इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1986 के रेप और अपहरण के एक मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को करीब 38 साल बाद बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। कोर्ट ने यह भी पाया कि घटना के समय महिला की उम्र 19 साल से अधिक थी और इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी।
जस्टिस अब्दुल शाहिद ने सुभाष की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए मेरठ की सेशन कोर्ट का 26 सितंबर 1988 का फैसला रद्द कर दिया। उस फैसले में सुभाष को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363, 366 और 376 के तहत दोषी ठहराया गया था।
हाईकोर्ट ने 7 अक्टूबर को दिए अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी में कई गंभीर विरोधाभास हैं। मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयानों से भी आरोपों की पुष्टि नहीं होती।
महिला की उम्र और उसके व्यवहार पर कोर्ट ने किया गौर
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने महिला की उम्र और घटना के समय उसके व्यवहार को महत्वपूर्ण माना।
कोर्ट ने पाया कि घटना के समय महिला की उम्र 19 साल से अधिक थी। वह कई जिलों से होकर गुजरी, लेकिन इस दौरान उसने न तो किसी से मदद मांगी और न ही पुलिस में शिकायत करने की कोशिश की।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता कि महिला अपने फैसलों और उनके परिणामों को समझती थी तथा अपनी सहमति से आरोपी के साथ गई थी।
कोर्ट ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष के बयानों और अन्य सबूतों में गंभीर विरोधाभास हैं, जिनके कारण आरोपों पर भरोसा करना मुश्किल है।
बचाव पक्ष ने मेडिकल रिपोर्ट और सबूतों पर उठाए सवाल
यह मामला 25 फरवरी 1986 की एक घटना से जुड़ा था। घटना के अगले दिन यानी 26 फरवरी 1986 को एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
अपील की सुनवाई के दौरान सुभाष के वकील ने दलील दी कि महिला के शरीर पर किसी प्रकार की चोट नहीं मिली थी। मेडिकल जांच में भी रेप के आरोप की पुष्टि करने वाला कोई स्पष्ट सबूत सामने नहीं आया।
बचाव पक्ष ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उसमें महिला के पहले से यौन संबंधों की आदी होने का उल्लेख था।
वकील ने यह भी तर्क दिया कि महिला आरोपी के साथ कई जिलों में गई, लेकिन उसने कहीं भी शोर नहीं मचाया और न ही किसी से शिकायत की। बचाव पक्ष के अनुसार, उसका यह व्यवहार इस बात की ओर इशारा करता है कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ थी।
राज्य सरकार ने महिला की गवाही को बताया भरोसेमंद
राज्य सरकार की ओर से अपील का विरोध किया गया। सरकारी वकील ने दलील दी कि महिला इस मामले की पीड़िता थी और उसने सेशन कोर्ट में अपनी बात रखी थी।
सरकारी वकील का कहना था कि महिला एक भरोसेमंद गवाह है और केवल उसकी गवाही के आधार पर भी आरोपी की दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी जा सकती है।
हालांकि, हाईकोर्ट इन दलीलों से सहमत नहीं हुआ।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी में कई गंभीर कमियां और विरोधाभास हैं। मेडिकल सबूतों और रिकॉर्ड पर मौजूद गवाहों के बयानों से भी अभियोजन पक्ष के आरोपों को पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता।
हाईकोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों में आरोपी को दोषी ठहराए रखना उचित नहीं होगा, क्योंकि उसके खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए हैं।
38 साल बाद दोषसिद्धि रद्द, सरेंडर करने की जरूरत नहीं
हाईकोर्ट ने सुभाष की अपील स्वीकार करते हुए मेरठ के पांचवें अपर सेशन जज द्वारा 26 सितंबर 1988 को सुनाया गया दोषसिद्धि का फैसला रद्द कर दिया।
इसके साथ ही सुभाष को आईपीसी की धारा 363, 366 और 376 के तहत लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सुभाष अपील की सुनवाई के दौरान जमानत पर था। इसलिए अब उसे सरेंडर करने की जरूरत नहीं है। हाईकोर्ट ने उसके जमानतदारों को भी उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया।

