईकोर्ट ने 10 वर्षीय स्कूली छात्रा को बंधक बनाने और उसका यौन उत्पीड़न करने के मामले में एक स्कूल कॉरेस्पॉन्डेंट की दोषसिद्धि और सात साल के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्कूल प्रबंधन के एक जिम्मेदार पद पर होने के नाते परिसर में बच्चों की हिफाजत करना उसकी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी थी, लेकिन उसने खुद एक मासूम बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया।
जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की एकल पीठ ने दोषी की अपील को खारिज करते हुए 9 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया। अदालत ने टिप्पणी की कि स्कूल प्रबंधन से जुड़े लोगों द्वारा किए जाने वाले ऐसे घिनौने अपराधों को कतई हल्के में नहीं लिया जा सकता। ऐसे कृत्यों से शैक्षणिक संस्थानों का सुरक्षित माहौल तार-तार होता है, बच्चों को जिंदगी भर का मानसिक आघात झेलना पड़ता है और अभिभावकों के मन में गहरा डर व चिंता बैठ जाती है।
तमिलनाडु में स्कूल कॉरेस्पॉन्डेंट निजी, सहायता प्राप्त या अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन का अधिकृत प्रतिनिधि, प्रबंधक या प्रशासनिक प्रमुख होता है।
उम्र के आधार पर राहत देने से हाईकोर्ट का साफ इनकार
दोषी ने अपनी बढ़ती उम्र की दुहाई देते हुए सजा में नरमी बरतने की गुहार लगाई थी। उसने दलील दी कि घटना के वक्त वह 61 वर्ष का था और अब अपील की सुनवाई के दौरान उसकी उम्र 68 वर्ष हो चुकी है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि उम्र किसी भी तरह से सजा कम करने का आधार नहीं बन सकती। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि 61 वर्ष का बुजुर्ग और स्कूल कॉरेस्पॉन्डेंट जैसा जिम्मेदार ओहदा संभालने के बावजूद आरोपी ने 10 साल की बच्ची का यौन उत्पीड़न करते समय तनिक भी संकोच नहीं किया।
2019 में हैंडराइटिंग क्लास के दौरान घटी थी वारदात
यह पूरा मामला साल 2019 का है। पीड़िता अपने स्कूल में सुलेख (हैंडराइटिंग) की कक्षा में शामिल होने गई थी। इसी दौरान स्कूल का कॉरेस्पॉन्डेंट बच्ची को बहला-फुसलाकर पास के एक कमरे में ले गया, जहां उसने बच्ची को बंधक बनाकर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया।
वारदात के बाद पीड़िता के पिता ने स्थानीय पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को गलत तरीके से बंधक बनाने और पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे बंधक बनाने के जुर्म में एक साल और पॉक्सो एक्ट के तहत सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
पीड़िता की गवाही पूरी तरह भरोसेमंद, मेडिकल साक्ष्यों ने भी की पुष्टि
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले पर मुहर लगाते हुए कहा कि पीड़िता की गवाही अत्यंत स्पष्ट, सुसंगत और पूरी तरह विश्वसनीय है। कानून के मुताबिक, जब पीड़िता का बयान अदालत में पूर्ण विश्वास जगाता है, तो दोषसिद्धि के लिए किसी अतिरिक्त गवाह या साक्ष्य की पुष्टि अनिवार्य नहीं होती।
जस्टिस मुरुगन ने इस बात को भी रेखांकित किया कि निचली अदालत में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने तय तारीख पर पीड़िता और उसके पिता से जिरह करने से इनकार कर दिया था। इसके करीब सात महीने बाद दोनों से जिरह की गई, लेकिन इस लंबे अंतराल के बावजूद बच्ची और उसके पिता अपने बयानों पर पूरी मजबूती से टिके रहे और बचाव पक्ष उनसे कोई भी विपरीत बात नहीं निकलवा सका।
अदालत ने कहा कि गवाहों के बयानों में मामूली विसंगतियों से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं पड़ता, खासकर तब जब पीड़िता का मूल बयान शुरू से अंत तक अडिग रहा हो। साथ ही कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि डॉक्टर ने भी स्पष्ट किया था कि जिस तरह का यौन उत्पीड़न हुआ था, उसमें शरीर पर चोट के निशान मिलना न तो जरूरी था और न ही संभव।

