मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत किसी पीड़ित महिला को मिले निवास के वैधानिक अधिकार को केवल वैकल्पिक आवास के किराये के भत्ते में नहीं बदला जा सकता, खासकर तब जब उसकी सुरक्षा और मानवीय गरिमा का प्रश्न हो। जस्टिस शमीम अहमद की एकल पीठ ने सेशंस कोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी, जिसने 73 वर्षीय एक बुजुर्ग विधवा के निवास के अधिकार को हटाकर उसकी जगह 15,000 रुपये प्रति माह का किराया देने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के मूल निवास आदेश को बहाल करते हुए बुजुर्ग महिला को तत्काल उसी साझा घर में वापस बसाने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही पुडुचेरी प्रशासन और पुलिस को आदेश दिया गया है कि वे बुजुर्ग महिला के भोजन, स्वास्थ्य और सुरक्षा की दैनिक निगरानी सुनिश्चित करें।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता 73 वर्ष की एक बुजुर्ग विधवा हैं, जो पुडुचेरी स्थित इस आवासीय मकान में कई दशकों से रह रही हैं। कोई जैविक संतान न होने के कारण उन्होंने और उनके दिवंगत पति ने पहले प्रतिवादी को बेटे के रूप में गोद लिया था। उन्होंने उसे पढ़ाया-लिखाया और सरकारी उद्यम में स्थायी नौकरी मिलने तक उसका पूरा सहयोग किया। इसके बाद उन्होंने उसकी शादी दूसरी प्रतिवादी से कराई। पति ने अपने जीवनकाल में उक्त संपत्ति के संबंध में पहले प्रतिवादी के पक्ष में एक वसीयत की थी, जिसमें याचिकाकर्ता के जीवनकाल तक उनके रहने के अधिकार और जीवन हित को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया था।
पति के निधन के बाद परिवार में विवाद शुरू हो गया। 30 दिसंबर 2024 को कथित रूप से मारपीट और विवाद हुआ, जिसके बाद वर्ष 2025 में आपराधिक मामला दर्ज किया गया। घर से निकाले जाने और गहने छीन लिए जाने के बाद याचिकाकर्ता को एक रिश्तेदार के घर शरण लेनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने पुडुचेरी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (महिला कोर्ट) के समक्ष घरेलू हिंसा कानून के तहत याचिका दायर की।
मजिस्ट्रेट ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच घरेलू संबंध और साझा घर का तथ्य प्रथम दृष्टया स्थापित है। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को घर से बेदखल किया गया था, इसलिए वे घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 17 और 19 के तहत सुरक्षा व निवास आदेश की हकदार हैं। मजिस्ट्रेट ने उनके पक्ष में निवास और सुरक्षा आदेश पारित किया। इसके खिलाफ प्रतिवादियों ने अपील की, जिस पर पुडुचेरी के तीसरे अतिरिक्त सेशंस जज ने 13 जुलाई 2026 को मजिस्ट्रेट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। सेशंस कोर्ट ने शर्त रखी कि पहला प्रतिवादी वैकल्पिक आवास के लिए याचिकाकर्ता को हर महीने 15,000 रुपये का किराया देगा। इस आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता एक वृद्ध विधवा हैं जिनका कोई अन्य सहारा नहीं है और वे दशकों से इसी घर में रह रही हैं। उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें नया मकान ढूंढने के लिए विवश करना उनके लिए भारी मानसिक व शारीरिक कष्ट का कारण बनेगा और यह कानून के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देगा। वकील ने यह भी रेखांकित किया कि पहले प्रतिवादी का यह कानूनी और नैतिक दायित्व है कि जिस मां ने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया, वह उसके भोजन, वस्त्र, आश्रय और इलाज की व्यवस्था करे।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों के वकील ने तर्क दिया कि मकान के मालिकाना हक और कब्जे को लेकर दीवानी अदालत में मुकदमा लंबित है और वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल के समक्ष भी कार्यवाही चल रही है। ऐसे में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्यवाहियों का इस्तेमाल परोक्ष रूप से संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण और पूर्व निर्णय
