सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (पॉक्सो) एक्ट, 2012 की धारा 6 के तहत एक व्यक्ति को सुनाई गई 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा और दोषसिद्धि को रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे अपराध सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत के कठघरे में पीड़िता और प्रत्यक्षदर्शी गवाह द्वारा आरोपी की पहचान न कर पाना, एफआईआर दर्ज कराने में 10 दिनों की अकारण देरी, उसमें आवश्यक तथ्यों का न होना और सबसे अहम गवाह को साक्ष्य से दूर रखना अभियोजन के मामले को पूरी तरह अविश्वसनीय बना देता है।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन के अनुसार, 28 मई 2015 को मेघालय के ईस्ट जयंतिया हिल्स जिले में 40 प्रतिशत बौद्धिक अक्षमता से पीड़ित 11 वर्षीय बच्ची के साथ उसके घर में यौन उत्पीड़न किया गया था। घटना के समय पीड़िता की मां (पीडब्ल्यू-1) अपने भाई के बच्चे को छोड़ने बाहर गई थी और बच्ची घर पर अकेली थी। मां का दावा था कि घर से निकलते वक्त उसने पास के बगीचे में शहतूत के पत्ते तोड़ते हुए आरोपी को देखा था।
घटना के बाद पीड़िता अपनी चचेरी बहन (पीडब्ल्यू-2) के घर चली गई और रात वहीं रुकी। अगली सुबह पीडब्ल्यू-2 ने पीड़िता की मां को आपबीती बताई, लेकिन मां ने तुरंत कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि पूछने पर बच्ची ने बात की पुष्टि नहीं की थी। इसके बाद 7 जून 2015 को स्कूल में पीड़िता ने अपनी शिक्षिका को घटना की जानकारी दी, जिसके बाद शिक्षिका ने परिजनों को सूचित किया। आखिरकार घटना के 10 दिन बाद, 8 जून 2015 को पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई।
मामले की जांच के बाद विशेष अदालत (पॉक्सो), ईस्ट जयंतिया हिल्स ने 7 दिसंबर 2021 को आरोपी को दोषी करार देते हुए 10 वर्ष के सश्रम कारावास और 1 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। मेघालय हाईकोर्ट ने 29 मार्च 2022 को इस फैसले के खिलाफ दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया था, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गौरव अग्रवाल ने दलील दी कि निचली अदालतों ने साक्ष्यों के मूल्यांकन में भारी भूल की है। उन्होंने कहा कि एफआईआर दर्ज करने में हुई 10 दिनों की लंबी देरी का अभियोजन के पास कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं है। इसके अलावा, जिस स्कूल शिक्षिका की जानकारी पर पुलिस में शिकायत दी गई, उसे अदालत में गवाह के रूप में पेश ही नहीं किया गया।
वरिष्ठ वकील ने मुख्य रूप से पहचान के मुद्दे को रेखांकित करते हुए कहा कि पीड़िता (पीडब्ल्यू-4) और उसकी चचेरी बहन (पीडब्ल्यू-2) दोनों ही अदालत के कठघरे में आरोपी की पहचान करने में पूरी तरह विफल रहीं। दोनों गवाहों ने स्वीकार किया कि आरोपी का नाम उन्हें पीड़िता की मां ने बताया था। सबसे अहम बात यह रही कि पीड़िता ने जिरह के दौरान साफ तौर पर स्वीकार किया कि स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने उसे अदालत में बयान देने के लिए सिखाया-पढ़ाया था। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि आरोपी के साथ पारिवारिक संबंधों को लेकर मां और बेटी के बयानों में गंभीर विरोधाभास था, डॉक्टरों से जिरह का उचित अवसर नहीं दिया गया और आरोपी द्वारा चार गवाहों व दस्तावेजी साक्ष्यों के जरिए साबित किए गए अन्यत्र उपस्थिति (अलीबाई) के ठोस बचाव को निचली अदालतों ने अनुचित रूप से खारिज कर दिया।
दूसरी ओर, मेघालय राज्य की ओर से पेश महाधिवक्ता अमित कुमार ने दोषसिद्धि का बचाव किया। उन्होंने कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज कराए गए बयानों से मामले की पुष्टि होती है। महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि पीड़िता 40 प्रतिशत बौद्धिक अक्षमता से पीड़ित है और घटना के दो साल बाद 2017 में उसकी गवाही हुई थी, इसलिए इतने समय बाद अदालत में पहचान न कर पाना अस्वाभाविक नहीं है। उन्होंने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि मां ने घटना से ठीक पहले आरोपी को पास के बगीचे में देखा था, इसलिए विशेष परिस्थितियों को स्पष्ट करने का भार आरोपी पर था।
अदालत का विश्लेषण
साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कानून के मूलभूत सिद्धांत को रेखांकित किया:
“आपराधिक मामले में अभियोजन का यह दायित्व है कि वह ऐसा साक्ष्य पेश कर आरोपों को साबित करे जो संदेह से परे हो और जो आरोपी के अपराध को किसी भी प्रकार के संशय के बिना स्थापित करता हो।”
