ब्रेकअप के बाद आत्महत्या को हमेशा खुदकुशी के लिए उकसाना नहीं कहा जा सकता: शादी से इनकार पर दर्ज धारा 306 आईपीसी का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने एक युवक और उसके परिजनों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रेम संबंध (ब्रेकअप) टूटने के बाद शादी से इनकार करने को भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाना या दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह आपराधिक मामला मृतका की बहन द्वारा दर्ज कराई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर/एफआईएस) से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता के अनुसार, जब उसकी बहन ने कई बार फोन करने पर भी जवाब नहीं दिया, तो उसने मृतका के एक दोस्त से संपर्क किया। तब उसे जानकारी मिली कि मृतका पहले अपीलकर्ता के घर पर उसके साथ रह रही थी। इसके बाद शिकायतकर्ता की बड़ी बहन वहां पहुंची और मृतका को अपने घर वापस ले आई।

रिकॉर्ड से यह स्थापित हुआ कि मृतका और पहला अपीलकर्ता पिछले तीन महीनों से सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे और इस रिश्ते को अपीलकर्ता के परिवार ने भी स्वीकार कर लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी की कि ऐसी परिस्थितियों में यह समझना मुश्किल है कि शिकायतकर्ता और उसकी बहन मृतका को पहले अपीलकर्ता के घर से वापस क्यों ले आई थीं।

अगली सुबह मृतका काम पर चली गई। शाम को पहले अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता को फोन करके पूछा कि वह उसकी छोटी बहन को कहां छोड़े। शिकायतकर्ता ने उसे बहन को घर लाने को कहा, लेकिन मृतका घर नहीं लौटी। इसके बाद मृतका ने अपनी सबसे बड़ी बहन को फोन किया और बताया कि पहले अपीलकर्ता ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया है, इसलिए वह अपनी जान दे रही है। बाद में मृतका ने पहले अपीलकर्ता के घर पर आत्महत्या कर ली।

आरोपियों पर लगाए गए आरोप

अभियोजन पक्ष ने छह आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 306 सपठित धारा 34 के तहत मामला दर्ज किया था:

  • पहला अपीलकर्ता (मृतका का लिव-इन पार्टनर);
  • दूसरा अपीलकर्ता (पहले अपीलकर्ता के पिता);
  • छठा अपीलकर्ता (पहले अपीलकर्ता की माता);
  • तीसरा अपीलकर्ता (पहले अपीलकर्ता की बहन);
  • पांचवां अपीलकर्ता (तीसरे अपीलकर्ता का होने वाला दूल्हा); और
  • चौथा अपीलकर्ता (पहले अपीलकर्ता का दोस्त)।
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मृतका के परिजनों का आरोप था कि चौथे अपीलकर्ता ने पहले अपीलकर्ता के सामने मृतका के बारे में गलत बातें कही थीं, जिसके कारण उसने शादी के प्रस्ताव से अपने कदम पीछे खींच लिए। वहीं तीसरे अपीलकर्ता ने भी पहले अपीलकर्ता से यह रिश्ता खत्म करने की गुहार लगाई, क्योंकि यदि वह मृतका से शादी करता, तो पांचवां अपीलकर्ता उससे शादी करने से इनकार कर रहा था। माता-पिता (दूसरे और छठे अपीलकर्ता) ने भी इस बात का समर्थन किया। अभियोजन का दावा था कि इन्हीं परिस्थितियों ने मृतका को आत्महत्या के लिए विवश किया।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

रिकॉर्ड की पड़ताल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले अपीलकर्ता के घर में आत्महत्या से हुई मौत निर्विवाद रूप से साबित है और दोनों के बीच आपसी सहमति से रिश्ता होना भी स्वीकार किया गया है। इसके बावजूद, पीठ ने पाया कि आरोपियों की ओर से ऐसा कोई कृत्य नहीं था जिसे उकसाना कहा जा सके। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि जब मृतका ने अपनी सबसे बड़ी बहन को फोन करके जान देने की बात कही थी, तब बहन ने उसे ऐसा आत्मघाती कदम उठाने से रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

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आईपीसी की धारा 306 के तहत आपराधिक दायित्व की सीमा स्पष्ट करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“हम आरोपियों/अपीलकर्ताओं की ओर से ऐसा कोई भी उकसावा पाने में असमर्थ हैं जिससे मृतका आत्महत्या करने के लिए विवश हुई हो। न तो ऐसा कोई इरादा था और न ही इसे आत्महत्या के लिए उकसाना कहा जा सकता है। अधिक से अधिक, यदि हम पहली मुखबिर के बयानों पर पूरी तरह विश्वास भी कर लें, तो भी केवल शादी से इनकार का मामला बनता है, जिसके कारण महिला ने आत्महत्या कर ली।”

नाकाम रिश्ते पर भावनात्मक आघात और आपराधिक अपराध के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए अदालत ने आगे कहा:

“परिस्थितियों पर हर व्यक्ति अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है और यदि किसी रिश्ते के टूटने का अंत आत्महत्या के रूप में होता है, तो उसे हमेशा आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं कहा जा सकता। शादी से इनकार करने का मकसद महिला को आत्महत्या के लिए विवश करना नहीं था और न ही आरोपियों को इस बात की जानकारी मानी जा सकती है कि ऐसे इनकार पर वह अपनी जान दे देगी।”

अदालत का निर्णय

आरोपों को बेबुनियाद मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया:

“हम ऐसे निराधार आरोपों पर आरोपियों के खिलाफ शुरू की गई अभियोजन की कार्यवाही को बरकरार रखने में असमर्थ हैं और हम तेलंगाना के कुशाईगुड़ा स्थित मेचल-मलकाजगिरि जिले के द्वितीय अतिरिक्त सीनियर सिविल जज सह अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित सत्र मामला संख्या 101/2024 की कार्यवाही को रद्द करते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि अपीलकर्ता हिरासत में हैं और किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। यदि वे पहले से जमानत पर हैं, तो उनके बेल बॉन्ड रद्द माने जाएंगे। इसके साथ ही अपील का निपटारा कर दिया गया।

मामले का विवरण

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मामले का शीर्षक: चित्तीबारिका चंद्र शेखर और अन्य बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य
वाद संख्या: SLP (आपराधिक) संख्या 7239/2026
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 5 अक्टूबर, 2026

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