दिल्ली हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 328, 379 और 506 के तहत दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि दोनों पक्षों के बीच सुलह हो चुकी है और मुकदमे को जारी रखना निरर्थक होगा। जस्टिस मिनी पुष्करणा की पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 528—जो पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के समकक्ष है—के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए स्पष्ट किया कि जब विवाद पूरी तरह सुलझ चुका हो और इससे किसी व्यापक जनहित पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़ रहा हो, तो गैर-शमनीय (नॉन-कंपाउंडेबल) मामलों में भी आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पश्चिम विहार ईस्ट थाना, आउटर डिस्ट्रिक्ट, दिल्ली में 04 अप्रैल, 2021 को दर्ज एफआईआर संख्या 129/2021 से जुड़ा हुआ था। शुरुआत में यह प्राथमिकी भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 328 (जहर आदि देकर नुकसान पहुंचाना), 379 (चोरी) और 506 (आपराधिक धमकी) के साथ-साथ पोक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत दर्ज की गई थी।
जांच पूरी होने के बाद जांच अधिकारी ने 03 जून, 2021 को चार्जशीट दाखिल की, जिसमें एफआईआर में उल्लिखित अपराधों के लिए आरोप लगाए गए। हालांकि, तीस हजारी कोर्ट, दिल्ली के एडिशनल सेशंस जज-02 (पश्चिम जिला) ने 11 सितंबर, 2023 को एससी 349/2021 में औपचारिक आरोप तय करते समय केवल आईपीसी की धारा 328, 379 और 506 के तहत ही आरोप तय किए। इसके बाद, दोनों पक्षों के बीच विवाद सुलझ जाने के आधार पर एफआईआर और आगे की कार्यवाही को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।
पक्षों की दलीलें
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता और प्रतिवादी संख्या 2 दोनों अदालत में उपस्थित हुए, जिनकी पहचान संबंधित वकीलों और जांच अधिकारी ने की। अदालत को बताया गया कि दोनों पक्षों ने 10 सितंबर, 2026 को एक समझौता पत्र (एमओयू) निष्पादित किया है। इस समझौते के तहत प्रतिवादी संख्या 2 बिना किसी वित्तीय लेन-देन या मुआवजे के एफआईआर रद्द कराने में सहयोग देने पर सहमत हुआ है।
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि याचिकाकर्ता का अब विवाह हो चुका है और उसकी दो वर्ष की एक बेटी भी है। हाईकोर्ट से बातचीत के दौरान प्रतिवादी संख्या 2 ने कहा कि समझौते और याचिकाकर्ता के पारिवारिक जीवन को देखते हुए वह मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहता। दोनों पक्षों द्वारा निष्पादित शपथ पत्र भी रिकॉर्ड पर रखे गए। वहीं, राज्य की ओर से उपस्थित अतिरिक्त लोक अभियोजक ने समझौते के मद्देनजर कार्यवाही रद्द किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
अदालत का विश्लेषण और कानूनी नजीर
बीएनएसएस की धारा 528 के दायरे का विश्लेषण करते हुए जस्टिस मिनी पुष्करणा ने टिप्पणी की:
“यह सुस्थापित सिद्धांत है कि यदि संबंधित पक्षों के बीच समझौता हो चुका है और इस कार्यवाही को रद्द करने से किसी व्यापक जनहित पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है, तो हाईकोर्ट गैर-शमनीय अपराधों के मामलों में भी बीएनएसएस की धारा 528 (पूर्ववर्ती सीआरपीसी की धारा 482) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर सकता है। ऐसे मामलों में मुख्य मार्गदर्शक सिद्धांत न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करना और कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना होना चाहिए।”
इस विधिक सिद्धांत को पुष्ट करने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य व अन्य (2012) का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था:
“जहाँ हाईकोर्ट इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए आपराधिक कार्यवाही को रद्द करता है कि अपराधी और पीड़ित के बीच विवाद सुलझ गया है, भले ही अपराध गैर-शमनीय हों, वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि उसकी राय में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना निरर्थक होगा और मामले में न्याय की मांग है कि पक्षों के बीच विवाद समाप्त हो और शांति बहाल हो; न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करना ही अंतिम मार्गदर्शक सिद्धांत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपराध ऐसे कृत्य हैं जिनका जनता पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है और वे समाज की भलाई को गंभीर रूप से खतरे में डालते हैं, इसलिए केवल इसलिए अपराधी को छोड़ देना सुरक्षित नहीं है कि उसने और पीड़ित ने सौहार्दपूर्ण ढंग से विवाद सुलझा लिया है या पीड़ित को मुआवजा दे दिया गया है, फिर भी कानून में अदालत की अनुमति से या बिना अनुमति के कुछ अपराधों को शमनीय बनाया गया है। हत्या, बलात्कार, डकैती जैसे गंभीर अपराधों या आईपीसी के तहत मानसिक विकृति अथवा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम जैसे विशेष कानूनों के तहत नैतिक अधमता के अपराधों, या लोक सेवकों द्वारा उस हैसियत से किए गए अपराधों के संबंध में अपराधी और पीड़ित के बीच समझौते को कोई कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। हालांकि, ऐसे अपराध जो मुख्य रूप से दीवानी, वाणिज्यिक, वित्तीय, साझेदारी या वैवाहिक और पारिवारिक विवादों से उत्पन्न होते हैं, जहां गलत मुख्य रूप से पीड़ित के साथ हुआ है और दोनों ने अपने सभी विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिए हैं, भले ही वे गैर-शमनीय हों, हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों के तहत कार्यवाही को रद्द कर सकता है यदि वह संतुष्ट है कि ऐसे समझौते के बाद अपराधी को दोषी ठहराए जाने की कोई संभावना नहीं है और कार्यवाही रद्द न करने से न्याय पराजित होगा। यह सूची केवल उदाहरण स्वरूप है और प्रत्येक मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करेगा।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों पक्षों में हुए समझौते के बाद आपराधिक मुकदमा जारी रखना समय की बर्बादी होगी। इसके आधार पर अदालत ने थाना पश्चिम विहार ईस्ट में दर्ज एफआईआर संख्या 129/2021 और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया तथा लंबित आवेदन का भी निस्तारण कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: तन्वी राजपूत बनाम राज्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली एवं अन्य
वाद संख्या: सीआरएल.एम.सी. 6601/2026 एवं सीआरएल.एम.ए. 27592/2026
पीठ: जस्टिस मिनी पुष्करणा
निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