पीड़िता की मां (पीडब्ल्यू-1) के बयानों का विश्लेषण करते हुए पीठ ने उनके आचरण को अत्यधिक अस्वाभाविक पाया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी मां को यह पता चले कि उसकी बौद्धिक रूप से अक्षम बच्ची के साथ गलत कृत्य हुआ है, तो स्वाभाविक तौर पर उससे अपेक्षा की जाती है कि वह तुरंत बच्ची की शारीरिक स्थिति की जांच करे और चिकित्सीय या पुलिस सहायता ले। इसके अतिरिक्त, आरोपी को बगीचे में देखे जाने की थ्योरी एफआईआर में पूरी तरह गायब थी।
एफआईआर में महत्वपूर्ण तथ्यों के अभाव के प्रभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने अमर नाथ झा बनाम नंद किशोर सिंह मामले का हवाला दिया:
“यद्यपि हम यह स्वीकार करते हैं कि एफआईआर अपराध का कोई विश्वकोश नहीं होती, लेकिन वर्तमान एफआईआर में कुछ आवश्यक तथ्यों का न होना इस संदेह को जन्म देता है कि कहीं यह अपराध गढ़ा तो नहीं गया है।”
पीठ ने राम कुमार पांडे बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का भी उल्लेख किया:
“हमारा मानना है कि ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यों का न होना, जो मामले की संभावनाओं को प्रभावित करते हैं, साक्ष्य अधिनियम की धारा 11 के तहत अभियोजन पक्ष के मामले की सत्यता को परखने में प्रासंगिक हैं।”
अदालत ने कहा कि आरोपी को केवल बगीचे में पत्ते तोड़ते देखना ‘अंतिम बार साथ देखे जाने’ की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत आरोपी पर भार डालने का तर्क पूरी तरह निराधार है।
पहचान के बिंदु पर पीठ ने दर्ज किया कि दोनों मुख्य गवाह अदालत में आरोपी को नहीं पहचान सके। जिरह के दौरान पीड़िता ने स्पष्ट कहा:
“आज अदालत कक्ष में आने से पहले मैं स्पेशल प्रॉसिक्यूटर से मिली थी। स्पेशल प्रॉसिक्यूटर ने मुझे बताया था कि आज इस अदालत के सामने क्या कहना है… मैं उसका चेहरा भूल चुकी हूं। मेरी मां ने मुझे आरोपी का नाम बताया था… मुझे अब उस व्यक्ति का चेहरा याद नहीं है जो मेरे घर आया था और जिसने मेरे साथ गलत काम किया था, क्योंकि यह घटना काफी समय पहले हुई थी। घटना के बाद मैंने उस व्यक्ति को फिर कभी नहीं देखा, और अब मैं उसकी पहचान करने में असमर्थ हूं।”
इसी तरह प्रत्यक्षदर्शी बताई गई पीडब्ल्यू-2 ने अदालत में कहा:
“मैं आरोपी व्यक्ति को नहीं जानती और अब उसका चेहरा याद नहीं कर सकती। आरोपी का नाम मुझे पीडब्ल्यू-1 ने बताया था… चूंकि मैं आरोपी को नहीं जानती, इसलिए पीडब्ल्यू-1 ने ही मुझे उसका नाम बताया था।”
पीठ ने इस बात पर गंभीर रुख अपनाया कि गवाहों के इस तरह मुकरने के बावजूद न तो अभियोजक ने और न ही ट्रायल कोर्ट ने उन्हें धारा 164 सीआरपीसी के बयानों से रूबरू कराया। इसके अलावा, बचाव पक्ष के वकील की अनुपस्थिति के कारण मेडिकल अफसरों (पीडब्ल्यू-3 और पीडब्ल्यू-8) से जिरह का प्रभावी अवसर नहीं मिला, इसलिए मेडिकल साक्ष्य को आरोपी के खिलाफ नहीं पढ़ा जा सकता।
स्कूल शिक्षिका को गवाह के तौर पर पेश न करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की पीठ के फैसले तखाजी हीराजी बनाम ठाकोर कुबेरसिंह चमनसिंह का हवाला देते हुए प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला:
“यद्यपि अभियोजन जांच के दौरान दर्ज प्रत्येक गवाह का परीक्षण करने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन उसका यह कर्तव्य है कि वह उन गवाहों का परीक्षण अवश्य करे जिनका साक्ष्य मामले की जड़ तक जाता है और सच्चाई को सामने लाने के लिए अनिवार्य है। जहां घटना की शुरुआत पर प्रकाश डालने में सक्षम किसी महत्वपूर्ण गवाह को बिना किसी ठोस कारण के रोक लिया जाता है, वहां अदालत अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने में पूरी तरह उचित होगी, विशेषकर तब जब वह गवाह घटनाओं की श्रृंखला में केंद्रीय स्थान रखता हो।”
अंत में पीठ ने यह भी माना कि आरोपी ने स्वयं गवाही देकर, तीन अन्य गवाहों को पेश करके और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत कर अन्यत्र उपस्थिति का एक विश्वसनीय बचाव स्थापित किया था, जिसे निचली अदालतों ने बिना किसी ठोस कारण के खारिज कर दिया था।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मां का अस्वाभाविक आचरण, एफआईआर में 10 दिन की भारी देरी और तथ्यों का अभाव, अदालत में पहचान की पूर्ण विफलता, ट्यूटरिंग की स्वीकारोक्ति, पारिवारिक संबंधों पर परस्पर विरोधी बयान, अहम गवाह को पेश न करना और अन्यत्र उपस्थिति का पुख्ता बचाव—इन सभी परिस्थितियों को मिलाकर देखने पर अभियोजन का मामला टिकाऊ नहीं रह जाता।
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देकर बरी करने का आदेश दिया और उसे तुरंत हिरासत से रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: चार्मिंग रुपोन बनाम मेघालय राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 2026, विशेष अनुमति याचिका आपराधिक संख्या 11881/2022 से उद्भूत
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
निर्णय की तिथि: 09 अक्टूबर 2026

