सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू शामिल हैं, ने स्पष्ट किया है कि भूमि अधिग्रहण के मुआवजे से जुड़े दावों में विवादित तथ्यों का निपटारा संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा नहीं, बल्कि पहली अपीलीय अदालत के रूप में हाईकोर्ट द्वारा किया जाना चाहिए। गुजरात हाईकोर्ट के अंतरिम रोक आदेश के खिलाफ दायर क्रॉस-अपीलों का निपटारा करते हुए शीर्ष अदालत ने मेसर्स जेके पेपर लिमिटेड को बढ़े हुए मुआवजे के निष्पादन पर अंतरिम रोक बरकरार रखने के लिए हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष दो महीने के भीतर ₹15 करोड़ की अतिरिक्त राशि जमा करने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद गुजरात के गुणसदा गांव में ब्लॉक नंबर 207 की 1,40,504 वर्ग मीटर (लगभग 34.72 एकड़) जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा है, जिसकी प्रक्रिया पूर्ववर्ती भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जेके पेपर कंपनी के लाभ के लिए शुरू की गई थी। विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने शुरुआत में इस जमीन का मूल्यांकन ₹124 प्रति वर्ग मीटर तय किया था।
जमीन मालिक बिपिनचंद्र नटवरलाल शाह और दो अन्य ने इस मूल्यांकन को चुनौती देते हुए रेफरेंस कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। रेफरेंस कोर्ट ने 23 फरवरी 2023 को दिए अपने फैसले में मुआवजे की दर बढ़ाकर ₹950 प्रति वर्ग मीटर कर दी। इसके साथ ही अदालत ने 12 प्रतिशत मूल्य वृद्धि, 30 प्रतिशत सोलेशियम और कब्जा मिलने की तारीख से पहले साल के लिए 9 प्रतिशत तथा उसके बाद की अवधि के लिए 15 प्रतिशत की दर से ब्याज देने का आदेश दिया।
रेफरेंस कोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट होकर कंपनी और जमीन मालिकों, दोनों ने गुजरात हाईकोर्ट में क्रमशः प्रथम अपील संख्या 2489/2023 और प्रथम अपील संख्या 1653/2023 दायर की। जमीन मालिकों ने ₹1,500 प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मुआवजे की मांग की, जबकि कंपनी ने ₹950 प्रति वर्ग मीटर के मूल्यांकन को चुनौती दी।
अपील लंबित रहने के दौरान एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने 23 मई 2025 को कंपनी से ₹67,48,34,981 की वसूली के लिए वारंट जारी कर दिया। इसके बाद कंपनी ने हाईकोर्ट में रोक के लिए अर्जियां दाखिल कीं। हाईकोर्ट ने 30 जून 2025 को सशर्त अंतरिम रोक लगाते हुए कंपनी को अतिरिक्त मुआवजे का 50 प्रतिशत हिस्सा (वैधानिक लाभों और ब्याज सहित) जमा करने का निर्देश दिया, जिसमें से आधी राशि जमीन मालिकों को उचित सुरक्षा पेश करने पर निकालने की छूट दी गई। कंपनी ने इस प्रक्रिया के तहत ₹9,33,33,744 जमा कराए थे। हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश के खिलाफ दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
पक्षों की दलीलें
कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि शुरुआत में कंपनी को करीब 24.77 एकड़ जमीन का कब्जा नहीं दिया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि जमीन के बीच से एक नाला बहता है जिससे वहां गंभीर जलभराव होता है और इस वजह से कंपनी के उपयोग के लिए उपलब्ध जमीन का दायरा कम हो गया।
जमीन मालिकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह पेश हुए, जबकि गुजरात राज्य का पक्ष अधिवक्ता दीपान्विता प्रियंका ने रखा।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के अनुपालन में गुजरात सरकार ने हलफनामा दाखिल कर बताया कि 10 नवंबर 2025 को मामलतदार ने शेष 24.77 एकड़ जमीन का कब्जा भी कंपनी को सौंप दिया है। इस प्रकार कंपनी के पास अब पूरी 34.72 एकड़ जमीन का वास्तविक कब्जा आ चुका है, जबकि पहले उसके पास कथित तौर पर केवल 9.95 एकड़ जमीन थी।
अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने नाले और जलभराव को लेकर कंपनी द्वारा दी गई दलील को सिरे से खारिज कर दिया और उसे हाईकोर्ट के समक्ष इस मुद्दे को दोबारा उठाने से रोक दिया। पीठ ने सख्त टिप्पणी की:
“ऐसा प्रतीत होता है कि जब से उक्त भूमि के अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू हुई थी, कंपनी को नाले, उससे होने वाले जलभराव और अन्य रुकावटों की पूरी जानकारी थी। कंपनी के लिए अब यह दावा करना बहुत देर हो चुकी है कि नाले और अन्य रुकावटों ने उसके उपयोग के लिए उपलब्ध जमीन को कम कर दिया, खासकर तब जब उक्त भूमि की अधिग्रहण प्रक्रिया कंपनी के लाभ के लिए 2005 जितनी पुरानी है। इसलिए, कंपनी हाईकोर्ट के समक्ष ऐसा कोई भी मुद्दा उठाने की हकदार नहीं होगी।”
