परिवार के विरोध के चलते बने सहमति संबंधों के मामलों में प्रथम दृष्टया जमानत का आधार: दिल्ली हाईकोर्ट ने पॉक्सो मामले में दी राहत

दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस मिनी पुष्करणा ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 के तहत दर्ज एक मामले में 27 वर्षीय आरोपी को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने पाया कि नाबालिग पीड़िता ने उससे विवाह करने की इच्छा जताई थी और पारिवारिक विरोध के कारण यह आपराधिक मामला सामने आया। अदालत ने माना कि पीड़िता के जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के बयान और एक वर्ष से अधिक की हिरासत अवधि को देखते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 483 के तहत प्रथम दृष्टया नियमित जमानत देने का आधार बनता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उत्तर पूर्वी दिल्ली के ज्योति नगर थाने में 6 सितंबर 2025 को दर्ज प्राथमिकी संख्या 461/2025 से जुड़ा है। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) की धारा 137(2), 64(1), 351(2) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दर्ज की गई थी।

राज्य की ओर से पेश स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता ने आरोप लगाया था कि अप्रैल 2025 में इंस्टाग्राम के जरिए उसकी जान-पहचान आरोपी से हुई थी, जो उसी के पड़ोस में रहता था। उसने आरोप लगाया कि 17 जुलाई 2025 को आरोपी उसे जन्मदिन मनाने के बहाने अशोक नगर स्थित अपने दोस्त के घर ले गया और वहां उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। साथ ही घटना के बारे में किसी को बताने पर उसे और उसके भाई-बहनों को जान से मारने की धमकी दी। उसने आगे आरोप लगाया कि 18 अगस्त 2025 को आरोपी ने परिवार को सब कुछ बताने की धमकी देकर उसे लोनी स्थित एक ओयो होटल ले जाकर दोबारा जबरन संबंध बनाए और आपत्तिजनक वीडियो रिकॉर्ड किया।

जांच के दौरान दिलशाद गार्डन स्थित गुरु तेग बहादुर अस्पताल में पीड़िता की मेडिकल जांच कराई गई, जहां उसकी मां ने आंतरिक चिकित्सीय परीक्षण कराने से इनकार कर दिया। स्कूल के दस्तावेजों से घटना के समय पीड़िता के नाबालिग होने की पुष्टि हुई। आरोपी के जब्त मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच में अश्लील तस्वीरें और वीडियो तो मिले, लेकिन उनमें पीड़िता कहीं नजर नहीं आई। इसके अलावा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (सीडीआर) से 22 अगस्त 2025 से 2 सितंबर 2025 तक दोनों के बीच लगातार बातचीत होने की पुष्टि हुई। पुलिस ने आरोपी को 8 सितंबर 2025 को गिरफ्तार किया था।

दोनों पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उसने पीड़िता के साथ कभी कोई शारीरिक या घनिष्ठ संबंध नहीं बनाए। चिकित्सीय जांच में पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं पाई गई। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि गिरफ्तारी के विशिष्ट आधार उसे उपलब्ध नहीं कराए गए थे।

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बचाव पक्ष ने सह-आरोपी के बयान का हवाला दिया, जिसमें उसने बताया था कि 17 जुलाई 2025 को आरोपी जब उसके घर आया था, तो उसने साथ आई लड़की को अपनी मंगेतर बताया था ताकि वे बातचीत कर सकें। इस संबंध में कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) नहीं कराई गई कि वह लड़की पीड़िता ही थी या नहीं। इसके अतिरिक्त, लोनी स्थित होटल के रजिस्टर की जांच से पता चला कि 20 अगस्त 2025 को आरोपी पीड़िता के बजाय 22 वर्ष की एक अन्य युवती के साथ वहां गया था।

जमानत याचिका का विरोध करते हुए राज्य के अतिरिक्त लोक अभियोजक और पीड़िता के वकील ने दलील दी कि गिरफ्तारी के विशिष्ट आधार दिए गए थे। उन्होंने कहा कि 27 वर्षीय आरोपी पर 16 वर्षीय नाबालिग के साथ कई बार अपराध करने के गंभीर आरोप हैं। पीड़िता के वकील ने जोर दिया कि पीड़िता बीएनएसएस की धारा 180 और 183 के बयानों में पूरी तरह अडिग रही है, होटल के रिकॉर्ड और आधार कार्ड से आरोपी की मौजूदगी साबित होती है और कड़कड़डूमा कोर्ट में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष मुकदमा अभी शुरुआती चरण में है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और पूर्व निर्णय

