छत्तीसगढ़ के एक जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने स्पष्ट किया है कि ट्रेन के डिब्बे में यात्री की व्यक्तिगत निगरानी में रखे बिना बुक कराए (अनबुक्ड) सामान की चोरी के लिए रेलवे को सेवा में कमी का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस आधार पर आयोग ने गरीब रथ एक्सप्रेस में यात्रा के दौरान जेवरात और कपड़ों से भरा बैग चोरी होने के मामले में दायर 5 लाख रुपये के मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया।
जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष दाकेश्वर प्रसाद शर्मा, सदस्य अनिल कुमार अग्निहोत्री और सदस्य निरुपमा प्रधान की पीठ ने 29 सितंबर को यह आदेश सुनाया। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सफर के दौरान अपने निजी सामान की हिफाजत करना खुद यात्री की जिम्मेदारी है।
सगाई समारोह से लौटते समय हुई थी चोरी
मामला 29 अक्टूबर 2015 का है, जब शिकायतकर्ता अपने परिवार के साथ एक सगाई समारोह में भाग लेकर कानपुर से रायपुर के लिए गरीब रथ एक्सप्रेस में सवार हुए थे। अगली सुबह, 30 अक्टूबर 2015 को करीब 6:45 बजे जब ट्रेन रायपुर स्टेशन पहुंचने वाली थी, तभी शिकायतकर्ता ने देखा कि कीमती आभूषणों और कपड़ों से भरा उनका बैग अपनी जगह से गायब था।
यात्री ने इस घटना की सूचना तुरंत रायपुर स्थित गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (जीआरपी) को दी और प्राथमिकी दर्ज कराई। इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग में 5 लाख रुपये के हर्जाने का दावा पेश किया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि ट्रेन के डिब्बे में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे और चोरी हुए सामान को बरामद करने या मुआवजा देने में रेलवे की नाकामी सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार के दायरे में आती है।
रेलवे की दलील: बिना घोषणा और बुकिंग के ले जाया जा रहा था सामान
रेलवे प्रशासन ने इस दावे का कड़ा विरोध किया। रेलवे ने आयोग के समक्ष कहा कि यात्री अपने सामान को निर्धारित फ्री अलाउंस सीमा के भीतर अनबुक्ड रूप में खुद अपने पास रखकर ले जा रहा था। रेलवे ने बताया कि यात्री ने यात्रा शुरू करने से पहले संबंधित अधिकारियों को अपने सामान की प्रकृति, विवरण या उसके मूल्य की कोई घोषणा नहीं की थी और न ही इसके लिए कोई अनिवार्य अतिरिक्त शुल्क चुकाया था।
रेलवे ने अपने बचाव में रेलवे एक्ट की धारा 100 का उल्लेख किया, जिसके तहत यदि किसी सामान की विधिवत बुकिंग न कराई गई हो और उसका घोषित मूल्य न बताया गया हो, तो उसके नुकसान, चोरी या नष्ट होने के लिए रेलवे प्रशासन को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। इसके अतिरिक्त, रेलवे ने इंडियन रेलवे कॉन्फ्रेंस एसोसिएशन कोचिंग टैरिफ के नियम 506.2 का हवाला देते हुए कहा कि कोच के भीतर रखा निजी सामान हमेशा यात्री की अपनी निगरानी में रहता है और यह पूरी तरह यात्री के अपने जोखिम पर ले जाया माना जाता है। रेलवे ने यह भी कहा कि यात्रियों को सफर के दौरान सतर्क रहने और अपने सामान की खुद हिफाजत करने की लगातार सलाह दी जाती है।
सिर्फ चेन से बांधना काफी नहीं, यात्री की सतर्कता जरूरी
आयोग ने शिकायतकर्ता की इस दलील पर गौर किया कि उसने अपने बैग को जंजीर से बांध रखा था। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि सामान को सिर्फ चेन से बांध देना ही काफी नहीं है; यात्री का यह भी दायित्व था कि वह सभी आवश्यक सुरक्षा उपाय करता और पूरी यात्रा के दौरान खुद भी पूरी तरह सजग रहता।
पीठ ने अपने आदेश में पाया कि शिकायतकर्ता ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह सिद्ध हो कि उसने रेलवे एक्ट के नियमों के अनुसार अपने कीमती सामान की पूर्व घोषणा की थी। आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि सामान बिना बुक कराया हुआ था और यात्री की व्यक्तिगत अभिरक्षा में था, इसलिए उसकी सुरक्षा का पूरा जिम्मा भी स्वयं यात्री पर था। सुप्रीम कोर्ट की कानूनी नजीर को दोहराते हुए आयोग ने रेखांकित किया कि यात्री की व्यक्तिगत निगरानी वाले अनबुक्ड सामान की चोरी के मामले में रेलवे की ओर से सेवा में किसी भी तरह की कमी नहीं बनती।

