केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अपनी पसंद के कपड़े पहनना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और कानून के स्पष्ट समर्थन के बिना कोई भी समाज या संस्थान किसी व्यक्ति पर अपनी पसंद का पहनावा नहीं थोप सकता। हाईकोर्ट ने कोट्टारक्करा के एक स्कूल की महिला हेडमिस्ट्रेस को स्कूल में प्रवेश की अनुमति देते हुए यह फैसला सुनाया। हेडमिस्ट्रेस को साड़ी की जगह चूड़ीदार पहनकर आने पर स्कूल के गेट पर रोक दिया गया था।
5 अक्टूबर को दिए आदेश में जस्टिस पी. वी. कुन्हीकृष्णन ने कहा कि पहनावे का चुनाव पूरी तरह से नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है। अदालत ने रेखांकित किया कि यदि किसी व्यक्ति की इस स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हुए कोई गैर-कानूनी फरमान जारी किया जाता है, तो कानून लागू करने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे तत्काल प्रभावी कानूनी कदम उठाएं।
साड़ी बनाम चूड़ीदार का विवाद नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला साड़ी बनाम चूड़ीदार की किसी प्रतिद्वंद्विता का नहीं है, बल्कि एक शिक्षित महिला की गरिमा, स्वायत्तता और पेशेवर पहचान से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि मूल प्रश्न यह है कि क्या किसी शैक्षणिक संस्थान का मैनेजर किसी स्पष्ट, वैध और समान रूप से लागू नियम के अभाव में किसी महिला कर्मचारी को अपनी व्यक्तिगत पसंद के कपड़े पहनने के लिए मजबूर कर सकता है।
जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने टिप्पणी की कि कपड़े संस्कृति, सुविधा और व्यक्तिगत पसंद को दर्शाते हैं, लेकिन उन्हें किसी व्यक्ति के चरित्र या सम्मान का पैमाना नहीं बनाया जा सकता। देश का संविधान किसी भी महिला के स्वाभिमान को इस शर्त पर नहीं बांधता कि वह किसी दूसरे व्यक्ति की प्राथमिकताओं के अनुसार कपड़े पहने।
अदालत ने आगे कहा कि किसी व्यक्ति के लिए साड़ी एक शालीन और सम्मानजनक परिधान हो सकती है, लेकिन किसी की व्यक्तिगत पसंद इसे अनिवार्य यूनिफॉर्म में तब्दील नहीं कर सकती। इसी तरह, यदि पेशेवर माहौल में चूड़ीदार शालीनता और सलीके से पहना गया है, तो इससे हेडमिस्ट्रेस की क्षमता, गरिमा या प्रशासनिक अधिकार में कोई कमी नहीं आती।
क्या था पूरा विवाद
यह विवाद कोट्टारक्करा स्थित एक स्कूल में शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता हेडमिस्ट्रेस के अनुसार, 3 फरवरी को स्कूल मैनेजर उनके कार्यालय में घुसा और उन्हें काम पर चूड़ीदार पहनकर आने पर अंजाम भुगतने की धमकी दी। इसके साथ ही मैनेजर ने सुरक्षाकर्मियों को निर्देश दिया कि यदि वह चूड़ीदार पहनकर आएं, तो उन्हें स्कूल परिसर में प्रवेश न करने दिया जाए।
अगले दिन जब हेडमिस्ट्रेस स्कूल पहुंचीं, तो सुरक्षाकर्मियों ने उनके परिधान को लेकर उन्हें मुख्य द्वार पर ही रोक दिया। इसके बाद उन्होंने एक पुलिस अधिकारी की मदद से स्कूल परिसर में प्रवेश किया। हेडमिस्ट्रेस ने बताया कि सामान्य शिक्षा निदेशालय (Directorate of General Education) के सर्कुलर में शिक्षकों को चूड़ीदार पहनने की स्पष्ट अनुमति दी गई है।
मैनेजर पर पहले भी दर्ज हैं आपराधिक मामले
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि मैनेजर लगातार उनके साथ अभद्र व्यवहार करता रहा है और वरिष्ठ शिक्षकों सहित अन्य स्कूल कर्मियों को धमकाना उसकी आदत बन चुकी है। याचिका में आरोप लगाया गया कि मैनेजर कर्मचारियों के साथ क्रूरतापूर्वक पेश आता था और अक्सर शारीरिक हिंसा की धमकियां देता था।
हेडमिस्ट्रेस ने अदालत को यह भी जानकारी दी कि उन्होंने मैनेजर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। इसके अतिरिक्त, स्कूल की ही एक अन्य महिला कर्मचारी की शिकायत पर मैनेजर को पहले भी अश्लीलता फैलाने और महिला की लज्जा भंग करने के अपराध में दोषी ठहराया जा चुका है। इन परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने हाईकोर्ट से पुलिस सुरक्षा दिलाने और आरोपी को मैनेजर पद से अयोग्य घोषित करने की गुहार लगाई थी।
प्रशासनिक जांच के आधार पर कार्रवाई के निर्देश
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्याम जे. सैम और डेनियल मैथ्यूज कोशी ने पैरवी की, जबकि स्कूल और मैनेजर का पक्ष अधिवक्ता वी. ए. मुहम्मद और एम. सज्जाद ने रखा।
हाईकोर्ट ने मैनेजर के आचरण पर सीधे तौर पर कोई अंतिम टिप्पणी करने से परहेज किया, क्योंकि शिक्षा विभाग इस पूरे प्रकरण की विभागीय जांच पहले ही शुरू कर चुका है। हालांकि, अदालत ने संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि जारी जांच में मैनेजर के खिलाफ आरोप सिद्ध होते हैं, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार तत्काल उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

