गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत के एक कपड़ा व्यापारी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। व्यापारी पर साड़ियों के निचले हिस्से और पल्लू पर गौतम बुद्ध की तस्वीर छापकर बेचने का आरोप था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी वस्त्र पर पूज्य धार्मिक प्रतीक या ईश्वर का चित्र बनाकर बेचने मात्र से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का अपराध नहीं बनता, जब तक कि ऐसा जानबूझकर दुर्भावनापूर्ण मंशा के साथ न किया गया हो।
7 अक्टूबर को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पी एम रावल ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295ए के तहत किसी कृत्य को दंडनीय बनाने के लिए धार्मिक मान्यताओं को अपमानित करने का सुनियोजित और दुर्भावनापूर्ण इरादा होना आवश्यक है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि बिना किसी भड़काऊ भाषण, आपत्तिजनक आचरण या अपमान करने की स्पष्ट मंशा के की गई सामान्य व्यावसायिक गतिविधि को अपराध के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
धारा 295ए के तहत दुर्भावनापूर्ण मंशा जरूरी
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि धारा 295ए धार्मिक अपमान के अत्यंत गंभीर मामलों से संबंधित है। इसके तहत किसी वर्ग के नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का इरादा जानबूझकर और विद्वेषपूर्ण होना चाहिए। अनजाने में, लापरवाही से या बिना किसी दुर्भावना के किए गए कृत्यों पर यह दंडात्मक धारा लागू नहीं होती।
हाईकोर्ट ने कहा कि साड़ियों या कपड़ों के निचले बॉर्डर अथवा पल्लू जैसे हिस्सों पर किसी देवी-देवता या आदरणीय व्यक्तित्व का कलात्मक अंकन होने भर से यह स्वतः नहीं माना जा सकता कि यह कार्य समाज में वैमनस्य या अशांति फैलाने के उद्देश्य से किया गया है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि ऐसी सामान्य व्यापारिक गतिविधियों को अपराध माना जाने लगा, तो यह आपराधिक कानून को उसकी संवैधानिक सीमाओं से बाहर ले जाने जैसा होगा।
दिसंबर 2017 में दर्ज हुआ था मामला
यह कानूनी विवाद 21 दिसंबर 2017 को दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। ‘समस्त युवा आंबेडकर समाज’ के सदस्यों ने अपने संगठन के अध्यक्ष को जानकारी दी थी कि सूरत के कपड़ा बाजार और अन्य दुकानों में गौतम बुद्ध की तस्वीरों वाले कपड़े व साड़ियां बेची जा रही हैं।
संगठन के प्रतिनिधियों ने 19 दिसंबर 2017 को दुकानों का मुआयना करने के बाद पुलिस में शिकायत दी थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि साड़ी के बॉर्डर, पल्लू और पैरों के पास बुद्ध की तस्वीर को जानबूझकर छापा गया है, जिसका मकसद भगवान बुद्ध का अपमान करना और समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करना है।
व्यापारी ने दी कारोबारी रंजिश और बाजार की मांग की दलील
एफआईआर रद्द कराने हाईकोर्ट पहुंचे कारोबारी भरतभाई हिरजीभाई शंकर ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया। उनके वकील ने अदालत को बताया कि वह साड़ियों और ड्रेस मटेरियल के सामान्य खुदरा विक्रेता हैं। वह बाजार के मौजूदा रुझान और ग्राहकों की मांग के अनुसार निर्माताओं से तैयार माल मंगाते हैं। उनका किसी भी धर्म या आस्था को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था।
याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि शिकायतकर्ता भी इसी व्यवसाय में शामिल हैं और यह शिकायत कारोबारी प्रतिस्पर्धा व रंजिश के चलते दर्ज कराई गई थी। उन्होंने प्रक्रियागत देरी की ओर भी इशारा किया कि 19 दिसंबर को दुकानों के निरीक्षण के दो दिन बाद यानी 21 दिसंबर को पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।
पुलिस जांच में अन्य दुकानों पर भी मिले ऐसे परिधान
शिकायतकर्ता और राज्य सरकार ने व्यापारी की याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि अदालत में पेश की गई तस्वीरों से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है और हाईकोर्ट को इस स्तर पर मामले का मिनी-ट्रायल करने से बचते हुए नियमित आपराधिक प्रक्रिया चलने देनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर रखी गई तस्वीरों और सलाबतपुरा पुलिस द्वारा अगस्त 2024 में सौंपी गई जांच रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन किया। पुलिस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि व्यापारी ने भगवान और गौतम बुद्ध के चित्रों वाले कपड़े जरूर मंगाए थे, लेकिन सूरत के अन्य कई व्यापारी भी बाजार में यही कपड़े बेच रहे थे।
तस्वीरों और साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि सामग्री में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि धर्म का अपमान करने की कोई दुर्भावनापूर्ण या सोची-समझी कोशिश की गई थी। जस्टिस रावल ने फैसला सुनाया कि एफआईआर में लगाए गए सभी आरोपों को यदि पूरी तरह मान भी लिया जाए, तब भी व्यापारी के खिलाफ धार्मिक अपमान का कोई ठोस मामला नहीं बनता। अदालत ने कहा कि इस मामले में आपराधिक मुकदमा आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, और इसके साथ ही एफआईआर को पूरी तरह रद्द कर दिया।