अदालत ने पाया कि 6 सितंबर 2025 की मेडिकल जांच रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2025 में आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बने थे, जिसमें गर्भनिरोधक का उपयोग किया गया था और किसी नशीले पदार्थ दिए जाने का कोई इतिहास नहीं था।

जस्टिस मिनी पुष्करणा ने गौर किया कि कॉल रिकॉर्ड दोनों के बीच नियमित संपर्क दर्शाते हैं और पीड़िता ने खुद माना कि आरोपी उसे ट्यूशन छोड़ने और लेने आता था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान जिरह में पीड़िता ने बयान दिया कि जब उसके माता-पिता को इस रिश्ते की जानकारी हुई, तो उसने आरोपी से शादी करने की इच्छा जाहिर की थी। हालांकि, उसके पिता और चाचा ने आरोपी के अतीत, बेरोजगारी और उम्र के अंतर के आधार पर इस रिश्ते का विरोध किया था।

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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम अनिरुद्ध व अन्य (2026) का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने माना था कि परिवारों द्वारा प्रेम संबंधों के विरोध में अक्सर पॉक्सो कानून का दुरुपयोग किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों के लिए ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज जोड़ने पर भी जोर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी:

“पॉक्सो अधिनियम आज के बच्चों और कल के कर्णधारों की सुरक्षा के लिए न्याय की सबसे गंभीर अभिव्यक्तियों में से एक है। फिर भी, जब इतने नेक और बुनियादी तौर पर अच्छे उद्देश्य वाले कानून का दुरुपयोग किया जाता है, गलत प्रयोग किया जाता है और बदला लेने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तो न्याय की अवधारणा ही उलट जाने के कगार पर पहुंच जाती है।”

हाईकोर्ट ने अपनी ही एक समन्वय पीठ के निर्णय रियाज बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) व अन्य (2024) का भी संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था:

“यह अदालत लगातार देख रही है कि लड़की के परिवार के कहने पर पॉक्सो के मामले दर्ज कराए जा रहे हैं, जो किसी लड़के के साथ उसकी दोस्ती और प्रेम संबंधों पर आपत्ति जताते हैं। ऐसे मामलों में कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है, जिसके कारण युवा लड़कियां जिनसे सच्चे मन से प्रेम करती हैं, वे युवा लड़के जेलों में सड़ रहे हैं।”

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता की मुख्य परीक्षा और जिरह पूरी हो चुकी है। आरोपी 8 सितंबर 2025 से एक वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद है, जेल आचरण संतोषजनक रहा है, उसका कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है और मुकदमे में अभी 21 गवाहों की गवाही बाकी है, जिसमें लंबा समय लग सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा:

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“तदनुसार, वर्तमान मामले के तथ्य और परिस्थितियां जमानत देने का प्रथम दृष्टया आधार प्रकट करते हैं। इसके अलावा, नॉमिनल रोल याचिकाकर्ता के आचरण को संतोषजनक दर्ज करता है। अदालत इस तथ्य को भी संज्ञान में लेती है कि याचिकाकर्ता का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट या ड्यूटी मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के अनुसार 20,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानत राशि प्रस्तुत करने पर आरोपी को रिहा किया जाए।

अदालत ने जमानत के साथ कई शर्तें भी लगाईं:

  • आरोपी जांच अधिकारी के निर्देशानुसार आगे की किसी भी जांच में सहयोग करेगा।
  • वह मामले के साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेगा और न ही किसी गवाह को प्रभावित या भयभीत करेगा।
  • वह पीड़िता या उसके परिजनों से किसी भी प्रकार का संपर्क नहीं साधेगा।
  • वह पीड़िता के निवास स्थान से 5 किलोमीटर के दायरे में नहीं रहेगा, अपने पते का प्रमाण जांच अधिकारी को सौंपेगा और उसके आसपास नहीं जाएगा।
  • वह अपना मोबाइल फोन हमेशा चालू रखेगा और हर महीने के पहले सोमवार को संबंधित थाने में हाजिरी देगा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत के निपटारे तक सीमित हैं और इनका मुकदमे के अंतिम गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रोहित बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली)
वाद संख्या: बेल एप्लिकेशन 1241/2026 एवं सीआरएल.एम.ए. 9714/2026, 17089/2026 एवं 30989-30990/2026
पीठ: जस्टिस मिनी पुष्करणा 

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