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा कानून का उद्देश्य पीड़ित महिला को तत्काल और प्रभावी सुरक्षा देना है। संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर चल रहे सिविल मुकदमों के आधार पर इस सुरक्षा को छीना नहीं जा सकता:
“कानूनी रूपरेखा यह स्पष्ट करती है कि निवास और सुरक्षा की तत्काल रक्षा, मालिकाना अधिकारों के अंतिम निर्धारण से बिल्कुल अलग विषय है। नतीजतन, सिविल कार्यवाहियों के लंबित रहने या मालिकाना हक के दावों के आधार पर अंतरिम स्तर पर उस सुरक्षा को समाप्त नहीं किया जा सकता, जिसे विद्वान मजिस्ट्रेट ने रिवीजन याचिकाकर्ता को देना आवश्यक समझा है।”
अदालत ने रिश्ते के मानवीय पहलू पर टिप्पणी करते हुए कहा:
“एक मकान मुकदमेबाजी का विषय हो सकता है, लेकिन जिस वृद्ध महिला ने अपने जीवन के कई दशक उसमें बिताए हैं, उसके लिए वह उसकी सुरक्षा, गरिमा और अपनेपन का प्रतीक भी है। इसी तरह, जिस व्यक्ति का पालन-पोषण याचिकाकर्ता ने एक बेटे के रूप में किया है, उस रिश्ते से उत्पन्न जिम्मेदारियों को केवल संपत्ति पर प्रतिस्पर्धी दावों के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।”
हाईकोर्ट ने इस संबंध में वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों से जुड़े फैसलों का भी उल्लेख किया:
- सुप्रीम कोर्ट ने कमलाकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर एवं अन्य (2025) में निर्णय दिया था कि वरिष्ठ नागरिक कानून एक कल्याणकारी विधान है और इसकी उदार व्याख्या की जानी चाहिए। यदि कोई रिश्तेदार देखभाल की जिम्मेदारी पूरी नहीं करता, तो ट्रिब्यूनल को उसे घर से बेदखल करने का पूरा अधिकार है।
- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने श्रीमती सुमंतरा बाई मेहरा बनाम श्रीमती पार्वती मेहरा उर्फ रिंकी मेहरा (2024) में सुप्रीम कोर्ट के एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर, बेंगलुरु अर्बन डिस्ट्रिक्ट फैसले का हवाला देते हुए माना था कि भरण-पोषण में केवल पैसा नहीं, बल्कि भोजन, कपड़े, निवास और इलाज शामिल हैं। किसी वृद्ध व्यक्ति को उसके अपने घर से बाहर नहीं किया जा सकता।
- सुप्रीम कोर्ट ने विजया मनोहर अरबट बनाम काशीराव राजाराम सवाई (1987) में कहा था कि भारतीय समाज में बच्चों का यह कर्तव्य है कि वे अपने वृद्ध और असमर्थ माता-पिता की देखभाल करें।
- मद्रास हाईकोर्ट ने एस. राजन बनाम आर. श्रीनिवासन एवं अन्य (2025) में स्पष्ट किया था कि वरिष्ठ नागरिक कानूनों का उद्देश्य केवल वित्तीय राशि देना नहीं है, बल्कि बुजुर्गों की बुनियादी जरूरतों, सम्मान, प्रेम और देखभाल को सुरक्षित रखना है।
इन सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए जस्टिस शमीम अहमद ने कहा कि केवल पैसे देकर जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता:
“15,000 रुपये प्रति माह के भुगतान का निर्देश उस वृद्ध महिला के प्रति जिम्मेदारियों का पूर्ण निर्वहन नहीं माना जा सकता, जिसे केवल वित्तीय सहायता ही नहीं बल्कि भोजन, वस्त्र, सुरक्षा, चिकित्सा देखभाल, भावनात्मक संबल और रहने के लिए एक गरिमापूर्ण स्थान की आवश्यकता है।”