कंपनी को जमीन के विभिन्न हिस्सों का कब्जा वास्तव में कब और किस हद तक मिला, जैसे बाकी तथ्यात्मक विवादों पर शीर्ष अदालत ने कहा कि ये ऐसे प्रश्न हैं जो अंतिम मुआवजे और ब्याज के निर्धारण को सीधे प्रभावित करते हैं।
पहली अपीलीय अदालत के अधिकार क्षेत्र को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मल्लुरु मल्लप्पा (मृत) बनाम कुरुवथप्पा एवं अन्य (2020) 4 SCC 313 के फैसले का हवाला दिया, जिसमें अदालत ने कहा था:
“यह कानून की स्थापित स्थिति है कि अपील मूल अदालत की कार्यवाही का ही विस्तार होती है। सामान्यतः, अपीलीय क्षेत्राधिकार में कानून के साथ-साथ तथ्यों पर भी दोबारा सुनवाई शामिल होती है और इसे व्यथित व्यक्ति द्वारा लागू किया जाता है। पहली अपील अपीलकर्ता का एक मूल्यवान अधिकार है और उसमें निचली अदालत द्वारा तय किए गए तथ्य और कानून के सभी प्रश्न पुनर्विचार के लिए खुले होते हैं। इसलिए, पहली अपीलीय अदालत को सभी मुद्दों पर विचार करना और कारण देते हुए मामले का फैसला करना आवश्यक है। पहली अपीलीय अदालत को पक्षों द्वारा पेश किए गए मौखिक और दस्तावेजी दोनों साक्ष्यों और कानून व तथ्य के सभी मुद्दों से निपटने के बाद ही अपने निष्कर्ष दर्ज करने चाहिए। पहली अपीलीय अदालत के निर्णय में मस्तिष्क का सचेत प्रयोग दिखना चाहिए और सभी मुद्दों तथा दलीलों पर कारणों से समर्थित निष्कर्ष दर्ज होने चाहिए…”
अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति क्षेत्राधिकार की सीमाओं पर जोर देते हुए पीठ ने कहा:
“चूंकि कंपनी और जमीन मालिकों द्वारा दायर पहली अपीलें अभी भी हाईकोर्ट के समक्ष लंबित हैं, जो पहली अपीलीय अदालत होने के नाते ऐसे विवादित तथ्यों की जांच करने और विवाद का निर्णायक निपटारा करने के लिए सबसे उपयुक्त मंच है, इसलिए यह न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए किसी विवादित तथ्य को तय करने के लिए तथ्य-खोज अदालत या ट्रिब्यूनल के कार्यक्षेत्र में प्रवेश करने से बचेगा।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि हाईकोर्ट द्वारा दिया गया अंतरिम रोक आदेश वर्तमान में दो महीने की अवधि के लिए जारी रहेगा। मुआवजे की भारी राशि को देखते हुए न्याय के हित में शीर्ष अदालत ने कंपनी को दो महीने के भीतर गुजरात हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास ₹15 करोड़ की अतिरिक्त राशि जमा करने का आदेश दिया:
- जमा और निवेश: यह ₹15 करोड़ की अतिरिक्त जमा राशि हाईकोर्ट में लंबित प्रथम अपीलों में दोनों पक्षों के अधिकारों और दावों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगी। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल इस राशि को किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में ऑटो-रिन्यूअल सुविधा के साथ अल्पकालिक ब्याज वाले फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) खाते में निवेश करेंगे।
- जमा न करने का परिणाम: यदि कंपनी निर्धारित दो महीने के भीतर यह राशि जमा करने में विफल रहती है, तो हाईकोर्ट द्वारा आदेश और निष्पादन पर लगाई गई रोक स्वतः समाप्त मानी जाएगी और जमीन मालिक वसूली अदालत के समक्ष अपनी कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होंगे।
- रोक की निरंतरता: यदि कंपनी समय पर राशि जमा कर देती है, तो हाईकोर्ट द्वारा कोई विपरीत आदेश पारित किए जाने तक यह अंतरिम रोक प्रभावी रहेगी।
- शीघ्र निपटारे का अनुरोध: भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही 2005 से लंबित होने के तथ्य को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह इन प्रथम अपीलों का शीघ्र निपटारा करे। अदालत इस बात का संज्ञान ले कि 10 नवंबर 2025 को शेष 24.77 एकड़ भूमि का कब्जा सौंपा जा चुका है। नाले से संबंधित खारिज किए गए बिंदु को छोड़कर अन्य सभी कानूनी और तथ्यात्मक पहलू हाईकोर्ट के समक्ष गुण-दोष के आधार पर निर्णय के लिए खुले रखे गए हैं।
शीर्ष अदालत ने इन शर्तों के साथ अपीलों का निपटारा कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मेसर्स जेके पेपर लिमिटेड बनाम बिपिनचंद्र नटवरलाल शाह एवं अन्य (संबद्ध अपील के साथ)
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या [—] / 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 21774 / 2025 से उत्पन्न) के साथ सिविल अपील संख्या [—] / 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 23751-52 / 2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 07 अक्टूबर 2026