अदालत ने आगे टिप्पणी की:
“वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित सुरक्षात्मक कानून को केवल पैसों के प्रबंध तक सीमित नहीं किया जा सकता, जब किसी वृद्ध व्यक्ति के निवास और शारीरिक सुरक्षा का ही प्रश्न दांव पर हो। दी जाने वाली राहत सार्थक और उस व्यक्ति की रक्षा करने में सक्षम होनी चाहिए जिसे कानून सुरक्षा प्रदान करना चाहता है।”
हाईकोर्ट का निर्णय और विस्तृत दिशा-निर्देश
हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट के 13 जुलाई 2026 के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी और न्यायिक मजिस्ट्रेट के निवास आदेश को तुरंत प्रभाव से लागू करने का निर्देश देते हुए कई दिशा-निर्देश जारी किए:
- पुडुचेरी के जिला मजिस्ट्रेट और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) तुरंत कदम उठाएं ताकि याचिकाकर्ता को उक्त आवास में सुरक्षित और बिना किसी बाधा के पुनः प्रवेश कराया जा सके।
- स्थानीय पुलिस याचिकाकर्ता के सुरक्षित प्रवेश और शांतिपूर्ण निवास में पूरी मदद करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि कोई कानून-व्यवस्था की स्थिति न बने।
- प्रतिवादी याचिकाकर्ता के शांतिपूर्ण रहने में कोई बाधा नहीं डालेंगे और न ही उन्हें घर के उनके आवासीय हिस्से में जाने से रोकेंगे।
- पहला प्रतिवादी, जो सरकारी सेवा में है, याचिकाकर्ता को भरण-पोषण के रूप में 15,000 रुपये प्रति माह का भुगतान जारी रखेगा। यह राशि अक्टूबर 2026 से हर महीने की 15 तारीख तक दी जाएगी।
- प्रतिवादी याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे और उनके साथ किसी भी प्रकार का शारीरिक, मौखिक, भावनात्मक या आर्थिक दुर्व्यवहार नहीं करेंगे।
- याचिकाकर्ता की अधिक आयु को देखते हुए प्रतिवादी उन्हें प्रतिदिन तीन समय पौष्टिक भोजन, स्वच्छ कपड़े और जीवन की बुनियादी जरूरतें उपलब्ध कराएंगे।
- प्रतिवादी एक बुजुर्ग पारिवारिक सदस्य के रूप में उनकी देखभाल करेंगे और उनकी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार दवाइयों व इलाज की व्यवस्था करेंगे।
- प्रतिवादी याचिकाकर्ता को घर से बेदखल नहीं करेंगे और न ही उनके रहने के अधिकार में कोई अड़चन डालेंगे।
- इन आदेशों के अनुपालन और याचिकाकर्ता की कुशलक्षेम जानने के लिए स्थानीय पुलिस एक पुलिस कांस्टेबल और संभवतः एक महिला पुलिस कांस्टेबल को प्रतिदिन घर भेजेगी, जो यह जांचेंगे कि वे आराम से रह रही हैं और उन्हें भोजन, वस्त्र व सुरक्षा मिल रही है या नहीं।
- पुलिसकर्मी प्रतिदिन अपने उच्चाधिकारियों को संक्षिप्त रिपोर्ट भेजेंगे। पुडुचेरी के एसएसपी अगली सुनवाई पर इन सभी रिपोर्टों के साथ एक समेकित रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करेंगे।
- यदि याचिकाकर्ता की ओर से उपेक्षा, धमकी, मारपीट या घरेलू हिंसा की कोई शिकायत मिलती है, तो पुलिस तुरंत कानूनी कार्रवाई करेगी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ये निर्देश केवल अंतरिम राहत हैं और इससे संपत्ति पर याचिकाकर्ता को कोई मालिकाना हक नहीं मिल जाता। संपत्ति के स्वामित्व और वसीयत की वैधता का फैसला सक्षम सिविल कोर्ट द्वारा ही किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर 2026 तय की गई है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: महालक्ष्मी बनाम मूर्ति और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन केस संख्या 2328/2026
पीठ: जस्टिस शमीम अहमद
निर्णय की तिथि: 09.10.2026

